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जम्मू और कश्मीर के सांबा जिले की उपायुक्त शीतल नंदा का अधीनस्थ कर्मचारियों को दिया हुआ एक आदेश इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है. दरअसल ये आदेश जिओ मोबाइल पर रिंगटोन से जुड़ा है.

शीतल नंदा ने सरकारी कर्मचारियों को आदेश जारी कर कहा कि वे अपने जिओ फोन पर ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओं’ की रिंगटोन लगाए. साथ ही कर्मचारियों को 24 फरवरी 2018 तक इस आदेश की पालना करने को कहा गया है.

इस आदेश को लेकर अब विवाद शुरू हो गया है. रेडिओ कश्मीर के पूर्व निदेशक रेडियो बशीर आरिफ सवाल उठाते हुए कहा कि सेल फोन एक निजी संपत्ति है. आप इस तरह से एकतरफा आदेश सुनाकर किसी भी सरकारी नारे को अपनाने के लिए बाध्य नहीं कर सकती.

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वहीँ बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन के पूर्व निदेशक बशीर अहमद ने कहा, बेटी बचाओ बेटी पढाओ नारा एक दिलचस्प पृष्ठभूमि है यह वीएचपी आरएसएस के नारे बेटी बचाओ, बहू लाओ के साथ शुरू किया गया. हिंदुत्व के गुंडों ने लव जिहाद शब्द को गढ़ा और कहा कि हिंदूओं को अपनी बेटियों की मुसलमानों से शादी करने से बचना चाहिए और मुस्लिम लड़कियों और महिलाओं की उनके पुरुषों और लड़कों से शादी करनी चाहिए. यह अभियान कई सालों तक जारी रहा.

उन्होंने कहा, मोदी के प्रधान मंत्री बनने के बाद, इस नारे को बीटी बचाओ बेटी पढाओ नारा में संशोधित किया गया. आप बेटी बचाओ को केवल तभी लागू कर सकते हैं यदि आप पहले बेटी को जन्म देते हैं. उन्होंने कहा, यह केवल एक नाटक है और लोगों को इसे अनदेखा करने की आवश्यकता है.

ध्यान रहे बेटी बचाओ, बेटी पढाओ, भारत सरकार का एक सामाजिक अभियान है जिसका लक्ष्य है कि लड़कियों के लिए बनाई गई कल्याण सेवाओं की दक्षता में जागरूकता पैदा करना और सुधार करना. इस योजना को 100 करोड़ रुपये के शुरुआती निधि के साथ शुरू किया गया था.


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