जम्मू कश्मीर को लेकर भारतीय मीडिया में रोजाना होने वाली आक्रामक बहसों पर मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने अपनी तीखी नाराजगी जाहिर की है.

12 फ़रवरी को बजट सत्र के अंतिम दिन अपने भाषण में उन्होंने चैनलों के रवैये पर चिंता जताते हुए कहा कि “कुछ टीवी चैनल ऐसा माहौल बना रहे हैं जहाँ वार्ता के बारे में बात करना भी देशद्रोह हो गया है. वे बहस के नाम पर कश्मीर के कुछ ऐसे लोगों को बैठा लेते हैं जिन्हें उनके मुहल्ले में भी कोई नहीं जानता. उन्हें चुना ही इसलिए जाता है कि वे भारत के ख़िलाफ़ गंदी ज़बान का इस्तेमाल करते हैं. उनका जवाब देने के लिए भी ऐसे ही लोगों को बैठाया जाता है.” उन्होंने आरोप लगाया कि टी.वी.चैनल कश्मीर के तंदूर में टीआरपी की रोटियाँ सेंक रहे हैं.

हालांकि ये पहली बार नहीं है इससे पहले पिछले साल जुलाई में दिल्ली स्थित थिंक टैंक BRIEF द्वारा आयोजित सेमिनार “अंडरस्टैंडिंग कश्मीर” में भी उन्होंने कहा था कि “मुझे दुख है कि दिल्ली स्थित कुछ न्यूज़ ऐंकर जिस तरह के भारत की बात कर रहे हैं, वह वैसा भारत नहीं जिसे मैं जानती थी. वे कश्मीर की बेहद ग़लत तस्वीर पेश करते हैं …. जब मैं उस तरफ़ (पाकिस्तान) के दाढ़ीवालों और इस तरफ़ के मूँछ वालों को टीवी पर फेफड़े फाड़कर चीखते देखती हूँ तो यही लगता है कि वे भारत और पाकिस्तान के बीच हुई लड़ाइयों से जुड़ी कुँठा निकाल रहे हैं…”

इसी तरह क़रीब एक महीने पहले जम्मू कश्मीर के लिए नियुक्त किए गए केंद्र सरकार के विशेष प्रतिनिधि दिनेश्वर शर्मा  ने भी गृहमंत्री राजनाथ सिंह से आग्रह किया था कि वे ऐसे कुछ न्यूज़ चैनलों के अधिकारियों के साथ मीटिंग करें और उन्हें कश्मीर के ख़िलाफ़ ज़हरीले प्रचार से बाज़ आने को चेताएँ.

उन्होंने कहा था कि कम से कम चार चैनल ऐसे हैं जो लगातार कश्मीर घाटी को लेकर बढ़ा-चढ़ाकर ऐसी ख़बरें प्रसारित करते हैं जो कश्मीर में शांति लाने की केंद्र की कोशिश को बेमानी बनाती हैं





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