LONDON: 92-year-old Indian artist Maqbool Fida Husain speaks as Indian Bollywood star actor Shah Rukh Khan (not pictured) paints June 7, 2007 at Bonhams' "Art For Freedom", in London. The highlight of the evening occurred when the two artists finished off a painting which then went on to be auctioned to raise funds for Tehelka, a media house in India, and the country's fastest-growing English weekly newspaper. AFP PHOTO/EDMOND TERAKOPIAN (Photo credit should read EDMOND TERAKOPIAN/AFP/Getty Images)

भारत के पिकासो कहे जाने वाले और पेंटिंग की कई परंपराओं को तोड़ने वाले व देश के सबसे महंगे पेंटर मकबूल फिदा हुसैन का यह शताब्दी वर्ष है। दो दिन पहले यानी की 17 सिंतबर 2015 को उनका सौंवा जन्‍‍मदिन था। यानी हुसैन साहेब हमारे बीच आज होते तो वह 100 वर्ष के होते।बहरहाल, हुसैन साहेब एक बेहतरीन चित्रकार, फिल्मलकार और अपने अनूठे व्यक्तित्‍व की वजह से पूरी दुनिया में चर्चा में रहे। चर्चा से ज्याादा उन्हें लेकर विवाद ज्यादा थे और विवाद हिंदू देवी-देवताओं की विवादित तस्वीरों को लेकर ज्यादा रहे। कई धार्मिक संगठनों ने न केवल उनकेपुतले जलाए, उनके घर पर तोड़-फोड़ की बल्कि उन्हें अदालत में भी घसीटा। अपने अंतिम समय में वे कतर की नागरिकता लेकर भारत छोड़ भी चुके थे, लिहाजा हुसैन साहेब को लेकर विवादों का एक लंबा दौर अनर्गल प्रलाप की तरह भी चला।

India's most renowned artist Maqbool Fida Husain i

वैसे बहुत ही कम लोग जानते हैं कि हुसैन साहेब अपनी पेंटिंग की तरह ही एक रहस्येमयी व्यक्तित्व ही थे। कई बार तो ऐसा लगा कि वे विवादों को खुद से हवा देते रहे या फिर अपने बारे में एक रहस्य या पर्दा हमेशा डालने की कोशिश में रहे। चाहे फिर बात उनके जन्म स्थान की हो या फिर नागरिकता की। जैसे उनके जन्म स्थान को लेकर। हुसैन साहब अपना जन्म स्थान महाराष्ट्र का पंढरपुर बताते हैं, लेकिन दरअसल वे अपनी उम्र के 60 साल तक अपना जन्मस्थान इंदौर ही बताते रहे।

वैसे सही मायनों में देखा जाए तो उनका सही जन्मस्थान मध्य प्रदेश का इंदौर ही था, लेकिन 60 वर्ष के बाद उन्होंने अपने जन्म स्थान को लेकर कई शहरों के नाम बताए उनमें से एक सोलापुर भी था। पंढरपुर का नाम वे इसलिए लेते रहे क्योंंकि वह उनका ननिहाल था और उन्हें अपनी मां से बहुत प्रेम था, लिहाजा उनकी याद में ही उन्होंने हर जगह पंढरपुर का नाम जोड़ा।

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यही नहीं हुसैन साहेब की नागरिकता को लेकर भी ऐसी कई बातें फैलाई जाती हैं, जो आज भी यह बताई जाती हैं कि मकबूल हिन्दूवादी संगठनों की धमकी की वजह से भारत छोड़कर चले गए थे। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि मकबूल को भारत से देश निर्वासित किया गया था और सबसे अधिक यह झूठ फैलाया जाता है कि मकबूल अपनी अंतिम सांस भारत में लेना चाहते थे, लेकिन हुसैन साहेब साम्प्रदायिक ताकतों की वजह से भारत नहीं आए। यह सच है कि एमएफ हुसैन पैदा भारतीय हुए थे, लेकिन उनकी मौत कतर के नागरिक के तौर पर हुई। उन्होंने 2010 में कतर की नागरिकता ली थी।

