Monday, May 17, 2021

नहीं है कोई दूसरी शख्सियत हज़रत अली जैसी

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मुसलमानो के चौथे ख़लीफा और पैग़म्बरे इस्लाम के दामाद हज़रत अली एक ऐसे आदर्श महापुरुष थे जिनका पूरा जीवन ईश्वरी उपदेश के सांचे मे ढ़ला हुआ था ।उन्हेँ अमीरुल मोमिनीन ,हैदरे र्करार ,इमामुल मुत्तकीन ,असदुल्लाह ,अबूतराब ,वसी ए रसूल और ना जाने कितने लकब दिये गये ।इतने सारे नामोँ से उन्हेँ यूँ ही नही पुकारा जाता था ,वरन हर नाम की सिफत को उन्होने ने अपने चरित्र मे उकेर लिया था ।अल्लाह के जो उपदेश वह लोगोँ को देते थे खुद पर अमल कर के दिखाते थे ।इमाम और खलीफा होने के बाद भी उनके जीवन का बड़ा हिस्सा इबादत मे बीता था ।कहा जाता है कि इंसानी कलम मे इतनी ताक़त नही कि इमाम अली की तारीफ कर सके ।बुलंद फिक्र वा खयालात .मखलूस अंदाज़ मे एक खास मेयार पर ज़िँदगी बसर की वह निराले अंदाज़ मे रहे और खास अंदाज़ मे इस दुनियाँ से गये

आपकी विलादत(जन्म) अल्लाह के घर पवित्र काबे शरीफ मे हुआ थी ।कहा जाता है कि आपकी वालदा आपकी विलादत के पहले जब काबे शरीफ के पास गयीँ तो अल्लाह के हुक्म से काबे की दीवार ने आपकी मां को रास्ता दे दिया था

उनके काबे मे तशरीफ लाने के चार दिन बाद 13 रजब को इमाम अली पैदा हुए ।मोहम्मद मुस्तफा स. स. का आपकी ज़िँदगी पर गहरा असर पड़ा था ।चाहे वह मस्जिद हो ,जंग का मैदान हो या फिर आम जगह इमाम अली हर वक्त पैग़म्बरे इस्लाम के साथ रहते थे ।यहाँ तक कि जब रसूले अकरम शबे मेराज पर गये तो अपने बिस्तर पर अली को सुला कर गये थे ।एक गिरोह पैगम्बरे इस्लाम को कत्ल करना चाहता था ,तो अल्लाह ने उन्हेँ शबे मेराज पर एक रात के लिए बुला लिया ।हमलावर गिरोह पहचान ना सके इस लिए अली रसूल के बिस्तर पर ऐसे सोये कि वह लोग पहचान नही सके ।
खुदा कि सिफात के आईनेदार ,तमाम सिफात के मरकज़ यही अली आज से करीब 1352 साल पहले 661 ई. मे माहे रमज़ान मुबारक की 21 वीँ तारिख को कूफे की मस्जिद मे सुबह की नमाज़ के वक्त शहीद कर दिये गये । 19 रमज़ान को सहरी के बाद जब सुबह की नमाज़ अदा की जा रही थी तो नमाज़ियोँ के बीच खड़े कातिल रहमान इब्ने मुलज़िम ने ज़हर से बुझी तलवार से मौला अली पर वार कर दिया ।आप इसके बाद दो दिन तक बिस्तर रहे ।रवायत है कि मोहम्मद मुस्तफा स.स. ने मौला अली को कातिल की पहचान और उसके बारे मे बता दिया था ।19 रमज़ान को नमाज़ के वक्त मौला अली ने ये जानते हुये कि यही कातिल है ,उसे नमाज़ के लिए उठाया था ।अब देखिये अली का इंसाफ ,हमले के बाद नमाज़ियोँ ने इब्ने मुलज़िम को पकड़ लिया था ।मॉला अली ने र्निदेश दिया कि इसके खाने पीने का पूरा ख्याल रखा जाये और चूंकि इसने तलवार से एक वार किया है इस लिए इस पर भी एक ही वार किया जाये ।

