पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि अनुसूचित जाति समुदाय के किसी व्यक्ति के खिलाफ फोन पर जाति सूचक टिप्पणी करना अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी जाति को लेकर टिप्पणी करता है, जिसे लोगों के बीच उस वर्ग को नीचा दिखाने के लिए नहीं किया गया है तो उसे एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध मान लेने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं माना जा सकता।

कुरुक्षेत्र निवासी संदीप और प्रदीप ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा कि सरपंच राजेंद्र कुमार ने उन दोनों के खिलाफ जाति को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करने संबंधी जो शिकायत दी थी, वह आधारहीन है। जबकि सरपंच राजेंद्र के अनुसार, संदीप और प्रदीप ने देवीदयाल से फोन पर बात करते हुए उसके खिलाफ टिप्पणी की थी। देवीदयाल ने दोनों को टिप्पणी करने से रोका, लेकिन वे रुके नहीं।

याचिकाकर्ताओं की तरफ  से कहा गया कि उनके पिता ने धर्मशाला के निर्माण में होने वाले 7 लाख रुपये के खर्च को लेकर आवाज उठाई थी, जिसके चलते उन दोनों के खिलाफ इस प्रकार की शिकायत दी गई है। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि फोन कॉल पर दो व्यक्तियों के बीच की बातचीत के दौरान की गई टिप्पणी, जिनका गवाह न हो, वह एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आती।

किसी को नीचा दिखाने की इच्छा से लोगों के बीच बोले गए शब्द ही अपराध की श्रेणी में आते हैं। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से कहा कि जब उसके समक्ष इस अपराध को लेकर दो पक्ष मौजूद हैं और अदालत के सामने कोई शब्द लोगों के बीच किसी को नीचा दिखाने के लिए जानबूझकर नहीं कहे गए हों तो वह किसी को अपराधी साबित करने और उसे सजा देने के लिए पर्याप्त नहीं है।

बता दें कि इससे पहले नवंबर, 2017 में एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि सार्वजनिक स्थान पर फोन पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति  श्रेणी के खिलाफ जातिसूचक टिप्पणी करना अपराध है। इसके लिए अधिकतम पांच वर्ष की जेल की सजा हो सकती है।

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