Saturday, May 15, 2021

कौन हैं अफ़ज़ल का मुद्दा उठाने वाले गिलानी?

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दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व लेक्चरर एसएआर गिलानी एक बार फिर ख़बरों में हैं. उन पर आरोप है कि उन्होंने दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में संसद हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरु की बरसी पर एक कार्यक्रम आयोजित किया था. घंटों की पूछताछ के बाद पुलिस ने सोमवार को उन्हें गिरफ़्तार कर लिया. फिलहाल वो पुलिस हिरासत में हैं.

उन्हें आईपीसी की धारा 124 ए (देशद्रोह), 120बी (आपराधिक षड्यंत्र) और 149 (ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से जमा होने) के तहत गिरफ़्तार किया गया है. गिलानी को ऐसे समय गिरफ़्तार किया गया है, जब दिल्ली के प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में पुलिस कार्रवाई को लेकर पुरज़ोर विरोध और तनाव चल रहा है.

तनाव की शुरुआत तब हुई जब अफ़ज़ल गुरु की बरसी पर एक कार्यक्रम के सिलसिले में जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को देशद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया गया. साल 2001 तक कश्मीर में गिलानी के परिवार और नज़दीकी लोगों को छोड़ कर शायद कोई उन्हें नहीं जानता था. गिलानी दिल्ली यूनिवर्सिटी में अरबी भाषा पढ़ाते थे.

एसएआर गिलानी की वरिष्ठ अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी से कोई रिश्तेदारी नहीं है. बस इतनी समानता है कि दोनों भारत प्रशासित उत्तरी कश्मीर के बारामूला ज़िले से आते हैं.

एसएआर गिलानी को भारतीय संसद पर 13 दिसंबर 2001 को हुए हमले में शामिल होने के संदेह में गिरफ़्तार किया गया था. पोटा क़ानून के तहत गिलानी के साथ अफ़ज़ल गुरु और शौकत हुसैन को भी गिरफ़्तार किया गया था. इस मामले में गिलानी को भी फांसी की सज़ा सुनाई गई थी.

चौथे संदिग्ध नवजोत संधू को पांच साल कड़े कारावास की सज़ा हुई. हालांकि अफ़ज़ल गुरु के मुक़ाबले, गिलानी भाग्यशाली कहे जा सकते हैं. उनके पास जानी-मानी मानवाधिकार कार्यकर्ता नंदिता हकसर के नेतृत्व में योग्य वकीलों की एक टीम थी.

इस टीम ने गिलानी का केस लड़ा और उन्हें बरी और रिहा किया गया. लेकिन मौत ने फिर गिलानी का पीछा किया, जब 08 फरवरी 2004 को उनकी वकील नंदिता हकसर के घर के सामने एक अज्ञात हमलावर ने उन्हें पांच गोलियां मारीं. हकसर ने इस हमले के लिए दिल्ली पुलिस को ज़िम्मेदार बताया था.

हालांकि कश्मीर में ज़्यादातर लोगों को संसद पर हमले से पहले गिलानी के राजनीतिक रूझान के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी. संसद हमले में बरी किए जाने के बाद वो स्वनिर्धारण के जम्मू कश्मीर के अधिकार के बारे में ख़ूब खुल कर बोलते रहे हैं.

वो कश्मीर में मानवाधिकारों के ख़राब रिकॉर्ड का मुद्दा भी उठाते रहे हैं.  वो पोटा और सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून (आफ़स्पा) के ख़िलाफ़ देशव्यापी मुहिम का भी हिस्सा रहे हैं. वो मानवाधिकार संगठनों और सिविल सोसाइटी की तरफ़ से होने वाले ऐसे कार्यक्रमों में भी उनकी भागेदारी रहती है.

उन्होंने कई विरोध-प्रदर्शन भी किए हैं. इनमें सबसे ताज़ा नौ फरवरी को दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया का कार्यक्रम है. गिलानी अफ़ज़ल गुरु की फांसी को लेकर भी अपनी नाराज़गी जताते रहे हैं. वो इस बारे में अदालत के आदेश को ‘दोषपूर्ण’ बताते हैं. विडंबना देखिए इन्हीं अदालतों ने उन्हें बरी किया था और एक नई ज़िंदगी दी थी. (BBC Hindi)

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