रसूले खुदा के बादजनाब  हज़रत अबुबक्र र.अ. को पहला खलीफा बनाया गया ।दूसरे खलीफा जनाब उमर रज़ीअल्लाह ताला और तीसरे खलीफा जनाब हज़रत उस्मान र.अ. बनाये गये ।इन करीब 25 सालोँ के बाद अली चौथे खलीफा बने ।वह अपनी ज़िँदगी यहूदी के बाग़ मे नैकरी करके बसर करते थे ।खाने मे हमेशा जौ की रोटी और नमक या फिर दूध लेते थे ।खलीफा बनने के बाद भी सरकारी खज़ाने से अपने लिए और ना ही रिश्तेदारोँ के लिए कुछ लेते थे ।उनकी सादगी पसन्द ज़िँदगी का ज़िर्क तमाम यूरोपी और अंग्रेज़ लेखकोँ ने किया है ।कहा जाता है कि एक बार मिस्र का राजदूत इमाम अली से मिलने कूफा (इराक का शहर)आया तो लोगोँ से कहा कि मुझे इस्लाम के खलीफा के पास ले चलो।एक आदमी ने उसे उनके घर तक पहुँचा दिया ।राजदूत ने देखा कि एक छोटे से कमरे मे मौला अली बैठे हैँ और पूरे घर मे एक चिराग टिमटिमा रहा था ।साथ आने वाले ने उसे बताया कि यही मुसलमानोँ के खलीफा हैँ तो वह दगं रह गया ।कहाँ वह ये कल्पना करके आया था कि खलीफा का महल होगा ।लेकिन देखता है कि इमाम अली सूखी रोटी खा रहेँ वह भी इतनी सूखी कि उसे तोड़ने के लिए इमाम अली को घुटनोँ की मदध लेनी पड़ रही थी ।इस पर हैदरे कर्रार से पूछां गया कि ऐ अल्लाह के हबीब के पहरेदार जिसने खैबर की जंग के वक्त खैबर के किले का 880 पौण्ड वज़नी दरवाज़ा हाथोँ हे उखाड़ फेँका था उसी अली को रोटी तोड़ने इतनी मुश्किल तो अली का जवाब था कि वह जंग अल्लाह के लिए लड़ी थी इस लिए उसने ताकत दे दी थी और रोटी तोड़ना निजी मामला है ।अली इंसाफ पसंद थे और निजी कामोँ के लिए सरकारी खज़ाने से जलने वाला चिराग भी बुझा देते थे ।इसी ईमानदारी और ईश्वर के उपदेशोँ की पैरोकारी की वजह से तमाम सरदार उनके मुखालिफ हो गये थे ।
आज के दौर मे हज़रत अली की जीवन दर्शन प्रसांगिक है ।उनहोने अमन और शान्ति का पैगाम दिया और बता दिया कि इस्लाम कत्ल और गारतगिरी का हामी नही है ।जानबूझ कर किसी का कत्ल करने पर इस्लाम मे अदबी आज़ाब मुर्कर है ।उन्होने कहा कि इस्लाम तमाम मुसलमानोँ का मज़हब है ।अल्फाज़ और नारोँ से हट कर अदल और इंसाफ की हकीकी तस्वीर पेश की ।उन्होने राष्ट्रप्रेम और समाज मे बराबरी की पैरोकारी की ।वह कहा करते थे कि अपने शत्रु से भी प्रेम किया करो तो वह एक दिन तुम्हारा मित्र बन जायेगा ।उनका कहना है कि अत्याचार करने वाला ,उसमे सहायता करने वाला और अत्याचार से खुश होने वाला भी अत्याचारी ही है।हज़रत अली ने अपनी पुस्तक नैजुल बलागाह मे जीवन का कोई पहलू छोड़ा नही है ।इसी पैग़म्बरे इस्लाम मोहम्मद मुस्तफा स. ने कहा है कि मै इल्म का शहर तो अली उसके दरवाज़े हैँ ।अली वह ज़ात हैँ जिसकी विलादत भी मोजिज़ा और जिसकी शहादत भी मोजिज़ा है ।वह सिफात के मरकज़ थे तभी तो पैदा भी अल्लाह के घर मे हुये और शहीद भी अल्लाह के घर मे हुए ।अगर आज अली के बताये रास्ते पर कुछ दूरी तक भी चला जाये तो दुनियां और समाज मे फैली आशान्ति समाप्त हो सकती है ।इंसानो के बीच गैरबराबरी और नफरत मिट सकती है ।लेकिन पिछली 13 शताब्दियोँ से पैग़म्बरे इस्लाम और अली को याद किया जाता है लेकिन हम इन तारीखों के बीत जाने के बाद फिर अपने अंदाज़ मे जीने लगते है।

व्यक्तित्व और आध्यात्मिकता ( रूहानियत)

लेबनान के प्रसिद्ध ईसाई लेखक जो हज़रत अली(अ) की महानता के समक्ष सिर झुकाते हुए लिखते हैं कि- इस महान व्यक्ति को चाहे आप पहचानें या न पहचाने वह गुणों और महानताओं का आसीम तत्व है। शहीद और शहीदों का सरदार, मनुष्य की न्याय की पुकार और पूर्वी जगत का अमर व्यक्तित्व है। आदम व हव्वा की सन्तान में किसी ने भी सत्य के मार्ग पर अली की भान्ति कदम नहीं उठाया। अली का इस्लाम उनके हृदय की गहराइयों से ऐसा निकला था जैसे पानी की धारा अपने सोते से उबल कर बाहर आती है।

