सौ साल गुज़र चूका और हम सब उस बीते हुए समय को आज फिर से जीना चाह रहे हैं। चंपारण सत्याग्रह भारत ही नहीं बल्कि पुरे विश्व में ब्रिटिश साम्राज्य के लिए एक चुनौती थी। १९१७ का चंपारण सत्याग्रह मोहन दास को महात्मा बना रहा था तब बापू के क़ातिल गोडसे का पता तो नहीं था पर ब्रिटिश हुकूमत ने कई बार गांधी को ख़त्म करने की कोशिश ज़रूर की थी।

चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के अवसर पर सरकार और अलग अलग संगठनों द्वारा बहुत सारे कार्यक्रमों का आयोजन जारी है। पटना स्थित ए एन सिन्हा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल स्टडीज के पूर्व निदेशक और गांधीवादी डॉ. डी एम दिवाकर कहते हैं, ‘नेताओं की कोशिश इन आयोजनों के जरिये जनता में अपनी भ्रम वाली छवि पैदा करना है। इसके ज़रिये वे सत्ता हासिल करते हैं और फिर इसे बनाए रखने की कोशिश करते हैं।’ हालांकि, इसके साथ वे इस तरह के आयोजनों को इस मायने में महत्वपूर्ण बताते हैं कि इनके जरिये गांधीवादी विचारधारा की मूल बातों को लोगों तक पहुंचाया जा सकता है।

सरकार द्वारा प्रायोजित कार्यक्रमों के आयोजन से इतर देश के कुछ प्रबुद्ध लोगों और समाजिक संगठनों ने बीते पांच सितम्बर से चंपारण सत्याग्रह शताब्दी यात्रा की शुरुआत मुज़फ्फरपुर से की है जो अगले २४ सितम्बर को चंपारण (मोतिहारी) में ख़त्म होगी। चंपारण सत्याग्रह शताब्दी यात्रा में जहाँ ८० साल के प्रो. सफी अहमद, पूर्व विधान परिषद् सदस्य और बिहार में शिक्षा आंदोलन के जनक हैं वहीँ २५ साल की युवती दिब्यता, नौजवान समाज सेवी और जे.एन.यु. पूर्व छात्र मोहम्मद इम्तेयाज़ भी है। सांस्कृतिक कार्यक्रम का संचालन नन्द लाल कर रहे हैं।

इस यात्रा का उद्देश बताते हुए समाज सेवी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पूर्व छात्र संगठन मुम्बई के अध्यक्ष और सेवक फाउंडशन के चेयरमैन तनवीर आलम ने कहा की गांधी जिस अंतिम आदमी की बात करते थे वह आज भी उतना ही जूझ रहा है जितना आज़ादी से पहले। इस लिए आज ये अधिक आवश्यक हो गया है की जनमानस के बीच जा कर उनकी समस्याओं को देखे समझे जाने के साथ जन भागीदारी से हल करने की कोशिश ही न की जाये बल्कि मौजूदा राजनीति के उदासीन स्वरुप में मुखरता से आवाज़ बुलंद की जाए।

