मुजफ्फरपुर: 1857 के गदर में देश की आजादी के लिए हँसते-हँसते फांसी पर झूल गए वारिस अली को 159 साल बाद स्वतंत्रता सेनानी मानने की पहल शुरू हुई हैं. जिला प्रशासन ने अब इस विषय पर गृह विभाग को अपनी अनुसंशा भेजी है.

बिहार के मोतीपुर के बरूराज पुलिस चौकी के तत्कालीन जमादार वारिस अली को 1857 के गदर के दौरान ही अंग्रेजों ने वारिस अली को फांसी दे दी थी. वारिस अली को 1857 में 12 हजार किसानों द्वारा जेल का घेराव करने और विद्रोहियों का सहयोग करने के आरोप में अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी. वारिस अली दिल्ली के मूल निवासी थे और उन्हें फांसी दिये जाने के बाद से उनके परिवार के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

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पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने वारिस को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिए जाने को लेकर मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन को कई पत्र लिखे थे. सिंह के अलावा दिल्ली स्थित न्यू इंडिया फाउंडेशन के प्रबंध न्यासी कैसर इमाम ने भी मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन के समक्ष वारिस अली को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिये जाने के लिए आवेदन किया था.

मुजफ्फरपुर के जिला अधिकारी धर्मेन्द्र सिंह ने बताया कि इस बारे में प्रधान सचिव :गृह विभाग: को अनुशंसा भेजी गई है. जिसमे वारिस अली को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा दिये जाने के संबंध में दो पुस्तकों को भी आधार बनाया गया है इन किताबों में इनके योगदान का विस्तृत उल्लेख है. इसके साथ ही 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में वारिस अली के महत्वपूर्ण योगदान के संबंध में कई इतिहासकारों के आलेख के साथ साक्ष्य प्रस्तुत किया.

पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने भाषा से कहा कि पिछले एक वर्ष के दौरान मैंने कई बार मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन को पत्र लिखा.

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