सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि कोर्ट को सीबीआई से पर्याप्त मदद नहीं मिल रही है. जिसके चलते इस मामले में पूरी स्पष्टता सामने नहीं आ रही.

न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे ने कहा कि ‘अभियोग लगाने वाली एजेंसी का यह प्रथम कर्तव्य है कि वह अदालत के समक्ष सभी साक्ष्यों को रखे. लेकिन इस मामले में अदालत द्वारा कई बार पूछने पर भी सीबीआई ने केवल उन्हीं दो अधिकारियों की भूमिका के बारे में बहस की जिन्हें आरोपमुक्त करने को उसने चुनौती दी है.’

न्यायमूर्ति ने कहा, ‘अभियोजन पक्ष के पूरे मामले को लेकर अभी भी अस्पष्टता है क्योंकि मुझे सीबीआई की ओर से पर्याप्त मदद नहीं मिल रही.’ अदालत ने अब सीबीआई को निर्देश दिया है कि वह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज किए गए सभी गवाहों के बयानों की जानकारी पेश करे.

हाईकोर्ट जज की यह टिप्पणी इस मामले में सीबीआई के पूरे रवैये पर गंभीर सवाल उठाती है. आरोप है कि राजनीतिक दबाव में आरोपितों को बरी कराने का अभियान चल रहा है और सीबीआई लंबी जाँच-पड़ताल के बाद दायर किए गए अपने ही मामलों को अंजाम तक पहुँचाने के लिए तैयार नहीं है.

गौरतलब रहे कि सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी कौसर बी को गुजरात पुलिस ने नवंबर 2005 में कथित फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया था, जबकि उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति को गुजरात और राजस्थान पुलिस ने दिसंबर 2006 में एक अन्य कथित फर्जी मुठभेड़ में मार दिया था.

इस मामले में आरोपी बनाए गए 38 लोगों में से वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी डीजी वंजारा, राजकुमार पांडियन, दिनेश एमएन और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह शामिल हैं.

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