Saturday, June 12, 2021

 

 

 

कोर्ट नहीं बल्कि अखिलेश ही नहीं चाहते थे छूटें बेगुनाह मुसलमान : रिहाई मंच

- Advertisement -
- Advertisement -

लखनऊ । रिहाई मंच ने आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों की रिहाई को लेकर सपा पर एक बार फिर से झूठ बोलने का आरोप लगाया है। मंच ने कहा कि सपा प्रवक्ता राजेन्द्र चैधरी द्वारा एक अंग्रेजी दैनिक में दिए बयान में इसे बड़ी उपलब्धि बताते हुए झूठ बोला गया कि अखिलेश के कार्यकाल में आतंकवाद के नाम पर कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। जबकि आईएम, अलकायदा, आईएस के नाम पर यूपी से लगातार अखिलेश सरकार की सहमति से मुस्लिम युवकों को दिल्ली स्पेशल सेल और एनआईए उठाती रही।

मंच ने कहा कि अपने बीवी-बच्चों के साथ घूम-घूम कर फोटो खिचवाने वाले अखिलेश को शर्म आनी चाहिए की अपने विधवा मां के अकेले बेटे मौलाना खालिद की उन्होंने हिरासत में हत्या करवाकर मौलाना की मौत को न सिर्फ स्वाभाविक मौत बताया बल्कि उनकी हत्या के आरोपी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ जांच भी नहीं होने दी। मंच ने यह भी पूछा है कि आतंक के आरोपों से बरी हुए बेगुनाहों के खिलाफ अपील में जाकर उन्हें दुबारा जेल भिजवाने की कोशिश को राजेंद्र चैधरी अपनी सरकार की उपलब्धि मानते हैं क्या?

रिहाई मंच द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि सपा के प्रवक्ता राजेन्द्र चैधरी आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों की रिहाई के सवाल पर कह रहे हैं कि उनको ऐसा करने से कोर्ट ने रोका। जबकि हकीकत यह है कि पर्याप्त तर्क और आधार होने के बावजूद कोर्ट में इन्होंने लिखित-मौखिक किसी तरह का कोई मजबूत तर्क ही नहीं प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा कि जो सरकार यह कह कर मुसलमानों को गुमराह कर रही है कि अदालत की वजह से वह बेगुनाहों को नहीं छोड़ पाई उसे यह भी बताना चाहिए कि आतंकवाद के नाम पर रिहा हुए लोगों के पुर्नवास और मुआवजे और दोषी पुलिस और खुफिया अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने से उसे किसने रोका था। जबकि निमेष न्यायिक जांच आयोग तक ने दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही थी।

आतंकवाद के विभिन्न मामलों में इन मुकदमों को लड़ रहे मुहम्मद शुऐब ने कहा कि खालिद मुजाहिद, तारिक कासमी, सज्जादुर्रहमान वानी, मोहम्मद अख्तर वानी के मुकदमों को वापस लेने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने अदालतोें में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया पर उसके साथ आधार के बतौर निमेष आयोग की रपट को नहीं प्रस्तुत किया। जबकि एकल सदस्यीय आरडी निमेष जांच आयोग द्वारा अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी जा चुकी थी।

श्री आरडी निमेष अध्यक्ष एकल सदस्यीय जांच समित ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि उत्तर प्रदेश एसटीएफ द्वारा दिखाई गई खालिद मुजाहिद और तारिक कासमी की गिरफ्तारी बाराबंकी से होना संदेहप्रद है। कमीशन ने माना था कि तारिक कासमी को रानी की सराय चेक पोस्ट से 12 दिसंबर 2007 को लगभग 12 बजे तथा खालिद मुजाहिद को 16 दिसंबर 2007 को शाम 6 बजे के करीब उठाकर उन्हें गैर कानूनी हिरासत में रखकर प्रताड़ित किया गया था।

निमेष आयोग ने खालिद और तारिक को उठाकर प्रताड़ित करने वाले लोगों की पहचान करके उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की बात रिपोर्ट में कही थी। लेकिन सरकार की ओर से न तो अदालत में दिए गए प्रार्थना पत्रों के साथ रिपोर्ट लगाई गई और न ही कमीशन की सिफारिशों का ही उल्लेख किया गया।