अक्टूबर 2010 में बीबीसी को दिए साक्षात्कार में हुसैन ने स्पष्ट शब्दों कहा था कि उन्होंने 2005 में भारत छोड़ा (कई पत्रकार 2006 भी लिखते हैं) क्योंकि मैं अपनी पेन्टिंग से जुड़ी तीन परियोजनाएं पूरी करना चाहता था। ना कि उस विवाद की वजह से, जिसमें मेरी कुछ पेन्टिंग की वजह से हिन्दुओं के एक वर्ग की आस्था को चोट पहुंची।

मकबूल ने कहा था कि मैं प्रवासी नागरिक हूं भारत का। (कतर की नागरिकता लेने के बाद) मैं कभी भारत जा सकता हूं। सिर्फ अब वहां मैं मतदान नहीं कर सकता। वह मैं पहले भी नहीं करता था। भारत जाने के लिए मुझपर कोई प्रतिबंध नहीं है। भारत में एमएफ हुसैन पर पेन्टिंग की वजह से 900 मुकदमे थे, जिनका सामना करने की हिम्मत मकबूल भारत आकर जुटा नहीं पा रहे थे और इसी डर से वे भारत नहीं आए। यही एकमात्र वजह थी, मकबूल के भारत ना आने की। इसलिए एमएफ हुसैन को लेकर फैलाए जा रहे अफवाहों पर ध्यान देने की जगह तथ्यों पर यकिन कीजिए।

यहां पीते थे हुसैन चाय : मकबूल फिदा हुसैन का जिक्र हो तो अहमदाबाद के लकी टी स्टॉल का नाम तो जेहन में आ ही जाएगा। शहर के जाली वाली मस्जिद से लगी हुई चाय की दूकान लकी इसलिए कला प्रेमियों के लिए खास है क्योंकि यहां मकबूल आकर चाय पीते थे। इस चाय की दूकान में मकबूल की एक पेन्टिंग भी लगी है, जिसके लिए एक विदेशी कला प्रेमी दूकान के मालिक को डेढ़ करोड़ की रकम देने को तैयार थे,लेकिन एक चाय के गिलास के बदले उपहार में मिली इस बेशकीमती पेन्टिंग की कोई कीमत नहीं हो सकती, ऐसा बोलकर उस चाय के दूकानदार ने कलाप्रेमी को निराश कर दिया। एक किस्सा और लकी की चाय और मकबूल के चाय प्रेम संबंध का।

92-year-old Indian artist Maqbool Fida H

मकबूल उन दिनों कतर में थे। उनके एक मित्र अहमदाबाद से कतर जा रहे थे। उन्होंने मकबूल से पूछा कि अहमदाबाद से तुम्हारे लिए क्या लेकर आऊ? मकबूल ने कहा कि लकी की चाय लेते आना। लकी वालों ने बड़े जतन से चाय पैक करके मकबूल साहब के लिए कतर भिजवाई थी।

वैसे मकबूल की इस चाय की दूकान को क्या सिर्फ इसलिए पसंद करते थे कि यहां अच्छी चाय मिलती थी? हो सकता है कि यह बात सच हो लेकिन इस चाय की दूकान पर आने वाले लोग इसलिए भी इस दूकान को नहीं भूलते क्योंकि यह दूकान कब्रों के ऊपर बनी है। मतलब आप कई मजारों से घिरे होते हैं, जब यहां चाय पी रहे होते हैं। कब्रों के बीच में चाय पी है कभी आपने, किसी कब्रिस्तान बैठे हैं देर तक। महसूस किया है रूहों को? मकबूल एक जहीन कलाकार थे, सो यह सब कर पाते होंगे।

साभार: आई बी एन सेवन

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