मुजफ्फरनगर: दंगा पीड़ित मुस्लिमों को वापस ला रहा ये हिन्दू शख्स

11:12 am Published by:-Hindi News
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5 साल पहले यूपी के मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों के चलते बड़े पैमाने पर मुस्लिमों को पलायन करना पड़ा था। इस पलायन की भेंट शाहपुर क्षेत्र स्थित गांव दुल्हेड़ा भी चड़ा था। जिसके चलते 65 मुस्लिम परिवारों को अपना घर बार सब कुछ छोड़ना पड़ा था। हालांकि एक शख्स है जो इन लोगों को फिर से बसाने में लगा हुआ है।

संजीव प्रधान इनमें से 30 परिवारों को  वापस ला चुके हैं। दंगे के दौरान भी प्रधान ने कई मुस्लिम परिवारों की मदद की और उन्हें अपने घर पर शरण दी थी।

4 साल बाद गांव लौटकर आईं अफसाना बेगम बताती हैं, ‘मुझे याद है कि कैसे वह (संजीव) और उनके साथी हमारी मस्जिद की सुरक्षा कर रहे थे। उन्होंने किसी को इसे छूने तक नहीं दिया। उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर हमारी सुरक्षा की। अगर वह कहते हैं कि हमें वापस आना चाहिए, तो मैं बिना दो बार सोचे उन पर यकीन कर लूंगी।’

मुस्लिमो को वापस लाने पर संजय कहते हैं कि वह लोगों को उनके गुणों के आधार जज करते हैं न कि धर्म के आधार पर। वह कहते हैं, ‘मुसलमान खराब हैं? या हिंदू खराब हैं? मैं कहता हूं इंसान खराब हैं। हमें लड़ने और बदलाव की उम्मीद की जरूरत है। मैं सिर्फ वही कर रहा हूं।’

उनके एक समर्थक नवाब सिंह कहते हैं, ‘संजीव प्रधान ने 2015 में प्रधान का चुनाव जीता था और इसके पीछे अल्पसंख्यकों को दंगों में बचाने के लिए उनका प्रयास प्राथमिक वजह बना। कुछ हिंदू भी उन्हें ताने मारते हुए ‘सलाम-अलाइकुम’ बोलने लगे थे और दावा करते थे कि वह अब लगभग मुस्लिम ही हैं।’

दंगा पीड़ितों में से एक बाला बानो  उन दिनों को याद करते हुए आज भी कांप जाती हैं। वह कहती हैं, ‘हम डर और अनिश्चितता से भरे हुए थे। अगर संजीव वहां नहीं होते तो हम बच नहीं पाते।’ वह आगे बताती हैं, ‘सितंबर 2013 के पहले से जब स्थिति ज्यादा बिगड़नी शुरू हो गई थी तो संजीव ने हमारे घर के आदमियों को वापस बुला लिया जो उस समय शहर से बाहर गए हुए थे और सुरक्षा की दृष्टि से हम सबको संजीव अपने घर ले गए। वह हर रात घर से बाहर चौकन्ना होकर बैठे रहते थे। हमारी जिंदगी पर उनका उधार है।’

वहीं अफसाना बताती है कि कैसे संजीव ने 300 से ज्यादा मुस्लिमों के लिए पलहेरा और शाहपुर के राहत कैंपों में व्यवस्था की थी। उन्होंने बताया, ‘वह भी हमारे साथ राहत कैंपों में आना चाहते थे, लेकिन हमने उन्हें बोला कि वह अपनी जान जोखिम में न डालें। हालांकि उन्होंने हमारे लिए बग्घियों की व्यवस्था की जिसकी मदद से हम राहत कैंप तक पहुंच पाए। हम काफी डरे हुए थे लेकिन उनके साथी जो सभी जाट थे पूरे रास्ते हमारे साथ चले और हमारी रक्षा की।’

राहत कैंप से अपने घर वापस आए साजिद अहमद ने कहा, ‘मुस्लिम परिवारों के पास बहुत अधिक खेत नहीं है और इसलिए घर चलाने के लिए जानवरों पर ही निर्भर रहते हैं। यह एक बड़ी राहत और खुशी की बात थी कि जब हम अपने घर वापस आए और हमारे जानवर सुरक्षित मिले।’

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