उस काल में प्रत्येक मुसलमान, इस्लाम स्वीकार करने से पूर्व क़ुरैश की मुर्तियों की पुजा किया करता था। परन्तु हज़रत अली की प्रथम उपासना मोहम्मद(स) के ईश्वर के समक्ष थी। अली एक पहाड़ की भान्ति सत्य के मार्ग पर डटे रहे और उन्होंने अपनी पवित्र मानव प्रवृत्ति और बुद्धि,आस्था एवं ईमान की शक्ति के सहारे भ्रष्ट शक्तियों के अत्याचार व पूंजीवाद से मुकाबिला किया। वे उंची लहरों की उठान वाला ऐसा समुद्र हैं जिसमें पूरी सृष्टि समा गयी है और जो एक यतीम बच्चे की आंखो से बहते आंसुओं से तूफानी हो उठता है। यह लिखने के पश्चात ईसाई लेखक जोर्दाक़ अपनी आत्मा की गहराई से गुहार लगाता हैः हे संसार! क्या हो जाता यदि तू अपनी समस्त शक्ति को एकत्रित करके हर काल में अली जैसी बुद्धि, हृदय, ज़बान और तलवार वाले किसी व्यक्तित्व को पैदा कर देता। संसार में एक नयी लहर उत्पन्न होने और ऐसे जागृत और ज्ञान से भरे हृदयों की संख्या के बढ़ने से जो सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं, यह ईसाई लेखक कहता है- नई शताब्दी आगयी है और अचानक हम देखते हैं कि अबू तालिब के पुत्र के व्यक्तित्व से जो अर्थ और मुल्य प्रकट होते हैं और निरन्तर हर सांस के साथ बढ़ते-२ उच्च शिखर तक पहुंचते हैं और उसके परिणाम स्वरूप उत्तम स्वभाव एवं चरित्र सामने आता है तो उसके द्वारा मनुष्य की वफ़ादारी साकार होती है। लोगों को वास्तविकता औरशिक्षा एवं विद्या का जितना ज्ञान होता है उन्हें दूसरों की आज्ञानता से उतना ही दुख होता है । अली(अ) भी ऐसे ही लोगों में से हैं। वे स्वयं ज्ञानऔर बुद्धी की दृष्टि से एक अनुदाहरणीय व्यक्ति है अतः बुद्धिहीन लोगों की अज्ञानता और अदूरदर्शिता बहुत दुखी करती और वह अपने उच्च विचारों के साथ लोगों की बुद्धि और ज्ञान में परिवर्तन लाते और इस मार्ग पर लोगों को अपने अनुसरण पर प्रेरित करते। वे कहते हैं – याद रखो मेरे पिता उन पर न्योछावर हो जायें जो मेरे बाद लोगों को सत्य के मार्ग पर बुलाते हैं उनके नाम आकाश में प्रसिद्ध हैं और धरती पर अपरिचित। जान लो, कि ऐसी घटनाओं की प्रतिक्षा में रहो जो तुम्हारे कार्यों में उथल पुथल मचा देंगी।

अली(अ) अज्ञान व्यक्ति को आश्चर्यचकित और भटका हुआ मानते हैं जब की ज्ञानी व्यक्ति को केवल बुद्धि पर आधारित रहने से रोकते हैं क्योंकि मनुष्य जिस प्रकार ज्ञान और वास्तिविक्ता की खोज में रहने वाले अपने रुझान से प्रभावित होता है उसी प्रकार आत्म-मुग्धता और सत्ता-लोलुप्ता की भावना से भी प्रभावित रहता है।

हज़रत अली अलैहिलस्सलाम अंधे अनुसरण को सत्य प्रेम की भावना के विरुद्ध होने के कारण, अस्वीकारीय कहते हैं और सभी को, चेतना वदूरदर्शिता का आहवान करते हुए कहते हैं ईश्वर की कृपा हो उस दास पर जो विचार करे, पाठ ले और देखने वाला बन जाए।

दूरदर्शिता को यदि परिभाषित करना चाहें तो इसका अर्थ एक ऐसा विशेष प्रकार का तेज व प्रकाश होता है कि जो चिंतन और ईश्वरीय संदेश व महान मार्गदर्शकों की मशाल से उजाला प्राप्त करने के कारण, मनुष्य के अस्तित्व की गहराईयों में पैदा हो जाता है। दूरदर्शिता से दूर लोग वास्तव में मानवीय जीवन से भी दूर होते हैं क्योंकि उनका मन अंधकार में होता है और वे वास्तविकता को देख नहीं सकते इसी लिए कल्याण व परिपूरण्ता के मार्ग से भी वे परिचित नहीं होते। क़ुरआने मजीद ने उन लोगों की कि जिन के मन में दूरदर्शिता का दीया जल रहा हो और जो इससे वंचित हों आपस में तुलना करते हुए कहा है क्या जो मृत हो और उसे हमने जीवित किया हो और उसके लिए प्रकाश पैदा किया हो ताकि उसके उजाले में वहलोगों के मध्य चले, उस व्यक्ति की भांति हो सकता है जो मानो अंधकारों में फंसा हो और उससे निकलने वाला न हो? इस प्रकार से नास्तिकों के लिए वे जो काम करते हैं , उसे अच्छा बनाया गया है।

दूरदर्शिता इस लिए भी महत्वपूर्ण होती है क्योंकि यह समस्त मानवीय कार्यों का ध्रुव होती है और विभिन्न लोगों की प्रतिक्रियाएं उसी के आधार पर सामने आती हैं। वास्तव में किसी भी मनुष्य का महत्व और मूल्य उसकी विचारधारा पर निर्भर होता हैं जैसाकि हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैंः हर मनुष्य का मूल्य उसकी बुद्धिमत्ता के अनुसार होता है।

