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कर्नाटक में लिंगायत समुदाय के हिन्दू धर्म से अलग होने के बाद अब कर्नाटक सरकार ने लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा भी दे दिया है.

राज्य सरकार ने शुक्रवार को लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक श्रेणी में रखने की घोषणा की है. हालांकि, अभी केंद्र सरकार ने लिंगायत समुदाय को अलग धर्म का दर्जा नहीं दिया है और राज्य अब केंद्र के फैसला का इंतजार कर रही हैं. कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इस फैसले को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की अध्यक्षता में शुक्रवार को हुई कैबिनेट मीटिंग में यह  फैसला लिया. बता दें कि राज्य सरकार ने लिंगायतों की लंबे समय से चली आ रही इस मांग पर विचार के लिए हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस नागामोहन दास की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था.

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समिति ने लिंगायत समुदाय के लिए अलग धर्म के साथ अल्पसंख्यक दर्जे की सिफारिश की थी, जिसे कैबिनेट की तरफ से अब मंजूरी मिल गई. लिंगायत को कर्नाटक में फिलहाल ओबीसी का दर्जा मिला हुआ है. बीजेपी के समर्थक माने जाने वाले लिंगायत समुदत के लोगों की कर्नाटक में करीब 17 परसेंट आबादी हैं और 100 विधानसभा सीटों पर इनकी मौजूदगी है.

यही वजह है कि 224 सदस्यों वाली कर्नाटक विधानसभा में 52 विधायक लिंगायत समुदाय से हैं. इसके अलावा लिंगायत/वीरशैव की आस-पास के राज्यों जैसे महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी अच्छी खासी आबादी है. सिद्धारमैया सरकार का कहना है कि इस फैसले को चुनाव से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि ये मांग कई दशकों से उठ रही थी.

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