मराठा वीर छत्रपति शिवाजी को हिंदुओं का राजा कहकर राजनीतिक हित साधने की कोशिश हमेशा से ही की जाती रही है. ऐसे में उन्हें मुस्लिमों का दुश्मन तक बताने में गुरेज नहीं किया जाता है. लेकिन इसके विपरीत मुसलमान शिवाजी के लिए बेहद ही विशवासपात्र थे. क्योंकि उन्होंने शिवाजी के लिए अपना खून बहाया था.

आप को बता दें कि शिवाजी की सेना में कई महत्वपूर्ण पदों पर मुस्लिम मौजूद थे. जिनके दम पर ही शिवाजी ने मुगलों से लोहा लिया. उनमे से एक सिद्धी संबल थे. जिनके हाथो में शिवाजी की नौसेना की कमान थी. साथ ही उनकी नौसेना में मुसलमान बहुत बड़ी संख्या में देखे जा़ते थे.

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इसके अलावा शिवाजी के राज्य में उनके गुप्तचर मामलों के सचिव मौलाना हैदर अली थे. वहीं उनके तोपखाने की कमान भी एक मुसलमान, इब्राहिम गर्दी के हाथों में थी. शिवाजी के पास जो कई मुसलमान चाकर थे, उनमें क़ाज़ी हैदर भी एक था.

सालेरी के युद्ध के बाद, औरंगज़ेब के अधीन दक्षिण के अधिकारियों ने, शिवाजी के साथ मित्रता क़ायम करने के लिए एक ब्राह्मण वक़ील भेजा तो उसके उत्तर में शिवाजी ने क़ाज़ी हैदर को मुग़लों के पास भेजा, यानी मुसलमानों का वकील हिंदू और हिंदुओं का वक़ील मुसलमान। उस युग में, यदि समाज का विभाजन हिंदू-विरुद्ध-मुसलमान होता तो ऐसा नहीं होता.

साथ ही शिवाजी के ख़ास अंगरक्षकों में और निजी नौकरों में बहुत ही विश्वसनीय मदारी मेहतर शामिल था. आगरा से फ़रारी के नाटकीय प्रकरण में इस विश्वसनीय मुसलमान साथी ने शिवाजी का साथ क्यों दिया ? शिवाजी मुस्लिम-विरोधी होते तो शायद ऐसा नहीं होता.

ध्यान रहे शिवाजी मुस्लिम साधु, पीर-फ़कीरों का काफ़ी सम्मान करते थे. मुस्लिम संत याक़ूत बाबा को तो शिवाजी अपना गुरु मानते थे. उनके राज्य में मस्जिदों और दरगाहों में दिया-बाती, धूप-लोबान आदि के लिए नियमित ख़र्च दिया जाता था. ऐसे में स्पष्ट है कि शिवाजी ने अपने शासन के दौरान कभी शधर्म को लेकर भेदभाव नहीं किया. लेकिन अब उन्हें मुसलमानों का विरोधी बताकर राजनीतिक हित साधे जा रहे है.

बीते दिनों धुर हिंदू दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं ने प्रतापगढ़ में अफ़ज़ल ख़ान का मकबरा तोड़ने की कोशिश की. यह उपद्रव तब जाकर रुका जब लोगों को यह बताया गया कि इस मकबरे को खुद शिवाजी ने खड़ा किया था. शिवाजी वो राजा थे जो सभी धर्मों का सम्मान करते थे.

शिवाजी ने अपनी राजधानी रायगढ़ में अपने महल के ठीक सामने मुस्लिम श्रद्धालुओं के लिए एक मस्जिद का ठीक उसी तरह निर्माण करवाया था जिस तरह से उन्होंने अपनी पूजा के लिए जगदीश्वर मंदिर बनवाया था. एक दिलचस्प कहानी ये भी है कि शिवाजी के दादा मालोजीराव भोसले ने सूफी संत शाह शरीफ के सम्मान में अपने बेटों को नाम शाहजी और शरीफजी रखा था.

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