Sunday, September 26, 2021

 

 

 

क्यों गतिमान एक्सप्रेस भारतीय रेलवे की कामयाबी के बजाय इसकी नाकामयाबी का प्रतीक है

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पिछले कुछ दिनों से हर तरफ गतिमान एक्सप्रेस ही छाई हुई है. लेकिन कहीं इस बात की चर्चा नहीं हो रही है कि रेलवे को इसे नई दिल्ली की बजाय हजरत निजामुद्दीन से क्यों चलाना पड़ा है?

क्यों गतिमान एक्सप्रेस भारतीय रेलवे की कामयाबी के बजाय इसकी नाकामयाबी का प्रतीक है

भारत सरकार का रेल मंत्रालय दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन से आगरा कैंट के बीच शुरू हुई नई ट्रेन गतिमान एक्सप्रेस को एक बड़ी कामयाबी के तौर पर दिखा रहा है. जिस दिन इसकी शुरुआत हुई, रेल मंत्रालय ने अपनी इस कामयाबी को दिखाने के लिए अच्छी-खासी संख्या में मीडिया के लोगों को इसमें यात्रा कराई. इसके बाद से हर तरफ गतिमान ही छाई हुई है और इसकी खूबियां गिनाई जा रही हैं. लेकिन कहीं इस बात की चर्चा नहीं हो रही कि आखिर नई दिल्ली से आगरा कैंट के बीच प्रस्तावित इस ट्रेन का परिचालन किन वजहों से हजरत निजामुद्दीन से करना पड़ा. इस सवाल की गुत्थी सुलझाते ही गतिमान एक्सप्रेस के बारे में किया गया भारतीय रेलवे का सबसे बड़ा दावा भरभराकर गिरता दिखता है.

यह सबसे बड़ा दावा है उसके द्वारा गतिमान एक्सप्रेस को सेमी हाईस्पीड ट्रेन और अपनी एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करना. इसके अलावा रेलवे का आधिकारिक तौर पर यह भी कहना है कि इसके और कुछ अन्य सुविधाओं के एवज में गतिमान एक्सप्रेस का किराया शताब्दी के मुकाबले 25 फीसदी अधिक रखा गया है.

सच्चाई यह है कि गतिमान एक्सप्रेस को 100 मिनट दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन स्टेशन से आगरा पहुंचने में लगते हैं और शताब्दी को 117 मिनट नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से आगरा पहुंचने में लगते हैं.

अगर सबसे पहले किराये में 25 फासदी बढ़ोत्तरी के सरकार के आंकड़े को ही जांचें तो यह सही नहीं है. शताब्दी में जहां चेयर कार का किराया 515 रुपये है, वहीं गतिमान में इसका किराया 750 रुपये है. वहीं एक्जीक्यूटिव श्रेणी का शताब्दी का किराया 1,010 रुपये है और गतिमान में इस श्रेणी का किराया 1,500 रुपये है. इन तथ्यों के आधार पर देखें तो गतिमान एक्सप्रेस के चेयर कार के लिए भारतीय रेलवे शताब्दी एक्सप्रेस से 25 फीसदी नहीं बल्कि 40 फीसदी से भी अधिक किराया वसूल रही है तो एक्जीक्यूटिव श्रेणी के लिए यह आंकड़ा तकरीबन 50 फीसदी है. और ऐसा भी तब है जब गतिमान एक्सप्रेस शताब्दी के मुकाबले तकरीबन साढ़े सात किलोमीटर कम दूरी तय करती है. इसके अलावा गतिमान में किराये से जुड़ा एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इसमें किसी तरह के रियायती टिकट दिये जाने की कोई व्यवस्था नहीं है.

अब अपने मूल सवाल पर आते हैं कि रेलवे ने इस ट्रेन को नई दिल्ली की बजाय निजामुद्दीन से क्यों चलाया?