इसी संदर्भ में इमाम अली अलैहिस्सलाम लोगों को बुद्धि व चिंतन की मशाल के साथ ही ईश्वर से भय की सिफारिश करते हैं। वास्तव में दूरदर्शिता के दीपक की लौ को सदैव जलाए रखने के लिए आंतरिक इच्छाओं की आंधी के सामने मज़बूत दीवार खड़ी किये जाने की आवश्यकता है और ईश्वर से भय वही मज़बूत दीवार है जो मनुष्य के भीतर उठने वाले आंतरिक इच्छाओं के प्रंचड तूफान को रोकने की क्षमता रखती है।

बुद्धि भी मानवीय दूरदर्शिता का एक स्रोत है। चिंतन का काम, इस सृष्टि में बुद्धि के ज़िम्मे रखा गया है। दूसरे शब्दों में चिंतन और विचार करना स्वंय ही दूरदूर्शिता का कारण बनता है। इमाम अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि जिसका चिंतन लंबा होगा उसकी दूरदर्शिता उतनी ही अच्छी होगी।

जिन लोगों को गहरी पहचान नहीं होती और सृष्टि के बारे में उनका ज्ञान, केवल पांचों इन्द्रियों से आभास योग्य वस्तुओं तक ही सीमित होता है वह उन रोगियों की भांति होते हैं जो अचेतना व अज्ञान के रोग में ग्रस्त होते हैं। जिन लोगों का मन अंधा होता है वह एसे रोगी होते हैं जिनके मन व आत्मा से ज्ञान प्राप्ति का मार्ग बंद हो चुका होता है इसी लिए वह सृष्टि की गहरी पहचान से वंचित होते हैं। हज़रत अली अलैहिसस्लाम, बनी उमैया को एसे लोगों के ही समूह में शामिल समझते हैं कि जिन्होंने तत्वदर्शिता के प्रकाश से अपने मन और अपनी आत्मा को प्रकाशमय नहीं किया और ज्ञान की मशाल से अपने ह्रदय में उजाला नहीं भरा। हज़रत अली उन लोगों के लिए दुआ करते हैं जो ज्ञान व तत्वदर्शिता के लिए प्रयास करते हैं। वे कहते हैं हे ईश्वर! उसके पापों को क्षमा कर दे जो ज्ञान की भली बात सुन कर उसे स्वीकार कर लेता है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम बुद्धिमत्ता को दूरदर्शिता का कारण बताते हुए कहते हैं यह बुद्धिमान लोग वह है जो बुद्धि की आंख से सृष्टि को देखते हैं और उनकी दृष्टि इस भौतिक जगत को पार करती हुई, महसूस न की जाने वाली वस्तुओं के जगत तक पहुंच जाती है और उसके परिणाम में वे उस मार्ग और उस गंतव्य को भी देख लेते हैं जो उस अंतिम घर तक जाता है।

इमाम अली अलैहिस्सलाम, अपने उपदेशों में क़ुरआन को बुद्धिमानों के लिए सत्य का स्रोत बताते हैं और मुसलमानों से कहते हैं कि वे कुरआन की शिक्षाओं का पालन करके कल्याण तक पहुंच जाएं। उन्होंने कहा है कि , तुम लोग क़ुरआन द्वारा, देखते हो , यह किताब, उन लोगों को जो उसके प्रकाश में क़दम बढ़ाते हैं सही मार्ग से भटकने नहीं देती और उन्हें उनके गंतव्य तक पहुंचाने के काम में उल्लंघन नहीं करती।

हज़रत अली अलैहिस्लाम एक अन्य स्थान पर कु़रआन को ऐसा मार्गदर्शक बताते हैं कि जो कभी भटकाता नहीं और सिफारिश करते हैं किविभिन्न कामों में क़ुरआन से सहायता मांगीं जाए। वे कहते हैं जान लो! निश्चित रूप से यह क़ुरआन ऐसा उपदेशक है जो धोखा नहीं देता और ऐसामार्गदर्शक है जो भटकाता नहीं और ऐसा वक्ता है जो कभी झूठ नहीं बोलता।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम का एक अन्य उपदेश, इतिहास से पाठ लेना और बीते हुए लोगों के अंजाम से पाठ लेने का आह्ववान है। वे अपने पुत्र इमाम हसन अलैहिस्सलाम से अपनी वसीयत में कहते हैं इतिहास से संवेदशनशील व शिक्षाप्रद व मूल्यवान बिन्दुओं की ओर अपने मन को आकृष्ट करो ताकि बीते हुए लोगों के अनुभवों से लाभ उठा सके और ऐसा सोचो और समझो मानो निकट भविष्य में तुम भी उनमें से किसी एक भी भांति होगो कि जिसे उसके मित्रो ने छोड़ दिया और जो परदेसी हो गया। सोचो के तुम्हें क्या करना होगा।

