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बीते दिनों 26  मार्च को रामनवमी के मौके पर बिहार के औरंगाबाद में हुई सांप्रदायिक हिंसा में गोलीबारी से घयल हुए नईम की जान तो बच गई लेकिन वह अब कभी नहीं चल सकेगा.

पेशे से एम्बुलेंस चालक नईम दोनों पैरों से लाचार हो चूका है. साथ ही अब उसके सामने उसके और उसकी परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी है. ऐसे में अब उसे  रोजी-रोटी का डर सता रहा है.

फिलहाल तो राज्य सरकार उसके इलाज का खर्च वहन कर रही है. लेकिन अब आगे और भी होनेवाले खर्चों की चिंता परिजनों को सत्ता रही है. उन्हें डर है तो बस इस बात का कि कहीं आगे होने वाले इलाज के खर्चों से सरकार कहीं अपना हाथ न खींच ले.

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लोगों ने बताया कि नईम की कमाई से ही उसका पूरा परिवार चलता था मगर दिव्यांगता की वजह से अब उसके परिवार के समक्ष दो जून की रोटी की समस्या भी उठ खड़ी हो गयी है.

लोगों की मांग है कि सरकार को उसकी रोज़ी रोज़गार की व्यवस्था करनी चाहिए. अन्यथा पुरे घर को फाको में दिन गुजारने होगे


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