नई दिल्ली से भोपाल के बीच चलने वाली शताब्दी एक्सप्रेस अभी दिल्ली से आगरा पहुंचने के लिए 117 मिनट का वक्त लेती है. वहीं गतिमान दिल्ली से आगरा 100 मिनट में पहुंचती है. इन 17 मिनटों की बचत के आधार पर ही गतिमान एक्सप्रेस को हाईस्पीड ट्रेन और मोदी सरकार के रेल मंत्रालय की एक बहुत बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है. जबकि सच्चाई इतनी सीधी है नहीं. दरअसल सच्चाई यह है कि गतिमान एक्सप्रेस को 100 मिनट दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन स्टेशन से आगरा पहुंचने में लगते हैं और शताब्दी को 117 मिनट नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से आगरा पहुंचने में लगते हैं.

शुरुआत में मोदी सरकार की योजना यही थी कि गतिमान एक्सप्रेस को नई दिल्ली से आगरा कैंट के बीच चलाया जाएगा. इसका ट्रायल रन भी नई दिल्ली और आगरा के बीच ही मार्च महीने में हुआ. लेकिन उसमें गतिमान को नई दिल्ली से आगरा कैंट पहुंचने में 113 मिनट लग गए

लेकिन अगर यह काफी नहीं है तो एक तथ्य यह भी है कि शताब्दी एक्सप्रेस नई दिल्ली से आगरा के रास्ते में मथुरा स्टेशन पर रुकती भी है जबकि गतिमान हजरत निजामुद्दीन से चलने के बाद सीधे आगरा में ही रुकती है. यानी गतिमान को निजामुद्दीन के बजाय अगर नई दिल्ली से चलाया जाता और मथुरा में इसका स्टॉपेज भी होता तो शताब्दी और इस ट्रेन की रफ्तार में शायद मामूली सा अंतर भी नहीं होता.

शुरुआत में मोदी सरकार की योजना यही थी कि गतिमान एक्सप्रेस को नई दिल्ली से आगरा कैंट के बीच चलाया जाएगा. इसका ट्रायल रन भी नई दिल्ली और आगरा के बीच ही मार्च महीने में हुआ. लेकिन उसमें गतिमान को नई दिल्ली से आगरा कैंट पहुंचने में 113 मिनट लग गए. इस लिहाज से गतिमान शताब्दी से सिर्फ चार मिनट बचाती दिखी. रेलवे अधिकारियों के बीच यह बात भी उठी कि जब देश की पहली शताब्दी एक्सप्रेस 1988 में नई दिल्ली और झांसी के बीच शुरू हुई तो वह 115 मिनट में ही नई दिल्ली से आगरा पहुंच गई थी.

ऐसे में अधिकारियों को लगा कि अगर गतिमान एक्सप्रेस 113 मिनट लेगी तो हर तरफ यही कहा जाएगा कि 28 साल के तकनीकी उन्नयन के बावजूद रेलवे कुछ खास हासिल नहीं कर पाई. उन्हें यह भी मालूम था कि अगर शताब्दी का मथुरा रुकना खत्म कर दिया जाए तो वह भी नई दिल्ली से आगरा कैंट की दूरी लगभग इतने ही समय में पूरा कर सकती है.

इन तथ्यों को ध्यान में रखकर उत्तर रेलवे के अधिकारियों और रेल मंत्रालय के अधिकारियों के बीच इस बात पर खूब माथापच्ची हुई कि 113 मिनट को किसी तरह से घटाकर 110 मिनट पर लाया जाए. लेकिन ट्रायल रन के बाद यह तय हो गया कि 113 मिनट को घटाना अभी की स्थितियों में दुर्घटनाओं को दावत देने सरीखा हो जाएगा.

अंतत: रेलवे ने अपनी नाक बचाने इस ट्रेन को निजामुद्दीन से चलाने का फैसला कर लिया. इसके बाद इस ट्रेन के डब्बों पर लगीं नई दिल्ली से आगरा कैंट की तख्तियों को हटाकर हजरत निजामुद्दीन से आगरा कैंट की तख्तियों को लगा दिया गया

रेल मंत्रालय के सामने यह अजीब स्थिति थी क्योंकि दो साल पहले जब इस ट्रेन को चलाने की योजना पर काम शुरू हुआ था तब विचार यह था कि यह दिल्ली से आगरा 90 मिनट में पहुंचेगी. उस हालत में गतिमान शताब्दी के मुकाबले 27 मिनट कम वक्त लगाती जोकि एक बड़ी कामयाबी होती.

