देश में एक तरफ हिन्दू-मुस्लिम किया जा रहा है तो दूसरी और अन्न के अभाव में लोग भूखे मरने को मजबूर हैं। राजधानी दिल्ली में तीन बच्चियों की मौत के बाद अब झारखंड के रामगढ़ जिले में 40 वर्षीय आदिवासी व्यक्ति की भूख से मौत हो गई।

मांडू खंड के नवाडीह गांव के रहने वाले राजेंद्र बिरहोर के घर में न तो अनाज था और नही राशनकार्ड। हालांकि हर बार की तरह जिला प्रशासन के अधिकारियों ने इस बार भी भूख से मौत होने की बात से इनकार किया है और कहा कि बिरहोर की मौत बीमारी के चलते हुई है।

अगर प्रशासन की बात पर भरोसा भी किया जाये तो फिर सवाल उठता है कि आखिर प्रशासन ने क्यों उसके घर में दो क्विंटन अनाज पहुंचाया।  बिरहोर की पत्नी शांति देवी (35) ने बताया कि उसके पति को पीलिया था और उसके परिवार के पास इतना पैसा नहीं था कि वे उसके लिये डॉक्टर द्वारा बताया गया खाद्य पदार्थ और दवाई खरीद सकें।

शांति ने बताया कि उसके परिवार के पास राशन कार्ड नहीं था जिससे वे राज्य सरकार की सार्वजनिक वितरण योजना के तहत सब्सिडी वाले अनाज प्राप्त कर पाते। छह बच्चों के पिता बिरहोर परिवार में एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे। उन्हें हाल में यहां के राजेंद्र इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में भर्ती कराया गया था। इलाज के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी।

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मांडू के खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) मनोज कुमार गुप्ता ने आदिवासी व्यक्ति की भूख से मौत की बात से इनकार किया है। लेकिन बीडीओ ने स्वीकार किया कि परिवार के पास राशन कार्ड नहीं था। उन्होंने शांति देवी को अनाज और परिवार के लिए 10,000 रुपये दिए। उन्होंने कहा, ‘हम इस बात की जांच कर रहे हैं कि उनके परिवार का नाम सरकार की ओर से दी जाने वाली सब्सिडी युक्त राशन पाने वालों की सूची में क्यों नहीं दर्ज था।’

बता दें कि दिल्ली के मंडावली में एक ही परिवार की तीन बच्चियों की ‘भूख’ से मौत हुई थी। तीनों लड़कियों की उम्र दो, चार और आठ साल की थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया था कि बच्चियों के पेट में अन्न का एक दाना नहीं था।