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देश में सांप्रदायिक माहौल के चलते जहां एक तरफ जय श्रीराम का नारा लगाने से इनकार करने पर लोगों की जान ली जा रही है। वहीं दूसरी और राजस्थान के सरहदी इलाकों मे मुसलमानों के साथ-साथ हिंदू भी रख रहे है।

भारत-पाक सीमा के करीब इन गांवों में हिंदू और मुस्लिम परिवारों में समान रिवाज और परंपराएं देखी जा सकती हैं। रमजान के महीने के दौरान रोजे रखने की परंपरा बाड़मेर और जैसलमेर जिले में मेघवाल समुदाय के बीच काफी प्रचलित है।

इस समुदाय के लोग राजपूत संत पीर पिथोरा का अनुसरण करते हैं जिनकी दरगाह सरहद पार पाकिस्तान के सिंध प्रांत में है। मेघवाल समुदाय के लोगों का ये रोजा हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक शांति और भाइचारे को मजबूत करता आया है।

बता दें कि रोजे रखने की यह परंपरा शरणार्थी हिंदुओं में आम है। शरणार्थी हिंदू 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान सरहद पार से आकर बॉर्डर के आसपास के गांवों में बस गए थे।

ये सभी पूरी परंपरा के मुताबिक रोजे रखते है। वह भी ऐसी स्थिति मे जब भीषण गर्मी पड़ रही है और तापमान 47 डिग्री सेल्सियस के आसपास जा रहा है।

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