बाल विवाह निषेध अधिनियम को लेकर एक मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला आया है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मुस्लिम जोड़े पर बाल विवाह निषेध अधिनियम लागू नहीं होता है। यदि दोनों ने यौन परिपक्वता हासिल कर ली है और 15 साल से ज्यादा आयु है तो वे परिजनों की मर्जी के खिलाफ जाकर निकाह कर सकते हैं।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने यह आदेश प्रोटेक्शन होम में मौजूद 16 साल की पत्नी को वापिस पाने के लिए पति द्वारा दाखिल की गई याचिका पर सुनाया है। मेवात निवासी मोहम्मद शमीम ने हाईकोर्ट को बताया कि 3 जून को उसने शादी की थी और इसके बाद सुरक्षा के लिए हाईकोर्ट के समक्ष याचिका दाखिल की थी।  हाईकोर्ट के आदेश पर दोनों को प्रोटेक्शन होम में रखा गया। इसी बीच याची के खिलाफ उसकी पत्नी के परिजनों ने मामला दर्ज करवा दिया था।
पुलिस ने याची को गिरफ्तार कर लिया था और बाद में निचली कोर्ट ने जमानत दे दी थी। जब याची ने उसकी पत्नी को प्रोटेक्शन होम से वापस लाने का प्रयास किया तो पुलिस ने उसके नाबालिग होने की बात कहते हुए उसकी कस्टडी सौंपने से इनकार कर दिया। याची ने पुलिस की हिरासत से पत्नी को छुड़ाने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।
nikah
हाईकोर्ट ने इस याचिका पर बेहद अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि यह मामला एक मुस्लिम जोड़े का है। मुस्लिम धर्म की अकील अहमद द्वारा प्यूबेरिटी एंड मेजोरिटी पुस्तक के अनुसार यौन परिपक्वता पाने के बाद कोई भी लड़का या लड़की जिससे चाहे शादी कर सकता है और इसमें अभिभावकों की मंजूरी जरूरी नहीं है।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने कहा कि निकाह मुस्लिम पर्सनल लॉ एप्लिकेशन एक्ट 1937 के तहत हुआ है जो एक स्पेशल एक्ट है। बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 एक सामान्य एक्ट है। जहां पर भी स्पेशल एक्ट होता है वहां पर सामान्य एक्ट प्रभावहीन होता है।
ऐसे में लड़की की आयु 16 साल थी इस आधार पर उसकी शादी को अवैध नहीं माना जा सकता। मुस्लिम जोड़े की शादी की स्थिति में उनकी यौन परिपक्वता ही न्यूनतम आयु है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने हरियाणा पुलिस को याची की पत्नी को उसे सौंपने के आदेश दिए हैं।
Loading...