हज़रत अली अलैहिस्लाम की दृष्टि में मनुष्य उच्च स्थान और मान व सम्मान का स्वामी होता है और उसे अपने साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए जिससे उसके मानवीय स्थान को क्षति पहुंचे। इसी लिए जब वे सत्ता में थे और सवारी पर चल रहे थो तो उन्होंने पैदल अपने साथ चलने वालों से कहाः वापस जाओ क्योंकि मेरी सवारी के साथ तुम्हारे पैदल चलने से शासक में घंमड और धर्म पर आस्था रखने वालों में तुच्छता का भाव उत्पन्न होता है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम जो सत्य व सच्चाई के ध्वजवाहक हैं सदैव लोगों को सत्य की राह में डटे रहने की सिफारिश करते हैं। वे सब से बड़ी भलाई, अत्याचारी शासक के सामने सत्य बोलने को कहते हैं और एसे लोगों का सम्मान करते हुए कहते हैं ईश्वर कृपा करे उस पर जो किसी सत्य को देखता है तो उसका समर्थन करता है या अत्याचार को देखता है तो उसके विरुद्ध संघर्ष करता है और सत्य के लिए अत्याचार के विरुद्ध उठ खड़ा होता है।

सत्ता के बारे में हज़रत अली का दृष्टिकोण

इस्लाम के उदय के आरंभ के कुछ दशकों और उस काल की उतार-चढ़ाव भरी घटनाओं पर दृष्टि, हज़रत अली अलैहिस्सलाम जैसे महान व्यक्ति की प्रभावी भूमिका स्पष्ट करती है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम बचपन में इस्लाम की प्रकाशमई शिक्षाओं से अवगत हुए और पैग़म्बरे इस्लाम सल्ल्ल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर ईमान के साथ उन्होंने ईश्वर के ज्ञान की वर्षा से अपने शरीर तथा आत्मा को तृप्त किया।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्ल्ल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की छत्रछाया में हज़रत अली ने इस प्रकार प्रशिक्षण पाया कि गूढ ईश्वरीय शिक्षाओं के महान भण्डारों के साथ वे सदा ही असत्य के मुक़ाबले में अग्रणी रहे और सच्चे धर्म को प्रचारित करने के मार्ग में वे किसी भी प्रकार के बलिदान से पीछे नहीं हटते थे। वर्षों तक मक्का और मदीना में पैग़म्बरे इस्लाम सल्ल्ल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के स्वर्गवास तक पैग़म्बर की सेवा में उनकी उपस्थिति, अन्तिम ईश्वरीय दूत के लिए उनके निष्टापूर्ण प्रयासों की परिचायक है।

पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के पश्चात हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपनी प्रतिबद्धताओं के कारण पैग़म्बरे इस्लाम की शिक्षाओं से प्रेरणा लेते हुए सत्य को लागू करने और पैग़म्बरे इस्लाम की शिक्षाओं को व्यवहारिक बनाने के अतिरिक्त कोई अन्य विचार अपने मन में आने ही नहीं दिया। इसीलिए सत्य की स्थापना और धार्मिक सरकार का लागू करना उनके कार्यक्रमों में सर्वोपरि था।

यद्यपि पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के पश्चात की घटनाएं और उनके उत्तराधिकारी के निर्धारण के संबन्ध में जो कुरीतियां सामने आईं उन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को २५ वर्षों तक सत्ता से दूर रखा किंतु चार वर्ष तथा कुछ महीनों के उनके सत्ताकाल के दौरान उनकी ओर से प्रस्तुत किये गए दृष्टिकोणों ने सरकार के संबन्ध में धार्मिक विचारों में नया आदर्श प्रस्तुत किया। इमाम अली के प्रकाशमई विचारों में सरकार के विषय को अति विशेष महत्व प्राप्त है।

जैसाकि आप जानते हैं कि सत्ता तक पहुंचने के मार्गों के संबन्ध में राजनीतिक दृष्टि से विभिन्न प्रकार के दृष्टिकोण पाए जाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सत्ता की प्राप्ति को हरसंभव मार्ग से वैध समझते हैं चाहे उसके लिए कोई भी मार्ग क्यों न अपनाना पड़ें। इस दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति का नैतिक आधार नहीं है और राजनेता का उद्देश्य, केवल सत्ता तक पहुंच और समाज पर नियंत्रण है।