लेकिन कुछ ही महीने में 90 मिनट 100 मिनट में तब्दील हो गया और ट्रायल रन के बाद पता चला कि यह 100 मिनट का लक्ष्य भी हासिल नहीं किया जा सकता. उसके बाद 105 और 110 के संशोधित लक्ष्यों के बाद मार्च के ट्रायल रन से यह साबित हुआ कि गतिमान 113 मिनट से कम में नई दिल्ली से आगरा कैंट नहीं पहुंच सकती.

अब रेलवे के सामने बड़ा संकट पैदा हो गया. पहला विकल्प तो यह था कि गतिमान को नई दिल्ली से आगरा कैंट के बीच 113 मिनट में चलाया जाए. लेकिन तब न तो यह कोई उपलब्धि होती और न ही इसके 25 फीसदी ज्यादा किराये को (असल में 40-50 फीसदी) तर्कसंगत ठहराया जा सकता था.

अंतत: रेलवे ने अपनी नाक बचाने और दो साल के अपने काम की नाकामियों को छुपाने के लिए इस ट्रेन को निजामुद्दीन से चलाने का फैसला कर लिया. इसके बाद इस ट्रेन के डब्बों पर लगीं नई दिल्ली से आगरा कैंट की तख्तियों को हटाकर (ऊपर चित्र देखें) हजरत निजामुद्दीन से आगरा कैंट की तख्तियों को लगा दिया गया और इसका दिल्ली से आगरा पहुंचने का समय 100 मिनट कर दिया गया.

गतिमान में जो इंजन लगा है वह 200 किलोमीटर की अधिकतम गति से चलने में सक्षम है. लेकिन असल दिक्कत है पटरियों और सिग्नलिंग की.

सियासी गलियारों में तो यह चर्चा भी है इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाने खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाना था. लेकिन जब प्रधानमंत्री को यह लग गया कि दो साल की मेहनत के बाद भी रेलवे कोई कामयाबी हासिल करने में नाकाम रही है तो उन्होंने खुद को इससे दूर रखना ही ठीक समझा.

अब कुछ तकनीकी बातों को भी समझ लेना जरूरी है ताकि यह पता चल सके कि आखिर क्यों नई दिल्ली से आगरा की दूरी 113 मिनट से कम में नहीं पूरी की जा सकती. गतिमान में जो इंजन लगा है वह 200 किलोमीटर की अधिकतम गति से चलने में सक्षम है. लेकिन असल दिक्कत है पटरियों और सिग्नलिंग की. रेलवे अधिकारियों के मुताबिक मथुरा यार्ड की सिग्नलिंग में और सुधार करना होगा ताकि वहां से गुजरने वाली ट्रेन की स्पीड को कम नहीं करना पड़े. इसके अलावा रेलवे अधिकारियों के मुताबिक नई दिल्ली से आगरा के बीच में 19 कॉशन प्वाइंट यानी सावधानी वाले स्थान है. इनमें कुछ मोड़ हैं तो कुछ पुल. वहीं कई सावधानी वाले स्थान वे हैं, जहां सघन आबादी रहती है. रेलवे सुरक्षा आयुक्त की ओर से इन इलाकों में गति को लेकर कड़ी बंदिशें रहती हैं. इसलिए सुरक्षा के लिहाज से इन स्थानों पर ट्रेन की स्पीड को कम करना ही पड़ता है.

लेकिन ये सारी बातें तो रेलवे के अधिकारियों को दो साल पहले तब भी मालूम रही होंगी जब उन्होंने गतिमान एक्सप्रेस के लिए 90 मिनट का लक्ष्य तय किया था.

(ये लेख satyagrah से लिया गया है जिसके लेखक हिमांशु शेखर  है.. तथा इस लिंक पर आप लेख पढ़ सकते है)

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