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एक बार जब इकबाल देर से स्कूल पहुंचे तो मास्टर साब ने पूछा “इकबाल देरी से क्यों आये”, खुद में खोये रहने वाले इकबाल ने झुके सर और नीची आँखों से जवाब दिया “इकबाल हमेशा देर से आता है”. यह बात मासाब की समझ में आई या नही लेकिन इकबाल ने अपनी शायरी में फिलोसफी की वो मिसाल पेश की है जिसके आगे आम शायर या तो पानी भरते नज़र आते है या किनारों से तैर कर निकल जाते है. जो बात खुसरों ने प्रेम के मुतालिक कही थी

“खुसरो दरिया प्रेम का सो उल्टी वाकी धार! जो उबरा सो डूब गया; जो डूबा वो पार!!”

वहीँ अगर प्रेम की जगह ‘इन्कलाब’ को रख दिया जाये तो ‘इकबाल’ बन जाता है . एक-एक शेर को इकबाल ने जिस खूबसूरती के साथ इंकलाबी बनाया वो ना सिर्फ खून में गर्मी पैदा करता है बल्कि गंभीर लोगो के लिए एक मंजिल बन जाता है.

तू शाहीन है परवाज़ है काम तेरा,

तेरे आगे आसमा और भी है.

आइये तारिक अनवर चम्पारिणी से नज़रिए से जानते है की इकबाल में ऐसा क्या है जो उन्हें दूसरों शायरों की पंक्ति से बिलकुल अलग खड़ा कर देता है.

खेल-खेल और मज़ाक-मज़ाक में पिछले दो दिनों में सर अल्लामा डॉ० मोहम्मद इक़बाल को पढ़ने का मौक़ा मिला. पहले भी पढ़ चूका हूँ मगर इस बार कुछ अलग पढ़ा और एक-एक शेअर को पढ़ने और समझने की कोशिश किया. अल्ताफ़ हुसैन हाली पानीपती भी मेरी पसंदीदा शायरों में है. अभी कुछ दिन पहले ही हाली साहब को तलाश करने उनके शहर पानीपत गया था. मीर, दाग और ग़ालिब को भी पढ़ा और समझने की कोशिश किया. डॉ० क़लीम आज़िज़ और नाज़िर अकबराबादी को भी थोड़ा-बहुत पढ़ रखा है. लेकिन इक़बाल को जो थोड़ा-बहुत पढ़ा है उससे एक बात साफ़ ज़ाहिर होती है कि इक़बाल निराशावादी नहीं थे. उनकी शायरी में निराशा के लिए कोई जगह नहीं थी. उनकी यही खूबी दूसरे शायरों से अलग करती है और विश्व के बड़े शायरों में शुमार होने को मज़बूर कर देती है.

तुन्दि-ए-बादे मुख़ालिफ़ से न घबरा ऐ उक़ाब
ये तो चलती है तुझे ऊँचा उड़ाने के लिए

जब 1905 में सर डॉ० अल्लामा इक़बाल यूरोप गये और वहां की संस्कृति, सामाजिक संरचना, राजनीतिक परिदृश्य और नस्ली भेदभाव को क़रीब से देखे तब उन्होंने यह लिखा. उनकी इस शायरी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है की इक़बाल की शायरी सीमाओं से नहीं बंधी थी और उनकी बेबाकी सिर्फ भारत मे ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया मे मशहूर थी.

दियारे-मग़रिब के रहनेवालों खुदा की बस्ती दुकां नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो, वो अब ज़रे-कम-अयार होगा
तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही खुदकशी करेगी
जो शाख़े-नाजुक पे आशियाना बनेगा नापायदार होगा

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को राष्ट्रकवि माना जाता है. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने अल्लामा इकबाल के लिए कहा था “‘इकबाल’ की कविताओं से, भारत की सामासिक संस्कृति को बल मिला था”. अल्लामा इक़बाल की शायरी का जब अंग्रेजी में अनुवाद हुआ तो उनकी ख्याति इंग्लैंड तक पहुंच गई. उनकी कविता से प्रभाति होकर ही जार्ज पंचम ने उन्हें सर की उपाधि दिया था. यहाँ कुछ ज़ाहिल क़िस्म के लोग लाखों रुपया ख़र्च करने के बाद मुशायरा की भीड़ को ही आधार मानकर इक़बाल को नीचा दिखाने पर तुला है.

अल्लामा इकबाल को समझना है तो उनकी नज़्म “नया शिवाला” पढ़ लीजिये. यह वह समय था जब कोई ब्राह्मणवाद को सही से समझा भी नहीं था. डॉ० अंबेडकर साहब अभी अपनी नौजवानी पर थे और अभी-अभी ब्राह्मणवाद की आलोचना शुरू ही किया था. उस समय अल्लामा ने लिखा… “सच कह दूँ ऐ ब्राह्मण गर तू बुरा न माने/ तेरे सनम क़दो के बूत हो गये पुराने“. आज जिस राष्ट्रवाद के नाम पर मुसलमान सफाई पेश कर रहे है उस बात को अल्लामा ने सौ वर्ष पूर्व ही बड़े-बड़े लोगों की भीड़ मे पढ़कर सुना दिया… “पत्थर की मूर्तों मे समझा है तू खुदा है/ख़ाके-वतन का मुझकों हर जर्रा देवता है”. अगर अल्लामा इक़बाल उस वक़्त की हुकूमत की वाहवाही करते तो टैगोर की जगह अल्लामा को नोबेल पुरुष्कार तो जरूर मिल जाता मगर अल्लामा ने ऐसा नहीं किया. जिला-स्तरीय, राज्य-स्तरीय और राष्ट्रस्तरीय पुरुष्कार तो उनकी क़दमो की धूल थी.

एक बार अल्लामा इक़बाल बीमार पड़ गये. पंडित नेहरू अल्लामा इक़बाल से मिलने गए. अल्लामा इक़बाल खाट पर सो रहे थे. खाट के सामने ही दो कुर्सी लगी थी. जब पंडित नेहरू अल्लामा के पास पहुँचे तो कुर्सी पर न बैठकर जमीन पर बैठ गये. यह थी अल्लामा इक़बाल की क़ाबिलियत. बेशक अल्लामा इक़बाल लाखों रूपये लेकर मुशायरा नहीं पढ़ते थे. लाख रुपया में तो गूँगा भी बोल सकता है.

 

 

 

 


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