यात्रा के पूर्व आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जाने माने एक्टिविस्ट और राष्ट्र सेवा दल के अध्यक्ष सुरेश खैरनार ने कहा की गांधी का चंपारण सत्याग्रह भारत में अंग्रेजों के खिलाफ किया गया पहला सफल आन्दोलन था लेकिन विडंबना ये है की आज सौ साल बाद भी किसानों की हालत में कोई ठोस सुधार नहीं आया है। अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद होने के बाद भी देश में पांच लाख किसानों की आत्महत्या कोई साधारण बात नहीं है। बिहार विधान परिषद् के पूर्व सदस्य प्रो. वसी अहमद इस बात के लिए चिंतित हैं की शिक्षा की हालत न केवल बद से बदतर होती जा रही है बल्कि सरकारी शिक्षण संस्थाओं की लगातार बिगड़ती सुरत ही निजी शिक्षण संस्थानों को फलने फूलने में मददगार साबित हो रहा है जिसे सरकार सुनियोजित तरीके से मदद कर रही है। यात्रा के संयोजक और राष्ट्र सेवा दल के राष्ट्रीय महामंत्री शाहिद कमाल के पास 20 दिन की यात्रा का विस्तृत विवरण है। हर दिन विभिन्न जगहों पर लोगों से संवाद के साथ स्थानीय समस्या के बारे में बात करते हुए शहीद कमाल कहते हैं” 70 साल की आज़ादी के बाद भी हमारी सरकारों ने कभी स्थायी निदान का उपाय नहीं सोचा और राहत के लूट का खेल चलाती रही ,अब समय आ गया है की राहत नहीं बाढ़ के स्थायी निदान के समबन्ध में सोचें, बाढ़ का कारण नेपाल है ऐसा कहकर लोगों को बेवकूफ बनाने का काम बंद होना चाहिए।

समाजवादी समागम, जनआंदोलनों के राष्ट्रीय समन्यवय, नशा मुक्त भारत के राष्ट्रीय संयोजक, पूर्व विधायक डॉ. सुनीलम ने कहा की अब समय आ गया है की झूठ को झूठ कहा जाए। देश के प्रधानमन्त्री ने जगह जगह झूठ बोला है। नोटबंदी पर झूठ, जनधन पर झूठ, जनता से हज़ारों झुठे वादे। देश में कुल 24 करोड़ परिवार जो जनधन खाते के दायरे में आते हैं और प्रधानमन्त्री ने 30 करोड़ जनधन खाते खुलवाने का एलान कर दिया। फसल बीमा को किसान क्रांति की योजना बताया लेकिन इस योजना के नाम पर 22,000 करोड़ का प्रीमियम किसानो से वसूला गया और केवल 8,000 करोड़ का मुआवज़ा किसानो को दिया गया। डॉ. सुनीलम ने कहा की मोदी के झूठ को पूरी मज़बूती से झूठ कहा जाना चाहिए।

चंपारण सत्यग्रह शताब्दी यात्रा की एक सभा को संबोधित करते हुए सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीय अधक्ष डॉ. प्रेम सिंह ने कहा की देश में इस समय जो सरकार है वो कॉर्पोरेट घरानों के एजेंट का काम कर रहीं हैं। जनमुद्दों और समस्याओं से इन्हें कोई सरोकार नहीं। हम आपसी भाईचारा को ख़त्म कर समाजी भेदभाव को मज़बूत कर के तरक्की नहीं कर सकते। इसलिए गांधी जी के विचारों को हर तरफ पहुँचाना हमारी ज़िम्मेदारी है ताकि ये देश गांधी के सपनों का हो।

देश भर में सरकार द्वारा प्रायोजित कार्यकर्म जारी है ऐसे में पूरी तरह से जन भागीदारी के साथ आम लोगों तक पहुँच कर गांधी के विचारों को ख़ास तौर पर युवा पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रयास कहाँ तक कामयाब होगा इसका जवाब देते हुए अलीगढ मुस्लिम विश्व विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और समाज सेवी तनवीर आलम का कहना है की हमारा उद्देश सरकार की तरह खानापूर्ति नहीं है हम साफ़ मंशा से निकले हैं और लोगों के बीच जा कर संवाद कर रहे हैं। देश में इस वक़्त सब से ज़यादा ख़तरा सच बोलने पर है ,दाभोलकर हो या गौरी लंकेश सब के लिए कहीं न कहीं से कोई गोडसे निकल आता है। मारे जाने की धमकिओं का डर है, खौफ का साया बना हुआ है ,ऐसे समय में गांधी के विचारों को जीना कितना मुश्किल है जब कोई बत्तख मियां मौजूद नहीं है जो हमे बता सके की दूध के गिलास में ज़हर है।

तारिक एकबाल
पटना

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