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देश भर में किसान, मजदुर और गरीब तबके के लोगों को कर्ज मिलना बहुत ही मुश्किल काम है. अगर कर्ज भी मिलता है तो वह भी ब्याज से. जिसे चुकाने में वे असमर्थ होते है. जिसके चलते कई किसान अपनी जीवनलीला आत्महत्या कर समाप्त कर चुके है.

ऐसे में बिहार की अलखर को-ऑपरेटिव क्रेडिट सोसायटी लिमिटेड बड़ी मिसाल पेश कर रही है. ये मुस्लिम सोसायटी रोजी-रोटी के लिए अपना कारोबार खड़ा करने के लिए ब्याजमुक्त कर्ज दे रही है. सोसायटी न केवल मुस्लिमों को बल्कि हिन्दुओ को भी बिना ब्याज का कर्ज दे रही है. करीब 9,000 हिंदुओं को इस सोसायटी ने कारोबार खड़ा करने के लिए कर्ज दिया है. इनमें में ज्यादातर लोग वेंडर, छोटे कारोबारी, पटरियों पर दुकान चलाने वाले, सीमांत किसान और महिलाएं हैं.

पटना के मिरशिकर टोली में दुकान चलाने वाली कमला ने कहा, ‘मैं सड़क किनारे पटरियों पर आलू और प्याज बेचती थी. इसके लिए 2,000 से 5,000 रुपये साहूकारों से सूद पर कर्ज लेती थी और उनके कर्ज तले हमेशा दबे रहती थी. लेकिन कुछ साल पहले जब मुझे किसी ने कहा कि अल खर सोसायटी बिना ब्याज के कर्ज देती है तो हैरान हो गई.’ दुकान चलाने के लिए उसने सबसे पहले सोसायटी से 10,000 रुपये कर्ज लिया. उसके बाद उसने सोसायटी से 20,000 रुपये से 50,000 रुपये तक कर्ज लिया. कमला ने कहा, ‘सोसायटी से कर्ज लेकर मैंने छोटे से खोमचे की दुकान से अपना कारोबार बढ़ाकर थोक की दुकान खोल ली.’

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कमला के पास अब इतने पैसे हैं कि वह अपने दो बेटों की पढ़ाई की व्यवस्था खुद कर पा रही है. उसका एक बेटा इंजीनिरिंग कॉलेज में पढ़ता है और दूसरा बीएड कर रहा है. इस्लामिक मूल्यों का पालन करते करीब 20,000 लोगों को 50 करोड़ रुपये का कर्ज दिया है. इनमें ज्यादातर वे लोग शामिल हैं जो रोजी-रोटी चलाने के लिए संघर्ष कर रहे थे.  कमला की तरह गीता देवी ने भी सड़क किनारे सब्जियों की अपनी छोटी दुकान की जगह अब बड़ी सी दुकान खोल ली है. उसने अपने बेटे को भी सब्जी की एक दुकान खुलवा दी है.

अलखर सोसायटी के प्रबंध निदेशक नैयर फातमी ने बताया कि ब्याजमुक्त कर्ज की आमपसंदी बढ़ रही है.  उन्होंने कहा, ‘जिनकी पहुंच बैंक तक नहीं हो पाती है उनके लिए पांच से 10,000 रुपये की छोटी रकम भी काफी अहम होती है. ब्याजमुक्त कर्ज पाने वाले लोगों में करीब 50 फीसदी हिंदू हैं. ज्यादातर लोग अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए कर्ज लेते हैं जिससे उनका सशक्तीकरण हो रहा है.’

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