asam family 1

asam family 1

असम के दरंग जिले के सरकारी अस्पताल में स्वास्थकर्मियों की लापरवाही के कारण जन्म के समय दो बच्चों की अदला-बदली के मामले में कोर्ट ने बड़ा फैसला देते हुए कहा कि वयस्क होने पर बच्चे इस बात का फैसला खुद करेंगे कि वो किस के साथ रहेंगे. साथ ही कोर्ट ने मुस्लिम परिवार को हिंदू बच्चे और हिंदू परिवार को मुस्लिम बच्चे के पालन पोषण की अनुमति दे दी.

दरअसल, 11 मार्च 2015 को शहाबुद्दीन अहमद की पत्नी सलमा अहमद ने और अनिल बोड़ो की पत्नी सेवाली ने मंगलदई के सरकारी अस्पताल में सुबह बच्चें को जन्म दिया था. लेकिन अस्पताल कर्मचारियों की लापरवाही से दोनों बच्चों की अदला-बदली हो गई. जिसके चलते शहाबुद्दीन का बेटा अनिल के घर और अनिल का बेटा शहाबुद्दीन के घर पहुँच गया.

शहाबुद्दीन ने बताया कि उसने अपने पुत्र का नाम जुनेद अहमद रखा कुछ दिनों तक सब कुछ ठीक रहने के बाद ज्यो ज्यो बच्चा बड़ा होता गया तो जुनेद का चेहरा मंगोल ट्राइबल जैसा उभरने लगा इसके बाद सलमा को शक हुवा लेकिन ऊपर वाले का आशीर्वाद समझ सलमा चुप हो गई.  लेकिन जब जब वह जुनेद को देखती तो रोने लगती.

सलमा के दर्द को शहाबुद्दीन सहन नहीं कर सका. उसने इस पुरे मामले का सच जानने के लिए स्वास्थ्य विभाग से अपने बच्चें के जन्म का और 11 मार्च 2015 को पैदा हुए अन्य बच्चों के जन्म का विवरण माँगा. जिसमे उने पता चला कि उस दिन उनके बच्चें सहित केवल दो बच्चों का जन्म हुवा था.

शहाबुद्दीन स्वास्थ्य विभाग से मिली जानकारी के आधार पर अनिल बोड़ो के घर बैजपारा पहुँच गया.  शहाबुद्दीन ने अनिल बोड़ो को  पूरी कहानी सुनायी और अनिल से सहयोग माँगा. शहाबुद्दीन ने अनिल के सहयोग से स्वास्थ्य विभाग में उच्च अधिकारियों से इस पुरे मामले की जांच की बात कही. लेकिन कुछ नही हुआ.

अंत में शहाबुद्दीन ने अपने शक को मिटाने  के लिए अपने स्तर पर हैदराबाद  के एक लेबोरटरी में बच्चे का DNA टेस्ट कराया और DNA टेस्ट ने यह साबित कर दिया क़ि बच्चा उसका नहीं है. DNA टेस्ट के बाद शहाबुद्दीन ने मंगलदई थाना में केस संख्या 990/2015  धारा 120(B)/420  के तहत एक मामला दर्ज कराया. जिसके बाद ये मामला अदालत में चला गया.

4 जनवरी 2017 को अदालत ने शहाबुद्दीन के हक़ में फैसला देते हुए कहा कि बच्चो की अदला बदली हुई है. लेकिन कोर्ट परिसर में दोनों ही बच्चों ने अपनी उन मांओं को छोड़ने से मना कर दिया, जिन्होंने उन्हें अभी तक पाला था. डर की वजह से दोनों ही अपनी मां से चिपके रहे. ऐसे में दोनों पिताओं ने बच्चों को उनकी मांओं से अलग करने से मना कर दिया.

हालांकि अब अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि वयस्क होने पर बच्चे इसका फैसला खुद करेंगे कि वो पालन-पोषण करने वाले पिता के पास रहेंगे या फिर अपने जैविक माता-पिता के साथ. लेकिन दोनों ही बच्चों का परिवार उन्हें बदलना नहीं चाहता है लेकिन वो चाहते हैं कि इस मामले में अस्पताल को दंडित किया जाए.

मुस्लिम परिवार शादीे करने के इच्छुक है तो अभी फोटो देखकर अपना जीवन साथी चुने (फ्री)- क्लिक करें

Loading...

विदेशों में धूम मचा रहा यह एंड्राइड गेम क्या आपने इनस्टॉल किया ?