नई दिल्ली, 11 फ़रवरी। मुग़लों और सल्तनत के ज़माने में भारत अरबी ख़त्ताती (सुलेख कला) में अव्वल रहा है। फ़ारस और अरब के इस फ़न को फिर से निखारने की ज़िम्मेदारी ली है दिल्ली की जामा मस्जिद में स्थित दरगाह आसार शरीफ़ ने। दरगाह मलेशिया के रेत्सु फ़ाउंडेशन के साथ मिलकर रविवार को अखिल भारतीय अरबी कैलीग्राफ़ी प्रतियोगिता करवाने जा रही है जिसमें देश भर के अऱबी ख़त्तात्ती के फ़नकार दिल्ली पहुँच रहे हैं।
कार्यक्रम के आयोजक सैयद फ़राज़ आमिरी ने यहाँ पत्रकारों को बताया कि भारत के इतिहास में पहली बार अरबी कैलीग्राफ़ी प्रतियोगिता होगी। चूँकि भारत में दस लाख से अधिक हाफ़िज़ (क़ुरान कंठस्थ मौलवी) और करोड़ों लोग अरबी भाषा और संस्कृति से परिचित हैं लेकिन फिर भी भारत में इस तरह की प्रतियोगिता का नहीं होना वाक़ई आश्चर्य की बात है। वह बताते हैं कि यूनेस्को की विश्व धरोहर क़ुतुब मीनार पर हर तरफ़ जो आयतें आप देखते हैं दरअसल वह पच्चीकारी में अरबी कैलीग्राफ़ी का ही फ़न है। भारत में इस कला को पुन विकसित करने के लिए दरगाह आसार शरीफ़ ने फ़ाउंडेशन मलेशिया के साथ मिलकर मुहिम शुरू की है जिसके तहत इस १२ फ़रवरी को ऐवाने ग़ालिब में देश के अरबी ख़त्तात्ती के प्रतियोगियों को बुलाया गया है। इसमें दो तरह के पुरस्कार रखे गए हैं। पुरुष और महिला वर्ग में तीन तीन सर्वश्रेष्ठ प्रतिभागियों को पुरस्कार स्वरूप अरबी भाषा की पढ़ाई के लिए मलेशिया भेजा जाएगा।
दरगाह आसार शरीफ़ के ही सज्जादानशीन सैयद एहराज़ आमिरी ने कहाकि यह वाक़ई भारत के लिए गौरव की बात है कि वह पहली बार इस प्रतियोगिता के आयोजक बन रहे हैं। प्रतियोगिता के दिन शाम को ऐवाने ग़ालिब में ही मीलाद (पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद के यश गीत) का भी कार्यक्रम रखा गया है।
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