लखनऊ: ‘तलाक: हकीकत और गलतफहमी’ विषय पर आयोजित सेमिनार में ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने स्पष्ट रूप से कहा कि तीन तलाक को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है. इस्लाम में तीन तलाक हराम है. लेकिन इस पर पाबंदी लगाना शरियत में दखलंदाजी करना हैं जो किसी भी कीमत पर संभव नही हैं.

इस मौके प अंजुमन फलाह-ए-दारैन के अध्यक्ष मौलाना जहांगीर आलम कुरआन में साफ तौर पर बयां किया गया है कि तलाक से पहले रिश्ते को बचाने के लिए सभी कोशिशें करनी चाहिए. इस्लाम में तलाक के तीन तरीके दिए गए है. पहला तलाक-ए-अहसन है. जिसमें पति अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है. अच्छी बात यह है कि इद्दत तक अगर दोनों में समझौता हो जाता है तो दोनों फिर से अपनी जिंदगी शुरू कर सकते हैं. इद्दत के बाद उनको फिर से निकाह करना होगा. इस्लाम में तलाक का सबसे बेहतर तरीका तलाक-ए-अहसन है. इसके बाद तलाक-ए-हसन. इसमें पति तीन अलग-अलग समय में पत्नी को तलाक देता है. इसमें भी तलाक-ए-अहसन की तरह फिर से निकाह किया जा सकता है. तीसरा तलाक-ए-सलासा (तीन तलाक) को इस्लाम में हराम करार दिया गया है.

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सेमिनार में पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव ज़फरयाब जिलानी ने कहा कि तीन तलाक पर पाबंदी लगाकर शरीयत में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता. उन्होंने आगे कहा, दारुल कजा को सजा देने का अधिकार नहीं है. इसलिए यदि कोई तीन तलाक को हथियार बनाता है तो कोर्ट और सरकार उसको सजा दे. जैसा पहले भी होता था.

उन्होंने कहा कि हम मानते हैं कि कई मामलों में तीन तलाक का गलत फायदा उठाया गया है लेकिन इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि तीन तलाक को खत्म कर दिया जाए. जिलानी ने कहा कि कई उदाहरण ऐसे भी सामने आए हैं जिसमें तीन तलाक ने कई महिलाओं को जीवन बचाया है.उन्होंने कहा कि इस वक्त इस्लाम को बदनाम करने के लिए तीन तलाक को मुद्दा बनाया जा रहा है.

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