you are more dangerous than china

दीप पाठक 

पौड़ी से नौगांवखाल तक जाते हुए जब चौबट्टाखाल के सघन बांज को पार करते हैं तो अचानक घाटी खुल जाती है पहाड़ियों में विस्तृत फैलाव है ये कोटद्वार से पौड़ी तक बना अंग्रजों के जमाने का मोटर रोड है जो मानव श्रम और पर्यावरण के पूरे मानकों से बना है जो बरसात में भी बंद नहीं होता गांववालों ने बताया कि ग्रामीणों ने स्वयं श्रमदान कर 45 किमी मोटर रोड बनायी तब ये घाटी बहुत आबाद थी यही मुख्य मोटर रोड थी इस इलाके में आज 80% पलायन हो चुका है एक दो नाली नहीं हजारों हैक्टेयर पहाड़ काटकर बनाये गये खेत बंजर पड़े हैं यहां से पलायन कोई 45 बरस पहले ही शुरु हो गया था सड़क किनारे के उजाड़ गांव और कबसे बंद पड़ी दुकानें देखकर ही लगता है कि कभी यहां बहुत चहल-पहल रहती होगी ये मोटर मार्ग व्यस्त रहा करता होगा ! कभी पौड़ी मुख्यालय की यह मुख्य सड़क थी और कोटद्वार-रामनगर यहां की मंडी हुआ करती थी ! पर अब सीमित वाहन हैं देहरादून से आने वाली सड़क ने इस सड़क के ट्रेफिक को अपने उपर ले लिया ! एक बात समझ आयी कि अगर सड़क ही विकास का मानक होती तो पौड़ी जिले में सबसे ज्यादा सड़क हैं , एक बुजुर्ग ने बताया कि सड़कें संसाधन लेकर भी आती हैं पर यहां से तो गया ही पलायन इतना हुआ कि सड़कों से एकतरफा दिल्ली दून दीगर शहरों में यहां की आबादी का प्रवाह जारी रहा यहां वो ही लोग बचे जो यहीं सरकारी नौकरी करते हैं या जो पलायन नहीं कर पाए यहां के अधिकांश नौकरी पेशा लोग दून या आसपास के शहरों से आते हैं !

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नीचे नैयार नदी में थोड़ा सा पानी है जो धार के खेतों के लिए बेकार है खाली पड़े गांव जहां शायद अब लोग लौट के नहीं आऐंगे, इन गांवों में खाली पड़े खेत सोचिए कितनी पीढीयों का कितने बरसों का श्रम लगा होगा निपट खाली पड़े इस क्षेत्र की तरफ पहाड़ों में मंदिर-आश्रम बनाने वाले धार्मिक स्टेट के लोग भी रुख नहीं किये धार्मिक दुकान भी वहीं होती है जहां लोग हों आश्रम वगैरा भी ऐसे ही स्थानों पर होते हैं ! केदारनाथ बद्रीनाथ की तरफ धार्मिक पर्यटन है तो वहाँ आबादी है टूटती बहती सड़कें हैं सिरोबगड़ है डैम हैं दसियों जल विद्युत परियोजनाएं हैं सैकड़ो किलोमीटर टनल हैं हर साल मीलों सड़क टूटतीं हैं पुल बहते हैं उसी तेजी से जोड़-तोड़ कर मोटर मार्ग दुरुस्त कर दिये जाते हैं पी डबल्यू डी और बी आर ओ के पास यहां लगातार काम है और दूसरी तरफ ऐसा सामूहिक पलायन है, चमोली जोशीमठ में दसियों गांव विस्थापन की गुहार कर रहे हैं सरकार को ऐसे खाली पड़े गांवों को खरीद कर उनको आबंटित कर देना चाहिए ऐसा सुझाव लोग डी एम के माध्यम से सरकार तक ज्ञापनों के जरिये पहुंचा चुके हैं

धार्मिक स्थलों केदार बद्री यमुनोत्री गंगोत्री ने सीजनल रोजगार दिया और पर्यावरण के नजरिये से इस क्षेत्र के लिए आसन्न संकट पैदा कर दिया है गहनता से सोचा जाय तो ये तीर्थ उत्तराखंड के लिए तबाही बन गये और नदियां सरकारी लालच की भेंट चढ गयीं ये न होता तो कम से कम स्थानीय आबादी अपने संसाधनों पर अपना माडल तो खड़ा करते ! भूगर्भशास्त्रियों के अध्यन और चेतावनी का नकार और उपर से एकदम कच्चा और नया पहाड़ है उत्तराखंड प्रोफेसर खड़क सिंह वल्दिया की स्लाइड शो देखकर एक ही बात मेरे दिमाग में आयी कि “पहाड़ का निर्माण ही ध्वंश के लिए हुआ है !” और यह सच भी है अंधाधुंध निर्माण और नदियों ग्लेशियरों की लूट इस क्षेत्र की तबाही का कारण बनेगी रही सही कसर भूकंप और बादल फटने से हुई अतिवृष्टि से होगी ! चीन से खतरा नहीं है उत्तराखंड के लिए यहां का बिना सोचे समझे किया जाने वाला लूट पर टिका विकास ही खतरा है जो जगहें बसासत लायक थीं वहां से पलायन हो गया और खतरे की जगहों पर अंधाधुंध अतिक्रमण निर्माण जारी है !

अपने निर्माण से लेकर अब तक कई ध्वंस झेले होंगे सैकड़ों बार नदियों ने रास्ता बदला होगा सौ दो सौ हजार बरस का इतिहास हमें पता होगा पर पचास लाख बरस के हिमालय के लिए ये महज कुछ क्षण हैं और आने वाले क्षण फिर अपनी विभीषिका को दोहरायेंगे ही हिमालय मौन मूक शांत दिखता है भीतर जलजलों का सतत निर्माण जारी है ! जो हमारे बस में है उसे तो हम कर ही सकते हैं ! विवेक हीन विकास से अच्छा है सोच समझ कर ठहर कर काम किया जाय पर भावी समय को ध्यान में रखकर योजनाएं कहां बनती हैं सब लोग सबकुछ इसी जीवन में देख-भोग जाना चाहते हैं !

खेती बसासत वाली जगहें पलायन से खाली हो गयीं और दुर्गम जगहें टनल, ब्लास्टिंग, रगड़-बगड़ से खाली हो जायेंगी फिर चीन आये या जापान आये क्या फरक पड़ता है ?

नोट – यह लेखक के निजी विचार है

लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार है तथा घुमक्कड़ी में दिलचस्पी रखते है देश के कोने कोने से परिचित दीप पाठक पहाड़ तथा पहाड़ी लोगो की समस्याएं उठाने में सवैद आगे रहते है