Wednesday, January 19, 2022

संघ की जननी, काँग्रेस या बीजेपी को सत्ता मे लाने वाले मुसलमान ?

- Advertisement -
वारिष्ट पत्रकार, जैगम मुर्तजा

एक बात लोग बड़े आराम से कह जाते हैं कि कांग्रेस संघ की जननी है या फिर कांग्रेस ने संघ को पाल पोस कर बड़ा किया है। ये आरोप सबसे ज़्यादा मुसलमान तंज़ीमें और कथित समाजवादी लगाते हैं। ये आरोप कितने सच हैं?

इसमें क़तई झूठ नहीं है कि लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई देकर और हर वर्ग को राजनीति में शामिल रहने के अधिकार के नाम कांग्रेस ने ख़ासचर नेहरू ने धार्मिक अतिवादियों (हिंदू ही नहीं मुसलमान और सिख चरमपंथियों की भी) अनदेखी की। सबको प्रतिनिधित्व और राजनीतिक विमर्श में आवाज़ देने का जुनून नेहरू में इस क़दर था कि उनकी पहली सरकार में श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी थे, घनघोर विरोधी अंबेडकर भी और मौलाना आज़ाद भी। आज तक कोई बहस या किताब ये साबित नहीं कर पाई है कि नेहरू मंत्रिमंडल के सामूहिक फैसलों पर कभी श्यामाप्रसाद मुखर्जी या मौलाना आज़ाद ने धार्मिक आधार पर विरोध जताया हो या कैबिनेट की बैठक से उठकर चले गए हों। अनुच्छेद 370, कश्मीर में सेना भेजने के अलावा हैदराबाद में रज़ाकारों से निपटने के नाम पर चले आपरेशन पोलो तक सब संसद से सरकार तक एकमत दिखते हैं। यही वजह थी कि बंटवारे की नफरत और देश भर में हुए भयंकर दंगों के बावजूद 1952 के पहले आम चुनाव में हिंदू महासभा को 4, शिरोमणि अकाली दल को 4, अखिल भारतीय राम राज्य परिषद को तीन, भारतीय जनसंघ को तीन, मद्रास स्टेट मुसगलीग को एक ही सीट पर जीत मिली। यानि लोगों ने धर्म और नफरत की राजनीति को पूरी तरह नकार दिया।

हिंदू महासभा और भारतीय जनसंघ की इस दुर्गति की बड़ी वजह गांधी हत्या से इन दलों के ख़िलाफ उपजी नफरत भी थी। गांधी से तमाम गतिरोध के बावजूद गांधी के लिए लोगों के मन में इज़्ज़त और सम्मान था। गांधी हत्या की ग्लानि और अपराधबोध इतना था कि संघ से जुड़े लोग भी ख़ुद को संघी नहीं बताते थे।

इस ग्लानि और अपराधबोध से संघ को किसने निकाला? तारीख़ पढ़िए और सत्तर के दशक के अख़बार ख़गालिए। पांचवी लोक सभा तक यानि के चुनाव से पहले तक भी तमाम गोलबंदी, पुनर्गठन, छोटे दलों के विलय के बावजूद जनसंघ की हैसियत 35 सीट से ज़्यादा की न थी। हालांकि हर चुनाव में पार्टी की सीट बढ़ती रहीं। 1977 के आम चुनाव में पहली बार संघ से जुड़े लोग सत्ता में आए और जनता पार्टी (जिसमें जनसंघ का विलय हो चुका था) की इस सरकार के साथ संघ की मुख्यधारा में वापसी हुई। मानिए या मत मानिए संघ को सत्ता में मुसलमान और समाजवादी अपने कंधों पर बिठा कर लाए। जामा मस्जिद के शाही इमाम ने बाक़ायदा जनता पार्टी उम्मीदवारों के समर्थन में पहली बार राजनीतिक फतवे जारी किए। लोगों से कहा गया कि कांग्रेस को हराना इस्लाम की बक़ा के लिए ज़रूरी है। गां गांव घूमकर अब्दुल्ला बुख़ारी ने भरोसा दिलाया कि मुसलमानों की मस्जिद और ख़ानक़ाहों की हिफाज़त जनता पार्टी करेगी और इंदिरा को हराना हर मुसलमान पर फर्ज़ है। चांदनी चौक सभेत देश की तमाम मुस्लिम बहुल सीटों पर जनता पार्टी के संघ समर्थित उम्मीदवार जीत कर आए। इसके बाद संघ और इससे जुड़े लोग सत्ता संस्थानों में दाख़िल होते चले गए। गांधी हत्या का पाप सत्ता ने धो दिया।

मज़े की बात है कि जनता पार्टी की ये सरकार दोहरी सदस्यता यानि जनता पार्टी और संघ की सदस्यता के विवाद की वजह से ही गिरी। जनसंघ के लोग सरकार से अलग हो गए और फिर सामने आया जनसंघ का मौजूदा अवतार भारतीय जनता पार्टी।

