जब कभी मैं अफगानिस्तान के बारे में कुछ पढ़ता या सुनता हूं तो दो शब्द मेरे दिलो-दिमाग में आते हैं। पहला शब्द है- अज़ान। अफगानिस्तान की कई मस्जिदें बहुत प्राचीन और बहुत सुंदर हैं। वहां से आती अज़ान जब पहाड़ों में गूंजती है तो और ज्यादा मनमोहक हो जाती है। अज़ान दिल को बहुत खुशी और सुकून देती है।

दूसरा शब्द है- तालिबान। पश्चिम के कुछ देशों और तालिबान ने मिलकर अफगानिस्तान को जंग का अखाड़ा बना दिया है। टूटी हुईं छतें, दीवारों पर गोलियों के गहरे निशान और उदास चेहरों को देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि अफगानिस्तान में कुछ तो ऐसा है जो ठीक नहीं है।

अगर अफगानिस्तान में अज़ान पर अमल होता और वहां एक मजबूत लोकतंत्र होता तो इस देश की गिनती दुनिया के सबसे ज्यादा खुशहाल मुल्कों में होती।

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मैं अफगानिस्तान को एक देश के साथ ही एक सबक भी मानता हूं, ठीक उसी तरह जैसे पाकिस्तान एक सबक है। अफगानिस्तान में जब तालिबान का उदय हुआ तो शुरुआत में ये लोग सभी को बहुत भले लगे।

इसे विद्यार्थियों का एक आंदोलन माना गया जो समाज में इस्लाम के असल सिद्धांतों को लागू करने की बात करता था। तब तालिबान कई आंखों का तारा हुआ करता था। कोई इन्हें महान देशप्रेमी कहता तो किसी के लिए ये सच्चे मुजाहिद्दीन थे।

धीरे-धीरे वहां तालिबान मजबूत होता गया और सरकार ने उसके सामने घुटने टेक दिए। तालिबान में इतनी हिम्मत आ गई कि उसने बड़े-बड़े अफगान नेताओं की हत्या कर दी। तालिबान बहुत ताकतवर हो चुका था।

आज अफगानिस्तान-पाकिस्तान में तालिबान को लेकर भारी भ्रम फैला हुआ है। कई लोगों का मानना है कि एक तालिबान अच्छा है और दूसरा तालिबान बुरा। अब आम लोग यह कैसे तय करें कि कौनसा तालिबान अच्छा है और कौनसा बुरा? क्या बुरे तालिबान की पहचान के लिए बम धमाकों का इंतजार करना चाहिए?

क्या ही अच्छा होता, अगर अफगानिस्तान की सियासत समय रहते उन तमाम संगठनों को काबू में करती जो धर्मरक्षक होने का दावा कर रहे थे। आज तो वहां हालात बहुत विस्फोटक हो चुके हैं।

मैं ऐसे ही एक संगठन की दस्तक भारत में सुन रहा हूं जिसका नाम गौरक्षक है। तालिबान की तर्ज पर ही ये लोग धर्म का मुखौटा पहनकर आए हैं और धर्म, संस्कृति व गौरक्षा के नारे लगा रहे हैं। इन्हें राजनेताओं, आम नागरिकों की सहानुभूति भी मिल रही है, लेकिन इनके कारनामे साफ जाहिर कर रहे हैं कि अगर अभी इन पर सख्ती न बरती गई तो यह तालिबान का दूसरा अवतार होगा।

सबसे बड़ी बात है कि तालिबान की तरह ही ये लोकतंत्र के कानून को नहीं मानते। अभी अलवर में एक शख्स की पीट-पीटकर हत्या कर दी। इससे पहले जयपुर की एक होटल में बीफ की अफवाह पर भारी हुड़दंग मचाया। अख्लाक का कत्ल तो याद ही होगा।

इस विषय पर जब लोगों से बात करो तो कहते हैं कि सभी गौरक्षक एक जैसे नहीं होते। कुछ गौरक्षक बुरे हैं और कुछ अच्छे यानी तालिबान की तरह ही अच्छे गौरक्षक और बुरे गौरक्षक! यह स्थिति शक पैदा करती है। मेरा मानना है कि गौरक्षकों को सिर्फ अच्छा ही होना चाहिए, क्योंकि सबसे महान गौरक्षक श्रीकृष्ण थे। बुरा गौरक्षक होना ही नहीं चाहिए।

अफसोस कि आज वे लोग भी गौरक्षकों में शामिल हो गए हैं जिनके पास कोई काम नहीं है। वे सिर्फ हुड़दंग मचाने की कला में माहिर हैं। उन्हें अपने मां-बाप की सेवा से कोई सरोकार नहीं, लेकिन लाठी लेकर दूसरों की हड्डियां तोड़ना वे अपना प्रथम कर्तव्य मानते हैं। फिर चाहे मरने वाला बेगुनाह ही क्यों न हो, क्योंकि अक्ल से काम लेना तो इन्हें आता ही नहीं।

प्रधानमंत्री श्री मोदी ऐसे गौरक्षकों के प्रति नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट खासा खफा है, लेकिन इन्हें कोई परवाह नहीं है। मैं केंद्र सरकार से आग्रह करूंगा कि ऐसे नकली गौरक्षकों के साथ सख्ती से निपटा जाए।

साथ ही एक कानून लाकर गौहत्या पर प्रतिबंध लगाया जाए। इसमें खासतौर से यह बिंदु जोड़ा जाए कि सिर्फ वही व्यक्ति गुनहगार नहीं है जो गाय को काटता है, बल्कि जो व्यक्ति उपयोग के बाद गाय को गली-बाजारों में भटकने के लिए छोड़ेगा, वह भी गुनहगार है। उसे उम्रकैद तो होनी ही चाहिए। सिर्फ इतना कर दीजिए, फिर हर रोज गाय पर होने वाले ये बवाल खत्म हो जाएंगे।

अन्यथा गौरक्षा के नाम पर भड़काऊ संगठन बनते रहेंगे। मुझे फिक्र है, कहीं भारत में अगला तालिबान पैदा न हो जाए।

– राजीव शर्मा (कोलसिया) –

 

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