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26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर तिरंगा यात्रा के नाम पर की गई मुस्लिमों के खिलाफ सुनियोजित रूप से हिंसा में स्थानीय मुस्लिमों के कारोबार को चुन-चुन कर निशाना बनाया गया, उनकी दुकानों को, प्रतिष्ठानों को आग के हवाले कर दिया गया.

दंगाइयों का इस हिंसा के पीछे मकसद मुस्लिम समुदाय को सड़क पर लाना था, जिसमे वे कामयाब भी हुए. लेकिन साथ ही दंगाइयों ने उन सैकड़ों हिंदूओं को भी रोटी को मोहताज कर दिया. जो इन मुसलमानों की दुकानों पर काम कर अपना पेट पालते थे.

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वीर बहादुर नाम के एक शख्स ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि मुस्लिम समुदाय की पांच दुकानों में करीब 20 हिंदू कर्मचारी थे जो कि दुकानें जलने के बाद बेरोजगार हो गए हैं और वे काफी निराश हैं. वीर बहादुर ने कहा “मैं पिछले सात सालों से बाबा शू कंपनी में काम कर रहा था. मुझे रोजाना 180 रुपए मिलते थे लेकिन अब मुझे नहीं पता मैं क्या करूं. मैं कोई दूसरी नौकरी ढूंढ रहा हूं.”

बाबा शू कंपनी के मालिक सरदार अली खान ने इस मामले पर बात करते हुए कहा “बहादुर ने मुझे कई बार फोन कर पैसे मांगे हैं. मैं उसे 500 रुपए दे सकता हूं लेकिन उसे कहीं और नौकरी ढूंढनी होगी.” सरदार अली खान ने कहा “इस हिंसा में आठ लाख रुपए का सामान खराब हो गया, मैं कैसे दोबारा यह दुकान बनाऊंगा?” उन्होंने बताया कि उनके यहां छह लोग काम करते थे जिनमें से चार हिंदू हैं.

इसी तरह इस हिंसा में मंसूर अहमद की भी दुकान जला दी गई जिसकी दुकान में छह हिंदू काम करते थे. इस पर बात करते हुए मंसूर अहमद ने कहा कि वह अपनी ज्यादातर सेविंग अपनी बीवी के इलाज पर खर्च कर चुके हैं जिसकी दो साल पहले मौत हो गई. इलाज के दौरान उन्होंने बहुत कर्जा लिया था जिसे वे अभी तक चुका रहे हैं.

मंसूर अहमद ने कहा “मेरी दुकान में 50 लाख का सामान था और 1.75 लाख रुपए नकद थे जो कि आग में सब जल गए. छह हिंदू कर्मचारियों में सो दो बाबू राम और राहुल ने मुझे पैसों के लिए फोन किया लेकिन मेरे पास पैसे नहीं है जिसके कारण उन्हें पैसे नहीं दे सकता.”

बाबू राम पिछले 20 सालों से मंसूर अहमद के पास कर रहा था. बाबू राम ने कहा “बेरोजगार हो गए हैं. जितना होगा उतनी मंसूर साहब की मदद करेंगे लेकिन हमें भी पेट पालना है. जिन लोगों ने दुकानें जलाईं उनको पता ही नहीं इस दुकान के ज्यादातर कर्मचारी हिंदू हैं.”

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