बरेली – बरेली के दरगाह आला हजरत मदरसे ने एक फतवा जारी कर सूफी सुन्नी बरेलवी की मस्जिदों में वहाबी मत के लोगों के घुसने पर पाबंदी लगा दी है। मौलानाओं ने फतवा जारी करते हुए कहा कि वहाबी मत को मानने वाले ‘हिंसा में यकीन रखने वाले कट्टरपंथी होते हैं।’ फतवे में कहा गया है कि इनसे उलट सूफी सुन्नी बरेलवी शांति और अमन पसंद होते हैं।

फतवे में आगे लिखा गया है कि अगर वहाबी मत को मानने वाला कोई भी व्यक्ति सूफी सुन्नी बरेलवी मत की मस्जिदों में घुसता है, तो या तो उसे बाहर निकल जाने के लिए कहना चाहिए, या फिर लोगों को पुलिस को इस बारे में जानकारी देनी चाहिए।

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गुजरात के निवासी मुहम्मद अली द्वारा किए गए एक सवाल का जवाब देते हुए यह फतवा जारी किया गया। यह फतवा जारी करने वाले मौलवी मुफ्ती मुहम्मद सलीम नूरी ने सोमवार को हमें बताया, ‘वहाबी मत मानने वाले मुस्लिमों और बरेलवी मत मानने वाले मुस्लिमों की विचारधारा में बहुत ज्यादा अंतर हैं। ऐसे में अगर दोनों मत के मानने वाले एक मस्जिद में जमा होते हैं, तो उनके बीच लड़ाई के हालात पैदा हो सकते हैं।’

नूरी ने आगे कहा, ‘अगर कोई वहाबी मस्जिद में आता है, तो स्थानीय लोगों को उससे शांति से बाहर चले जाने को कहना चाहिए। अगर वह लोगों की बात नहीं सुनता, तो स्थानीय लोगों को पुलिस की मदद लेनी चाहिए। वहाबियों की मौजूदगी से कानून और व्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘स्थानीय लोगों की जिम्मेदारी है कि वे वहाबियों के असली चेहरे के बारे में जागरूकता फैलाएं और अपने बीच के लोगों को बताएं कि किस तरह वहाबी आतंकवादी संगठनों के साथ जुड़े हुए हैं। अगर वहाबी मस्जिद में आना शुरू करते हैं, तो वे जल्द ही वहां अपना नेटवर्क बिछाना शुरू कर देंगे जो कि सही नहीं है। इसके अलावा सुरक्षा एजेंसियां निर्दोष लोगों पर भी शक करना शुरू कर देंगी।’

वहीं देशभर के प्रमुख मौलवियों और इमामों ने इस फतवे की आलोचना की है। जमायत-उलेमा-ए-हिंद के बरेली सचिव मुहम्मद तौहीद ने इस फतवे पर प्रतिक्रिया करते हुए कहा, ‘इन दिनों फतवा जारी करना एक चलन बन गया है। इबादत की जगह हर किसी के लिए खुली हो और वह अल्लाह का घर होता है। वहाबियों पर इस तरह प्रतिबंध लगाने से हम लोगों में और अंतर पैदा होगा।’

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