इसी के मुक़ाबले में मानवीय मूल्यों के आधार पर एक अन्य विचारधारा मौजूद है। इस विचारधारा में राजनेता को इस बात का अधिकार नहीं है कि वह सत्ता तक पहुंचने के लिए हर प्रकार का मार्ग अपनाए। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की राजनीतिक विचारधारा इसी बात पर आधारित है। उनके मतानुसार सरकार का उद्देश्य यह है कि मानव समाज को भौतिक परिपूर्णता के साथ ही आध्यात्मिक परिपूर्णता तक पहुंचाकर सामाजिक न्याय को स्थापित किया जाए।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम उस राजनीति के पुनर्जीवित करने वाले थे जिसका आधार पैग़म्बरे इस्लाम सल्ल्ल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने रखा था। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने पैग़म्बरे इस्लाम की सरकार को आगे बढ़ाने के लिए यद्यपि अथक प्रयास किये थे किंतु उनके स्वर्गवास के वर्षों बाद जब उन्होंने सत्ता की बागडोर अपने हाथों में ली तो उनको यह बात भलिभांति पता थी कि पैग़म्बरे इस्लाम और क़ुरआन की शिक्षाओं की ओर समाज को वापस ले जाने के लिए सतत प्रयासों की आवश्यकता है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा के १३१वें ख़ुत्बे या व्याख्यान में सत्ता की बागडोर संभालने के पीछे अपने उद्देश्यों का उल्लेख इन शब्दों में करते हैं कि हे, ईश्वर! तू जानता है कि हमने जो कुछ किया वह न तो इसलिए था कि किसी देश या साम्राज्य को हथियाया जाए न ही इसलिए है कि तुच्छ संसार से लाभ उठाया जाए बल्कि यह इसलिए था कि तेरे धर्म की अदृश्य हो जाने वाली निशानियों को वापस लाया जाए और तेरे राष्ट्र में सुधार को लागू किया जाए ताकि तेरे अत्याचारग्रस्त बंदे सुरक्षित रहें और तेरे नियम जो भुला दिये गए हैं पुनः व्यवहारिक हो सकें।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम, सरकार के लिए न्याय को बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्वांत एक जीवनदायक नियम मानते थे तथा इसपर अपनी कथनी और करनी दोनों में बल देते थे। उनके अनुसार राजनीति का महत्वपूर्ण आधार न्याय है। वास्तव में इमाम अली अलैहिस्सलाम की राजनीतिक विचारधारा को न्याय के बिना समझा ही नहीं जा सकता।

न्याय को लागू करने में वे किसी भी प्रकार की ढ़ील स्वीकार नहीं करते थे। न्याय को इस स्पष्ट ढंग से लागू करना उस समय के कुछ संभ्रांत लोगों एवं गुटों को अच्छा नहीं लगता था और इसी विषय ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम के लिए भी बहुत सी समस्याएं उत्पन्न कर दी थीं। उनके अनुसार समाज के संतुलन को सुरक्षित रखने का मूल तत्व न्याय ही है।

न्याय ही समाज रूपी शरीर को सुरक्षा और उसकी आत्मा का शांति प्रदान करता है। न्याय एक ऐसा राजमार्ग है जो सबको स्वयं में स्थान दे सकता है और बिना किसी समस्या के उन्हें गंतव्य तक पहुंचाता है किंतु अन्याय ऐसा दुर्गम मार्ग है जो अत्याचारी को भी उसके गंतव्य तक नहीं पहुंचाता। ऐसा समाज जिसमें न्याय स्पष्ट नहीं होता वह एक ऐसा समाज है जोइस प्रकार के समाज में एकता की भावना समाप्त हो जाती है जिसके परिणाम स्वरूप शत्रु बहुत तेज़ी से इस पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कई बार सत्ता स्वीकार करने का कारण सत्य की स्थापना और असत्य से संघर्ष करना बताया। अब्दुल्लाह बिन अब्बास कहते हैं कि मैने ज़ीक़ार नामक क्षेत्र में, जो बसरा के मार्ग में था, हज़रत अली से भेंट की। मैंने देखा कि वे अपनी जूतियां टांक रहे थे।

इसी बीच उन्होंने मेरी ओर मुख करके कहा कि इस जूती का मूल्य कितना होगा? मैंने कहा कि इसका कोई मूल्य नहीं है। इसपर इमाम अली ने कहा, ईश्वर की सौगंध इस पुरानी जूती का महत्व मेरी दृष्टि में तुम पर शासन करने से अधिक है मगर यह कि सत्य की स्थापना करूं या असत्य को रोकूं।

इसी संदर्भ में हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने एक गवर्नर अशअस बिन क़ैस को पत्र के माध्यम से संबोधित करते हुए कहते हैं कि सत्ता कोई स्वादिष्ट कौर नहीं है जो तुम्हारे हाथ लगा है बल्कि यह दायित्वों से भरी अमानत है जो तुमको दी गई है। तुमसे ऊपर वाला शासक इमाम तुमसे जनता के अधिकारों की सुरक्षा चाहता है। तुमको यह अधिकार नहीं है कि लोगों के साथ स्वेच्छा से तानाशाही का व्यवहार करो।

आम जनता तथा शासक के बीच आध्यात्मिक संबन्ध एक लोकतांत्रिक सरकार की आवश्यकताओं में से है। शासक उस समय इस कार्य में सफल हो सकता है जब वह जनता के दुख-दर्द को समझे, उनकी आवश्यकताओं को पहचाने और इन बातों के दृष्टिगत वह उनके हितों की पूर्ति के लिए प्रयास आरंभ करे। इसी प्रकार उसे जनता को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि वह उनके हितों का रक्षक है ताकि जनता उसकी सरकार से हृदय से प्रेम करे।

इसी संबन्ध में हज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा के ५३वें पत्र में मालिके अश्तर को संबोधित करते हुए कहते हैं- लोगों के साथ प्रेम करो, उनके साथ विनम्र रहो, ऐसा न हो कि एक नरभक्षी पशु की भांति लोगों का ख़ून बहाने में जुट जाओ, क्योंकि वे दो गुटों में हैं। या यह कि धर्म की दृष्टि से वे तुम्हारे भाई हैं या मानवता की दृष्टि से तुम्हारे समान हैं।

