जयपुर: भ्रष्टाचार सहित अन्य आरोपों की जांच से नेताओं और कर्मचारियों को बचाने के मकसद से विधानसभा में पेश किये अध्यादेश को लेकर राज्य की वसुंधरा सरकार चौतरफा घिर गई है. ऐसे में अब इस अध्यादेश की समीक्षा का फैसला लिया गया है.

NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार रात को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने बैठक बुलाकर अध्यादेश की एक पैनल द्वारा समीक्षा कराए जाने का फैसला लिया. ध्यान रहे इस अध्यादेश के खिलाफ हाईकोर्ट में दो याचिका दाखिल की गई है. बावजूद इसके सोमवार को इस अध्यादेश को विधानसभा में पेश कर दिया गया. इस बिल के विरोध में न केवल कांग्रेस के विधायक है बल्कि बीजेपी विधायकों ने भी इस का विरोध किया है.

अध्यादेश के अनुसार, जजों, न्यायिक अधिकारियों, अफ़सरों और लोक सेवकों के ख़िलाफ़ कोर्ट में परिवाद दायर करना तो मुश्किल होगा. साथ ही अगर किसी ने परिवाद दायर कर भी दिया तो सरकारी मंजूरी के बिना किसी भी मीडिया संसथान के लिए उसे प्रकाशित करना अपराध होगा. अगर कोई ऐसा करता है तो उसे दो साल की सज़ा होगी.

इस अध्यादेश के मुताबिक ड्यूटी के दौरान किसी वर्तमान या पूर्व लोकसेवक, जिला जज या मजिस्ट्रेट की कार्रवाई के खिलाफ कोर्ट में परिवाद दायर किया जाता है तो कोर्ट उस पर तब तक जांच के आदेश नहीं दे सकता, जब तक कि सरकार की स्वीकृृति न मिल जाए.

परिवाद पर जांच की स्वीकृृति के लिए 180 दिन की मियाद तय की गई है. इस अवधि में स्वीकृृति प्राप्त नहीं होती है तो यह माना जाएगा कि सरकार ने स्वीकृृति दे दी है. साथ ही सरकार की और से अनुमति न मिलने तक जिस लोकसेवक के खिलाफ परिवाद है उसका नाम, पता, पहचान उजागर नहीं की जा सकता.

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