यहाँ एक हिन्दू नौ जवान ने बताया कि उसने अपनी जान क़ुरान पढ़ कर बचायी. मामला साल 2016 का हैं, जब बांग्लादेश की राजधानी ढाका में ईद के मुबारक उत्सव से पहले होली आर्टिसन बेकरी पर पांच आतंकियों ने हमला बोल दिया था.

बीबीसी न्यूज़ के अनुसार इस नौजवान इन बताया कि शुक्रवार का दिन था और स्थानीयसमयनुसार करीब रात नौ बजने वाले थे, कि तभी अचानक पांच आतंकियों ने रेस्टुरेन्ट पर ढाबा बोल दिया. उस समय अधिकतर जापानी और इटैलियन नागरिक रेस्टुरेन्ट में मौजूद थे.

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शिशिर सरकार जोकि रेस्टुरेन्ट का बावर्ची था, चिलर रूम से हाथ में पास्ता लेकर बाहर आ ही रहा था कि तभी उसने गोलियों की आवाज़ सुनी, उसके बाद सरकार ने देखा कि एक आतंकी एक हाथ में तलवार लिए और दूसरे हाथ में एक बन्दूक लिए और उसने किसी की छाती में तलवार घुसा रखी हैं.

हिन्दू धर्म होने के कारण मुझको काफी डर लग रहा था. यदि आतंकी मेरा धर्म जान जाते तो मुझको ज़रूर मार देते. उसी समय एक जापानी नागरिक ने मुझसे कहा मदद करो मेरी. जिसके बाद मैंने उसकी मदद की. और हम लोग चिलर रूम में जाकर बैठ गए.

दो घण्टो के बाद हमको बहुत ठंड लगने लगी जिससे हमने अंदर ही कुछ एक्टिविटी करनी शुरू की, सरकार ने बताया कि अचानक एक भयंकर समय आया जब एक आतंकी चिलर रूम का दरवाज़ा खोलने की कोशिश कर रहा था, लेकिन आतंकी दरवाज़ा खोलने में नाकामयाब रहा लेकिन उनको अब ये पता चल गया था कि अंदर कोई हैं.

दस से बीस मिनट बाद आतंकी फिर दरवाज़े पर आया और मुझसे कहने लगा बाहर आओ मैं काफी डरा हुआ था, मैं डरते हुए बाहर आया और मई ज़मीन पर लेट गया. मैंने सोचा यदि मैं खड़ा रहा तो मेरी गर्दन काट देंगे. लेकिन मैं निरंतर कहता रहा कि अल्लाह के वास्ते मुझे मत मारो.

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आतंकियों को ऐसा लगा मैं भी मुसलमान हूँ उन्होंने मुझे छोड़ दिया और कहा जाओ उस तरफ खड़े हो जाओ. मैं लाशो के ढेर और खून पर रेंगता हुआ वहां चला गया. लेकिन तभी मैंने अचानक गोली चलने की आवाज़ सुनाई दी और पलट कर देखा तो जापानी नागरिक को मार दिया गया.

कुछ समय के बाद एक आतंकी मेरे पास आया और उसने मुझसे मेरा नाम पुछा मैंने कहा शिशिर, मैंने अपना आखिरी नाम इसलिए नहीं बताया कि मुझको डर था कि कही वह मेरी पहचान का पता ना लगा ले.

शायद उनको शक था कि मैं मुस्लिम नहीं हूँ उन्होंने मुझसे कुरान पढ़ने को कहा, क्योकि मेरी पूरी ज़िन्दगी मुस्लिम दोस्तों के साथ गुज़री, मुझको क़ुरान की सुरह याद थी. जिसके बाद मैंने क़ुरान की तिलावत की और उनके साथ बैठ कर खाना खाया. इस शख्स ने क़ुरआन की आयात सुनाई जिसके बाद आतंकियों ने इसकी जान बख्श दी और इसको छोड़ दिया. 

शिशिर ने बताया कि जब मैं अपने मुस्लिम डॉट के साथ होता था तो वह लोग क़ुरान की तिलावत किया करते थे मुझको भी ऐसे ही याद हो गयी. मेरी दिलचस्पी होने लगी. लेकिन मुझको इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि क़ुरान की दिलचस्पी मेरी जान बचाएगी.

और जब आतंकियों ने मुझसे क़ुरान पढ़ने को कहा तो मैंने अपने दोस्तों के माध्यम से जाने अनजाने में याद की हुई सूरह पढ़ दी. मुझको ऐसा लगा शायद कोई रूहानी शक्ति मेरी मदद कर रही थी. लेकिन मुझको ये तो पता चल गया कि क़ुरान पढ़कर ही मेरी जान बची हैं.

लेकिन मुझको डर था कि क्या मैं इन लोगो को संतुष्ट कर पाउँगा कि नहीं, और देखते ही देखते सुबह ही और सुरक्षाकर्मियों की जवाबी करवाई हुई मेरी जान बच गयी.

हालाँकि ये बावर्ची अभी भी इसी रेस्टुरेन्ट में काम कर रहा हैं लेकिन वो रात आज भी इसको याद हैं. हिन्दू नौजवान इन कहा कि आज भी जब मैं अकेला होता हूँ तो वही रात याद आती हैं.

इस खबर को बीबीसी की अंग्रेजी वेबसाइट पर प्रकशित किया गया हैं, जिसका हिन्दू अनुवाद यहाँ पर किया गया हैं.

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