उनसे भी ग़लती हो सकती है और जाने-अनजाने में वे पाप कर बैठते हैं अतः तुम जैसे चाहते हो कि ईश्वर तुम्हारे पापों के संबन्ध में तुम्हारे साथ करे और उन्हें क्षमा कर दे वैसा ही तुम उनके साथ करो और उनके पापों को क्षमा कर दो।

इमाम अली अलैहिस्सलाम की दृष्टि में राष्ट्र को संगठित करने में सरकार की भूमिका बहुत प्रभावी होती है। नहजुल बलाग़ा के १४६वें व्याख्यान में हज़रत अली अलैहिस्सलाम उस नीति की ओर संकेत करते हुए जिसे शासक को सरकार को सुरक्षित रखने के लिए अपनाना चाहिए, राष्ट्र की एकता और अखण्डता को सुरक्षित रखने के बारे में उसकी भूमिका का उल्लेख इन शब्दों में करते हैं- राष्ट्र के बारे में शासक की भूमिका उस डोर या धागे की भांति है जो माला के दानों को एक साथ संजोए रहता है। यदि यह डोर टूट जाए तो माला के दाने बिखर जाएंगे और सब एकत्रित नहीं हो पाएंगे।

इमाम अली अलैहिस्सलाम इस सादे उदाहरण से यह बताना चाहते हैं कि राष्ट्र की एकता की उच्च आकांक्षा का संबन्ध उस ज़िम्मेदार से है जो दृष्टिकोणों के मतभेद से दूर और मतभेद फैलाने वाले तत्वों से दूर राष्ट्र को एक धुरी पर एकत्रित करके संगठित करे और मतभेदों और फूट से सुरक्षित रखे।

स्वभाविक सी बात है कि यह सफलता प्रत्येक शासक के लिए संभव नहीं है बल्कि इसके लिए उस शालीन शासक की आवश्कयता होती है जो एकता को स्थापित करने मे दृढ़ हो, मतभेदों को समाप्त करने के प्रयास करे और भेदभाव की दीवार को तोड़ते हुए राष्ट्रीय एकता के मार्ग को एकेश्वरवाद की विचारधारा के द्वार प्रशस्त करे।

इमाम अली अलैहिस्सलाम ने नहजुल बलाग़ा के ४०वें व्याख्यान में जिसे उन्होंने सिफ़्फ़ीन युद्ध के पश्चात ख़वारिज नामक उद्दंड समूह को संबोधित करते हुए दिया था सरकार, उसकी आवश्यकता तथा न्याय प्रिय शासक के दायित्वों के संबन्ध में महत्वपूर्ण बातों की ओर संकेत किया है।

इस ख़ुत्बे में हम सरकार के बारे में हज़रत अली अलैहिस्सलाम के दृष्टिकोण को देखते हैं। आप कहते हैं कि निश्चित रूप से लोगों को शासक की आवश्यकता होती है जिसके सत्ताकाल में ईमान वाले अपने आध्यात्मिक मामलों को पूरा कर सकें तथा नास्तिक, भौतिक सुखों से आनंदित हो सकें।

शासक को चाहिए कि वह जनकोष को एकत्रित करे तथा शत्रुओं के साथ संघर्ष करे, मार्गों को सुरक्षित बनाए तथा निर्बलों के अधिकारों को शक्तितशालियों से वापस ले। इस प्रकार अच्छे लोग संपन्नता में रहेंगे और बुरों से सुरक्षित रहेंगे।

इमाम अली अलैहिस्सलाम की दृष्टि में सत्ता का स्वयं में कोई महत्व नहीं है बल्कि यह मानवीय लक्ष्यों तक पहुंचने का मात्र एक साधन है। हज़रत अली का मानना है कि सत्ता कभी भी लक्ष्य नहीं है। यही कारण है कि उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में कभी भी सत्ता की प्राप्ति के लिए कोई गतिविधि नहीं की।

उन्होंने अपने स्वार्थ के लिए कभी कुछ नहीं किया बल्कि अपने जीवन में उन्होंने जो कुछ भी किया वह ईश्वर की प्रसन्नता के लिए किया। इस बारे में वे कहते हैं कि यदि विद्वानों के बारे में ईश्वर का यह वचन न होता कि वे अत्याचार ग्रस्तों की भूख और अत्याचारियों के अत्याचारों पर मौन धारण न करें और हाथ पर हाथ रखकर न बैठे रहें तो ख़िलाफ़त अर्थात इस्लामी नेतृत्व की लगाम मैं यूंही छोड़ देता ताकि वह आगे बढ़ता रहे और मैं पहले दिन की भांति स्वयं को हर मामले से अलग रखता।

ख़िलाफ़त या इस्लामी शासन को स्वीकार करने में इमाम अली अलैहिस्सलाम का लक्ष्य केवल लोगों की भलाई और उनका सुधार था। सत्ता तक पहुंचने के लिए उन्होंने कभी कोई रूचि प्रदर्शित नहीं की और इसकी प्राप्ति के लिए उन्होंने कोई भी अनैतिक मार्ग नहीं अपनाया जबकि यह ऐसी स्थिति में था कि सत्ता उनका अधिकार था। सत्ता तक पहुंचने के लिए उन्होंने कभी भी कार्यक्रम नहीं बनाया और जबतक लोगों ने उनसे साग्रह अनुरोध नहीं किया उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।

