देश में चुनावों के दौरान उम्मीदवार पैसों को पानी की तरह बहाता हैं, चाहे व ब्लैक के हो या वाइट का. आज बिना पैसों के चुनाव लड़ने के बारें में भी सोचा नही जा सकता. लेकिन यूपी के विधानसभा चुनाव में एक ऐसे भी उम्मीदवार हैं जो बिना पैसों के, बिना कार्यकर्ताओं के, और बिना किसी शोर-शराबे के चुनाव लड़ते है और जीतते भी हैं. और वो हैं आजमगढ़ के निजामाबाद से तीन बार विधायक रह चुके आलम बदी.

समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आलम बदी मंत्री पद बहुत पहले ठुकरा चुके हैं. बदी साहब को मुलायम सिंह यादव और फिर अखिलेश यादव ने मंत्री बनने को कहा तो बदी ने इंकार कर दिया. वो कहते हैं कि, मैं आज तक टिकट या निशान मांगने नहीं गया, नेताजी और अखिलेश खुद ही भेज देते हैं. उन्होंने मंत्री बनने को कहा तो मैंने किसी नौजवान को बनाने का सुझाव दिया. बदी कहते हैं कि वो मंत्री बन जाते तो अपने इलाके से दूर हो जाते.

इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले आलम बदी के पास कार्यकर्ताओं का कोई झुंड नहीं है. न ही फेसबुक पर हैं न ट्विटर पर. चुनाव हो या न हो, सुबह से शाम तक लोगों के बीच रहते हैं. ज्यादातर पैदल चलते हैं. खर्च की पाई-पाई का हिसाब रखते हैं. उन्होंने 2012 का चुनाव महज 2 लाख रुपय में ही लड़ा था.

बदी साहब के 6 बेटे हैं, जिसमें से 3 छोटे मोटे रोज़गार के लिए बाहर हैं, तो सबसे बड़े बेटे महज 15 हज़ार रुपये महीने की प्राइवेट नौकरी करते हैं. दूसरे बेटे की फर्नीचर की छोटी सी दुकान है, जिससे बस गुजर बसर ही हो पाता है. आलम बदी की ईमानदारी सभी धर्म और जातियों के लिए बराबर हैं.

हाल ही में बदी साहब ने इस इलाके के शहीदों के नाम पर 4 बड़े द्वार बनवाये हैं, जिसमें कोई भी मुस्लिम नहीं है. द्वार दिखाते वक़्त बदी साहब बड़े फक्र से बताते हैं कि, इससे आने वाली पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी.


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