बीजेपी को 1984 के चुनाव में सिर्फ दो सीट मिलीं। इस चुनाव में कांग्रेस के 426 सांसद जीत कर आए। ये लोक सभा में अभी तक का सबसे प्रचंड बहुमत है और संघ/बीजेपी/ जनसंघ/हिंदू महासभा की सबसे बड़ी हार। कुल मिलाकर संघ और उसके चंपू ख़त्म मान लिए गए लेकिन ऐसा नहीं था।

अब्दुल्ला बुख़ारी, मौलाना ओबैदुल्लाह आज़मी, आरिफ मुहम्मद ख़ान, सैयद शहाबुद्दीन जैसे लोग फिर संघ की पैरवी में निकल पड़े। 1989 के चुनाव में जनता दल और बीजेपी के बीच गठबंधन हुआ और मुसलमानों ने खुलकर बदलाव के लिए वोट दिया। वीपी सिंह इस चुनाव के केजरीवाल थे और आरिफ मुहम्मद ख़ान अन्ना हज़ारे। मुसलमानों ने खुलकर बीजेपी/जनता दल को वोट दिया। अमरोहा, मुरादाबाद, चांदनी चौक समेत तमाम मुस्लिम बहुल सीटों पर संघ समर्थित उम्मीदवार जीतकर आए। मरी हुई मान ली गई बीजेपी 2 से सीधे 89 सांसद वाली पार्टी हो गई। ये बीजेपी/जनसंघ की अपने दम पर अभी तक की सबसे बड़ी चुनावी सफलता थी। इस सफलता से उत्साहित लाल कृष्ण आडवाणी रथ पर सवार हो गए और फिर बीजेपी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

2011 का अन्ना आंदोलन तीसरा मौक़ा था जब मुसलमान संघ को खाद पानी देने सड़कों पर उतरे। जे पी और वी पी की जगह अब अन्ना और उनके चेले देश को यक़ीन दिलाने निकले थे कि चाहे जो भी सरकार बनेगी वो मनमोहन सिंह की सरकार से बेहतर ही होगी। अन्ना के मंच पर हमूशा की तरह मौलवी साहेबान समर्थन देने के लिए हाज़िर थे। भूखे, तंगहाल और रिश्वत के ज़रिए तंत्र में जैसे तैसे बचे रह गए मुसलमानों को यक़ीन दिलाया गया कि साम्प्रदायिकता से बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार है। 2014 के चुनाव में मुसलमानों ने भी कांग्रेस को हराने के लिए वोट किया। इस बार बीजेपी को सीधे वोट नहीं दे सकते थे सो तीसरे, चौथे, पांचवे उम्मीदवार को वोट दिलाए गए । और नतीजा अब तक सामने है।

अगर देखा जाए तो संघ और बीजेपी को मुख्यधारा में लाने का श्रेय मुसलमानों को ही जाता है और थोड़ा बहुत कथित समाजवादियों को। न जेपी समाजवादी थे, न वीपी और न योगेंदर, प्रशांत, केजरी। मगर मुसलमानों ने हर बार उनपर भरोसा किया जो ख़ुद संघ की पालकी में सवार थे। मौलवी साहेबान मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के दौर में बेईमान नहीं हुए हैं बल्कि आज़ादी के पहले से ही दलाली करते चले आए हैं। हर उस पार्टी का समर्थन हमारे क़ायदों ने किया है जो आज़ादी के पहले से ही संघ के साथ हमबिस्तर रही है। मुसलिम लीग- हिंदू महासभा गठबंधन से ये रिश्ता बना था जो आजतक जारी है। बीजेपी पर भी बाबरी का कलंक न होता तो बहुत पहले से मौलवी साहेबान फूल वाला झंडा उठा लेते। अब भी पिछले छ साल से ये लोग कोशिश मेंषजुटे हैं कि संघ और बीजेपी पर से मुसलमानों के बीच अछूत का लेबल हटा दिया जाए ताकि खुलकर दलाली हो।

इसलिए अब अगर कोई दाढ़ी, टोपी, पायजामे वाला पूछे कि संघ को किसने खाद पानी दिया तो एक बार ज़रूर अपने दिल से जवाब पूछना और दिल से आवाज़ निकले तो कहना कि आपने। आख़िर कब तक हम अपनी बेईमानी और कमज़र्फी का बार दूसरों पर डालते रहेंगे? एक बार तो ईमानदारी से ग़लती तस्लीम कर लीजिए। अल्लाह अल्लाह ख़ेर सल्लाह

लेखक के निजी विचार है, कोहराम न्यूज़ लेखक द्वारा कही किसी भी बात की ज़िम्मेदारी नहीं लेता है। 

- Advertisement -

[wptelegram-join-channel]

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot Topics

Related Articles