2005 के दिल्ली सीरियल बम धमाकों में कोर्ट का फैसला आ गया है। पटियाला हाउस कोर्ट ने मोहम्मद रफीक शाह और मोहम्मद हुसैन फजीली को सभी आरोपों से बरी कर दिया है।

मुहम्मद रफीक को जिस समय पुलिस ने गिरफ्तार किया था. उस समय उसकी उम्र केवल 22 साल की थी. इस दौरान वः एमए के फाइनल ईयर में था. वह पीएचडी की तैयारी करना चाहता था. उसकी मां ने बताया जिस समय दिल्ली में ब्लास्ट हुआ तो वह अपनी क्लास में पढ़ाई कर रहा था. इस बलास्ट में उसका नाम आएगा उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था. जिस समय कोर्ट उनके बेटे को बरी किया तो उनके आंखों में आसूं आ गए. उनका कहना है कि उन्हें ऐसे जैसे उन्होंने अपने बेटे को दोबारा जन्म दिया है.

वहीं मोहम्मद रफ़ी शाह के पिता का कहना है कि उन्हें अपने बेटे पर पूरा भरोसा था. वह उसे हमेशा अच्छी किताबें खरीकर लाते थे और उसे पढ़ने के लिए देते थे. वह हमेशा अपनी कक्षा में प्रथम आता था. लेकिन उन्हें नहीं पता था कि  21 नवंबर 2005 को उनके बेटे की जिंदगी बदल देगा. लगातार वह अपने बेटे को निर्दोश साबित करने के लिए गुहार लगाते रहे. मगर कोई नहीं माना. कोर्ट का फैसला 12 साल बाद आया. इससे उनके बेटे की तो जिंदगी पूरी तरह बदल गई है. वह तो पढ़ना चाहता था. मगर उसका तो सपना ही टूट गया.

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क्या है मामला :

29 अक्तूबर, 2005 में धनतेरस के दिन सरोजनी नगर मार्केट में आतंकियों ने धमाका किया था. 2 धमाके सरोजनी नगर और पहाडग़ंज जैसे मुख्य बाजारों में हुए, जबकि तीसरा धमाका गोविंदपुरी में एक बस में हुआ. दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने उक्त अपराध के लिए तारीक अहमद, मोहम्मद हुसैन फैजली और मोहम्मद रफीक शाह को गिरफ्तार किया था. वर्ष 2008 में अदालत ने तीनों पर भारत के खिलाफ जंग छेडऩा, हत्या, हत्या के प्रयास और आ‌म्र्स एक्ट के तहत आरोप तय किए थे.

इस केस के जांच अधिकारी स्पेशल सेल के तत्कालीन एसीपी और वर्तमान डीसीपी संजीव यादव थे.दिल्ली पुलिस ने डार के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किया था. इस चार्जशीट में उसके कॉल डिटेल्‍स का जिक्र भी किया गया, जिससे कथित तौर यह बात सामने आई कि वह लश्कर-ए-तैयबा के अपने आकाओं से कनेक्‍शन में था.  इस मामले में पुलिस ने अक्टूबर 2005 में  धमाकों के सिलसिले में तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज की थीं.

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