गुजरात: 5 साल में दलितों के खिलाफ 32% बढ़ा क्राइम, एक साल में अत्याचार के 1545 मामले

गुजरात में 2013 से 2017 के दौरान दलितों के खिलाफ 32% और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के खिलाफ क्राइम 55% बढ़ गया है। यह खुलासा विधानसभा सत्र के दौरान हुआ। गुजरात सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री ईश्वर परमार ने इस बात की जानकारी दी।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2013 में दलित उत्पीड़न के 1147 केस दर्ज हुए थे। वहीं, 2017 में दलित उत्पीड़न से संबंधित 1515 मामले दर्ज किए गए। वहीं, साल 2018 में मार्च तक दलित उत्पीड़न के 414 मामले सामने आए। इनमें से सबसे ज्यादा केस अहमदाबाद (49) दर्ज हुए। इनके बाद जूनागढ़ (34), भावनगर (25), सुरेंद्रनगर (24) और बनासकांठा (23) का नंबर आता है।

गुजरात में 2018 में दलित अत्याचार की जो घटनायें बनी है उसमे चौंका देने वाली बात यह है कि इसमें एक साल में 22 दलितों की हत्याएं शामिल हैं। दलित महिला पर बलात्कार की 104 घटनायें बनी हैं। आगजनी के सात मामले और अन्य अपराध के 1331 मामले पुलिस में दर्ज किये गये हैं।

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इसके अलावा राज्य में अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ क्राइम के मामले ज्यादा तेजी से बढ़े हैं। 2013 से 2017 के दौरान 5 साल में अनुसूचित जनजातियों के खिलाफ क्राइम के मामले 55 प्रतिशत बढ़कर 1310 तक पहुंच गए। इसके अलावा साल 2018 के पहले 3 महीनों में ही ऐसे 89 मामले दर्ज हुए, जिसमें अनुसूचित जनजाति के लोग पीड़ित थे। इनमें सबसे ज्यादा केस भरूच (14),  वडोदरा (11) और पंचमहल (10) में दर्ज हुए।

दलित अधिकार कार्यकर्ता कौशिक परमार ने कहा कि गुजरात के ये आंकडे सोचनीय है। जब कभी दलित पर अत्याचार होता है तो उसके लिये पुलिस में एफआइआर दर्ज कराना मुश्किल हो जाता है। राजकोट के एक गांव में दलित की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। सरकार ने सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय खोल रखा है, लेकिन यह मंत्रालय दलितों को न्याय दिलवाने में विफल रहा है।

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