Sunday, October 17, 2021

 

 

 

15 साल, 2 मुसलमान, एक दलित सीनियर एडवोकेट

- Advertisement -
- Advertisement -

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों की नियुक्ति में क्या पारदर्शिता की कमी है?

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह कहती हैं कि ये एक कड़वा सच है.

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की है जिसमे उन्होंने वरिष्ठ वकीलों की नियुक्ति की प्रक्रिया को चुनौती दी है.

उनके अनुसार पिछले 15 सालों में सुप्रीम कोर्ट में केवल दो मुस्लिम और एक दलित ही वरिष्ठ अधिवक्ता बने हैं.

वरिष्ठ अधिवक्ता

वरिष्ठ अधिवक्ता सरकारी वकील नहीं होते हैं. वरिष्ठ अधिवक्ताओं का चुनाव सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों की ओर से किया जाता है. यह एक विशेष दर्जा है.

इंदिरा जयसिंह ने जनहित याचिका के जरिए वरिष्ठ वकीलों की नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती दी है.

वरिष्ठ वकीलों को बहस के दौरान अन्य वकीलों पर वरीयता दी जाती है. वह सामान्य वकील की तुलना में अधिक फ़ीस भी अधिक लेते हैं.

यह वरिष्ठता एक वकील के रूप में किए गए असाधारण काम, जिसमें मामलों में की गई गुणवत्तापूर्ण बहस, लिखे गए शोध पत्र और न्यायपालिका को दिया गया योगदान शामिल है, के आधार पर दी जाती है.

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के वकील के वरिष्ठ वकील बनाया जा सकता है.

इंदिरा जयसिंह का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में भाई-भतीजावाद प्रचलित है. उन्होंने अपनी याचिका में पिछले 15 साल में वरिष्ठ वकीलों के चुनाव को आधार बनाया है.

भेदभाव

दिल्ली से भारतीय जनता पार्टी के दलित सांसद उदित राज इंदिरा जयसिंह से न केवल सहमत हैं बल्कि वो जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता की कमी का भी अफसोस करते हैं.

null

उदित राज का कहना था कि पिछले 67 सालों में सुप्रीम कोर्ट में केवल दो दलित जज नियुक्त हुए हैं. वे कहते हैं, “तो क्या मान लिया जाए कि दलित जन्मजात मूर्ख हैं? या बुद्धू हैं या इनमें अक़ल नहीं है? भेदभाव तो है ये”.

इंदिरा जयसिंह कहती हैं कि भेदभाव केवल अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं है बल्कि कई वर्गों के खिलाफ है. आम धारणा ये है कि एक्टिविस्ट तरह के वकीलों को नहीं पूछा जाता.

इंदिरा जयसिंह ने कहा कि भाई-भतीजावाद भी आम बात है. उनके अनुसार इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के कई वरिष्ठ वकील उनके साथ हैं.

नया कानून

उदित राज कहते हैं कि पुराने सिस्टम में इन्हीं कमियों के कारण मोदी सरकार एक नया क़ानून लाई है.

उनका कहना है,” उच्च अदालतों में भर्ती की प्रक्रिया गड़बड़ है. इसीलिए तो राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन हुआ है.”

मोदी सरकार ने एक नए क़ानून के अंतर्गत इस आयोग का गठन किया है जिसने 20 साल पुरानी कॉलेजियम प्रणाली को ख़त्म कर दिया.

कॉलेजियम सिस्टम के तहत जजों और वरिष्ठ वकीलों की नियुक्ति चीफ जस्टिस के नेतृत्व में होती थी.

विरोध

null

लेकिन नए सिस्टम को लेकर मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच ठन गयी है.

इसका विरोध ज़ोरदार तरीके से हो रहा है. चीफ जस्टिस एचएल दत्तू ने नए आयोग की पहली सभा का बहिष्कार किया है.

इंदिरा जयसिंह भी आयोग के पक्ष में नहीं हैं. वो कहती वो कॉलेजियम में केवल सुधार चाहती हैं. पुराने सिस्टम को ख़त्म नहीं करना चाहती

कुछ लोगों के अनुसार खतरा इस बात का है कि आयोग से सरकार अपने लोगों को नियुक्त करना चाहेगी जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है.

सूरत सिंह भी सुप्रीम कोर्ट में एक एडवोकेट हैं.

वो कहते हैं, “कॉलेजियम सिस्टम की सबसे बड़ी सफलता है ज्यूडिशरी की स्वतंत्रता. भारत में डर इस बात का है कि इसको व्यापक बनाने के चक्कर में कहीं ऐसा न हो कि ये आज़ादी ख़त्म हो जाए और पारदर्शिता भी न आये. अपने पडोसी देशों की अदालतों को देखते हुए हमें लगता है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता में हम कहीं आगे हैं.”

News BBC

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot Topics

Related Articles