Sunday, September 19, 2021

 

 

 

नागरिकता संशोधन बिल के विरोध में आंदोलनकारियों के परिजनों ने लौटाया सम्मान

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बुधवार को नागरिकता विधेयक का विरोध में असम आंदोलन में लड़ते हुए जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों ने राज्य सरकार द्वारा दिये गये स्मृति चिन्ह लौटा दिया है। बता दें कि राज्य की सर्वानंद सोनोवाल सरकार ने 10 दिसंबर 2016 को एक कार्यक्रम में हर दिवंगत व्यक्ति के परिवार को पांच लाख रुपये और स्मृति चिन्ह दिये थे।

असम आंदोलन के परिजनों के संगठन ‘एसपीएसपी’ के सदस्य विवादित विधेयक के विरोध में ‘ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन’ (आसू) के मुख्यालय ‘शहीद न्यास’ में एकत्रित हुए। इस दौरान 855 लोंगों को मरणोपरांत दिये गये स्मृति चिन्ह को हाथों में थामे परिजनों ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 को लागू करने के केन्द्र के कदम के विरोधस्वरूप स्मृति चिन्ह लौटाने का फैसला किया।

संगठन के प्रमुख राजन डेका ने संवाददाताओं से कहा, ‘नागरिकता विधेयक लोकसभा में पारित हो गया है। यह हम सबके लिए बहुत शर्म की बात है। अगर विधेयक कानून बनता है तो असम आंदोलन के 800 से अधिक शहीदों का बलिदान महत्वहीन हो जाएगा।’

डेका ने कहा, ‘अगर 1971 के बाद असम में घुसने वाले हिन्दू बांग्लादेशियों को भारत में नागरिकता दी जाती है तो उनका बलिदान महत्वहीन हो जाएगा। ये स्मृति चिन्ह हमारे लिए एक समय सम्मान की बात थी लेकिन अब ये महत्वहीन हैं।’ उन्होंने कहा कि असम आंदोलन में प्राण न्यौछावर करने वाले लोगों के परिजन अपने अपने क्षेत्र के जिला उपायुक्तों को स्मृति चिन्ह लौटाएंगे।

बता दें कि, नागरिकता संशोधन बिल पर शुरू हुआ बवाल बढ़ता ही जा रहा है। बीते दिनों राज्य में भारतीय जनता के बड़े नेता ने पार्टी छोड़ दी थी। यहां के पूर्व विधायक और भाजपा नेता राजेश्वर देबबर्मा ने पार्टी छोड़ दी। देबबर्मा ने पश्चिम त्रिपुरा के माधबर में गोली से घायल हुए तीन लोगों पर पुलिस कार्रवाई और नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दिया था।

इसके साथ ही उन्होंने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब को एक पत्र भी लिख था। जिसमें उन्होंने कहा, ‘बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने नागरिकता संशोधन बिल 2016 को लोकसभा में पास कर त्रिपुरा की जनता के साथ नस्लीय भेदभाव और बुरे व्यवहार का अपना असली चेहरा दिखाया है।’

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