उनके इस कार्य का रहस्य, ईश्वर के संबन्ध में उनकी विचारधारा में छिपा है। उनके लिए सत्ता उसी समय महत्व रखती है जब उससे न्याय लागू किया जाए और लोगों के अधिकारों पर ध्यान दिया जाए।

पहले मुस्लिम वैज्ञानिक अली इब्ने अबी तालिब।

बात करते हैं हज़रत अली के वैज्ञानिक पहलुओं पर. हज़रत अली ने वैज्ञानिक जानकारियों को बहुत ही रोचक ढंग से आम आदमी तक पहुँचाया. एक प्रश्नकर्ता ने उनसे सूर्य की पृथ्वी से दूरी पूछी तो जवाब में बताया की एक अरबी घोड़ा पांच सौ सालों में जितनी दूरी तय करेगा वही सूर्य की पृथ्वी से दूरी है. उनके इस कथन के चौदह सौ सालों बाद वैज्ञानिकों ने जब यह दूरी नापी तो 149600000 किलोमीटर पाई गई. अगर अरबी घोडे की औसत चाल 35 किमी/घंटा ली जाए तो यही दूरी निकलती है. इसी तरह एक बार अंडे देने वाले और बच्चे देने वाले जानवरों में फर्क इस तरह बताया कि जिनके कान बाहर की तरफ होते हैं वे बच्चे देते हैं और जिनके कान अन्दर की तरफ होते हैं वे अंडे देते हैं.
अली ने इस्लामिक थियोलोजी (Islamic Theology-अध्यात्म) को तार्किक आधार दिया. कुरान को सबसे पहले कलमबद्ध करने वाले भी अली ही हैं. बहुत सी किताबों के लेखक हज़रत अली है जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं
१. किताबे अली (Kitab E Ali)
२. जफ्रो जामा (Islamic Numerology पर आधारित)- इसके बारे में कहा जाता है कि इसमें गणितीय फार्मूलों के द्वारा कुरान मजीद का असली मतलब बताया गया है. तथा क़यामत तक की समस्त घटनाओं की भविष्यवाणी की गई है. यह किताब अब अप्राप्य है.
३. किताब फी अब्वाबुल शिफा (Kitab Fi Abwab Al Shifa)
४. किताब फी ज़कातुल्नाम (Kitab Fi Zakatul Name)
हज़रत अली की सबसे मशहूर व उपलब्ध किताब नहजुल बलागा (Nahjul Balagha) है, जो उनके खुत्बों (भाषणों) का संग्रह है. इसमें भी बहुत से वैज्ञानिक तथ्यों का वर्णन है.
माना जाता है की जीवों में कोशिका (Cells) की खोज 17 वीं शताब्दी में लीवेन हुक ने की. लेकिन नहजुल बलाग का निम्न कथन ज़ाहिर करता है कि अली को कोशिका की जानकारी थी. “जिस्म के हर हिस्से में बहुत से अंग होते हैं. जिनकी रचना उपयुक्त और उपयोगी है. सभी को ज़रूरतें पूरी करने वाले शरीर दिए गए हैं. सभी को काम सौंपे गए हैं और उनको एक छोटी सी उम्र दी गई है. ये अंग पैदा होते हैं और अपनी उम्र पूरी करने के बाद मर जाते हैं. (खुतबा-81) ” स्पष्ट है कि ‘अंग’ से अली का मतलब कोशिका ही था.
हज़रत अली सितारों द्बारा भविष्य जानने के खिलाफ थे, लेकिन खगोलशास्त्र सीखने के हामी थे, उनके शब्दों में “ज्योतिष सीखने से परहेज़ करो, हाँ इतना ज़रूर सीखो कि ज़मीन और समुद्र में रास्ते मालूम कर सको.” (77वाँ खुतबा – नहजुल बलागा)
इसी किताब में दूसरी जगह पर यह कथन काफी कुछ आइन्स्टीन के सापेक्षकता सिद्धांत से मेल खाता है, उसने मख्लूकों को बनाया और उन्हें उनके वक़्त के हवाले किया. (खुतबा – 01)
चिकित्सा का बुनियादी उसूल बताते हुए कहा, “बीमारी में जब तक हिम्मत साथ दे, चलते फिरते रहो.”
ज्ञान प्राप्त करने के लिए अली ने अत्यधिक जोर दिया, उनके शब्दों में, “ज्ञान की तरफ बढो, इससे पहले कि उसका हरा भरा मैदान खुश्क हो जाए.”
यह विडंबना ही है कि मौजूदा दौर में मुसलमान हज़रत अली की इस नसीहत से दूर हो गया और आतंकवाद जैसी अनेकों बुराइयां उसमें पनपने लगीं. अगर वह आज भी ज्ञान प्राप्ति की राह पर लग जाए तो उसकी हालत में सुधार हो सकता है.

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