सरकार ने जानबूझकर प्रार्थना पत्र में वो तथ्य दर्शाए जो कानून की नजर में किसी काम के नहीं थे। उन प्रार्थना पत्रों को देने से पहले सरकार की नियत साफ थी कि उसे सिर्फ दिखावे के लिए अदालतों में प्रार्थना पत्र देना है कोई ठोस आधार नहीं देना है ताकि अदालत उनके प्रार्थना पत्र को खारिज कर दे। उस समय भी रिहाई मंच ने सरकार की इस कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया था जिसका नतीजा यह हुआ कि इस मामले के चश्मदीद मौलाना खालिद मुजाहिद की 18 मई 2013 को उन आईबी और पुलिस वालों ने हत्या करवा दी जिनको बचाने की कोशिश सरकार कर रही थी।

मुहम्मद शुऐब ने आगे बताया कि जून 2007 में हुजी के नाम पर पकड़े गए नासिर हुसैन, मोहम्मद याकूब, जलालुद्दीन, नौषाद, शेख मुख्तार हुसैन, मो0 अली अकबर हुसैन, नूर इस्लाम मंडल तथा अजीजुर्रहमान के मुकदमों के साथ भी वैसा ही किया गया जो खालिद मुजाहिद और तारिक के साथ किया गया।

जलालुद्दीन सहित 6 लोगों के विरुद्ध चल रहे मुकदमें को वापस लेने का जो मजबूत आधार बन सकता था सरकार ने उसकी अनदेखी की। क्योंकि जिस अजीजुर्रहमान को 22 जून 2007 को लखनऊ में विस्फोटकों के साथ होने का दावा एसटीएफ ने किया था उसने अतिरिक्त चीफ ज्यूडिशियल मजिस्टेट अलीपुर पश्चिम बंगाल द्वारा पारित आदेश 22 जून 2007 की प्रमाणित प्रतिलिपि न्याययलम में दाखिल की थी। जिसमें अलीपुर के न्यायालय ने कहा था कि सीआईडी/एसओजी पश्चिम बंगाल ने दिनांक 22 जून 2007 को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया था और दस दिन का पुलिस कस्टडी रिमांड मांगा था लेकिन न्यायालय ने पुलिस कस्टडी रिमांड केवल 26 जून 2007 तक का दिया। जिससे यूपी पुलिस का दावा खोखला हो जाता है कि वो उस दिन लखनऊ में था। आतंकवाद के विभिन्न मामलों में सरकार का यह रवैया साबित करता है कि वो बेगुनाहों के खिलाफ और गुनहगार पुलिस वालों के साथ हम-कदम बनी रही।

रिहाई मंच प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि मौलाना खालिद की हत्या के बाद अखिलेश सरकार ने सीबीआई जांच का ऐलान करने के बावजूद जांच नहीं करवाया। जब खालिद के चचा जहीर आलम फलाही इस मामले में हाईकोर्ट गए तो वहां सरकार के वकील जफरयाब जिलानी ने इसके खिलाफ पैरवी की। जहां जांच आईबी और एसटीएफ के षडयंत्र पर होनी थी वहां जांच को सिर्फ हत्या तक सीमित करवा कर हत्यारोपी पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह और पूर्व एडीजी लाॅ एण्ड आर्डर व वर्तमान भाजपा नेता बृजलाल जैसों को बचाने के लिए सीबीआई जांच का विरोध कर सीबीसीआईडी जांच के लिए सरकार तैयार हुई।

उन्होंने कहा कि अखिलेश से लेकर राजेन्द्र चैधरी, अहमद हसन, जफरयाब जिलानी सब इस मुद्दे पर झूठ बोल रहे हैं। बेगुनाहों को रिहा करने को कोर्ट ने रोका था कहने वाली सपा बताए कि जो बेगुनाह 9-9 साल जेल में सड़ने के बाद रिहा हुए उनके खिलाफ किस कोर्ट ने उन्हें हाईकोर्ट जाने को कहा था कि उनको फिर से बंद करने के लिए उनके खिलाफ अखिलेश सरकार ने वारंट जारी करवाया।

शाहनवाज आलम ने कहा कि सरकारी उर्दू पत्रिका ‘नई उमंग’ में जफरयाब जिलानी ने दिए साक्षात्कार में हास्यास्पद और झूठा दावा किया है कि अखिलेश सरकार ने आंतकवाद के आरोपों में फंसाए गए पांच हजार बेगुनाहों को रिहा करा दिया है। जबकि इतने लोग तो आंतकवाद के आरोपों में नहीं बंद हैं। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर मुसलमानों को गुमराह करने के बजाए मुख्यमंत्री और जफरयाब जिलानी को उस नोटिस का जवाब देना चाहिए जिसे रिहाई मंच ने इस फर्जी दावे के खिलाफ उन्हें भेजा है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot Topics

Related Articles