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वरिष्ठ पत्रकार, रवीश कुमार

मैं नेताओं के हिम्मत की दाद देता हूं। वाकई ये समझने लगे हैं कि हमारे नौजवानों को हिन्दू मुस्लिम टापिक के अलावा कुछ नहीं चाहिए। बिहार मे इस वक्त 80,000 से अधिक छात्र अपने एडमिट कार्ड का इंतज़ार कर रहे हैं। 1 अक्तूबर से परीक्षा होनी है। एडमिट कार्ड नहीं आने से परीक्षा में नहीं बैठ पाएंगे और उनका भविष्य बर्बाद हो जाएगा। एक साल बर्बाद होना कम नहीं होता है। मगध यूनिवर्सिटी के स्नातक तीसरे वर्ष के 80,000 से अधिक छात्र बेचैन हो गए हैं। आज 27 सितंबर है। 1 अक्तूबर से परीक्षा होनी है। वे अपनी बर्बादी का काउंटडाउन गिन रहे हैं और किसी को फर्क नहीं पड़ता। यह फर्क इसलिए नहीं पड़ता कि नेताओं को यकीन हो गया है कि ये छात्र और इनके मां बाप और पूरा ख़ानदान हिन्दू मुस्लिम टापिक खाकर ही सोएगा। जीएगा और मरेगा।

कालेज और यूनिवर्सिटी की लड़ाई में इन छात्रों की ज़िंदगी से कोई कैसे खेल सकता है। क्या बिहार का समाज मर गया है? कई कालेज की मान्यता रद्द हो गई है। यहां पर एडमिशन हो गए थे। बाद में इन्हें दूसरे कालेजों से जोड़ा गया और कहा गया कि यूनिवर्सिटी परीक्षा देने देगी। राज्य सरकार को जेल भेजना चाहिए उन लोगों को जिन्होंने बिना उससे मान्यता लिए कालेज खोल लिए। इन कालेजों को आखिर कैसे यूनिवर्सिटी से मान्यता मिली हुई थी जबकि राज्य सरकार से संबद्धता नहीं थी। किसने नौजवानों का ख़ून चूस कर पैसे बनाए हैं। 112 कालेज इस तरह से खुल सकते हैं क्या? किसी ने 62 कालेज भी लिखा है। ज़ाहिर है कोर्ट इनकी मान्यता रद्द करेगा ही। हाईकोर्ट ने मान्यता रदद कर दी। आदेश भी दिया कि इन छात्रों को दूसरे कालेज से टैग किया जाए और परीक्षा का फार्म भरे।

वैसे ही मगध यूनिवर्सिटी का सत्र 7 महीने लेट है। इन छात्रों ने 2015-18 के सत्र में एडमिशन लिया। दो साल पास भी कर चुके हैं लेकिन तीसरा साल लटक गया। 80,000 से अधिक छात्र अगर परीक्षा नहीं दे पाएंगे तो उनका साल बर्बाद हो जाएगा। मुझे कई ज़िलों के कालेज के छात्र मेसेज कर रहे हैं। पटना के सेंत ज़ेवियर कालेज के छात्र मेसेज कर रहे हैं। उन्हें समझना चाहिए कि मेरे पास कोई सचिवालय नहीं है। व्हाट्स एप पर दो चार लोग ही मेसेज भेज सकते थे। मैं उनकी व्यथा समझता हूं पर मुझे हज़ारों मेसेज भेज कर क्या होगा।

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क्या बिहार में किसी नेता को शर्म नहीं है कि इन 80,000 छात्रों की बेचैनी दूर करने के लिए मुख्यमंत्री से बात करे। उप मुख्यमंत्री से बात करे ताकि कोई रास्ता निकले। अखबारों में छप रहा है। इसके बाद भी किसी को फर्क कैसे नहीं पड़ता है। क्या ये वाकई 80,000 हैं, अगर हैं तो अपनी लड़ाई ख़ुद क्यों नहीं लड़ लेते? इन्होंने जो वीडियो भेजे हैं उसमें सौ पचास ही क्यों दिखते हैं?

वरिष्ट पत्रकार, रवीश कुमार

मध्य प्रदेश से भी बड़ी संख्या में नौजवान मुझे मेसेज कर रहे हैं। उनका कहना है कि राज्य में आठ साल बाद चुनावी साल में उच्च माध्यमिक शिक्षक भर्ती की परीक्षा के विज्ञापन आए हैं। परीक्षा कब होगी, रिज़ल्ट कब आएगा और ज्वाइनिग कब होगी, इन नौजवानों को पता है, फिर भी मेरा यकीन है कि इनका बड़ा हिस्सा हिन्दू मुस्लिम टापिक के नशे में रहता होगा। लेकिन इनकी समस्या भी गंभीर है। सरकार ने खेल कर दिया है। जो लोग इस वक्त बीएड और डी एल एड के अंतिम साल में हैं, वो फार्म नहीं भर सकते।

इनका दावा है कि इनकी संख्या पांच लाख है। अगर ये अभी फार्म नहीं भर पाएंगे तो न जाने कितने साल इंतज़ार करने पड़ेंगे। चुनाव बाद तो हिन्दी न्यूज़ चैनलों को दंगाई बनाने के प्रोजेक्ट ही देखने होंगे। इसलिए इनकी मांग जायज़ है कि इन्हें भी परीक्षा देने का मौका दिया जाए। वैसे भी परीक्षा की प्रक्रिया पूरी होने में एक दो साल लगता ही है, तबतक ये पास हो ही जाएंगे। अगर ये पांच लाख हैं तो ये एक जगह जमा होकर प्रदर्शन क्यों नहीं कर लेते? मुझे नहीं पता कि ये पांच लाख हैं भी या नहीं अगर हैं तो फिर इनकी हालत ऐसी क्यों है? अपनी लड़ाई ख़ुद क्यों नहीं लड़ लेते हैं? एक जगह जमा होकर दिखा दें सरकार को कि पांच लाख हैं, मगर इनके प्रदर्शन में दिखते हैं सौ पचास ही।

मुझे एक बात समझ नहीं आती। क्या राजनीति को वाकई अस्सी हज़ार और पांच लाख नौजवानों की चिन्ता नहीं है? यह कैसा दौर है जब सरकार और मीडिया नौजवानों के ख़िलाफ़ हो गया है। ये कहां जाएंगे। इन्हें न अच्छा स्कूल मिला, दुनिया के रद्दी से रद्दी कालेज में पढ़ने के लिए मजबूर किए गए, इनकी क्या गलती है कि सरकारें इनसे बदला ले रही हैं।

मध्य प्रदेश के नौजवानों से भी अपील है कि मुझे हज़ारों की संख्या में मेसेज न करें। अपने माता पिता से भी कहें कि हिन्दू मुस्लिम टापिक छोड़ो और अपने बच्चे के भविष्य से हो रहे खिलवाड़ को रोको। हम जैसे पत्रकारों का क्या ठिकाना। कब नौकरी चली जाए। चली ही गई कुछ एंकरों की। तब आप क्या करेंगे? अपनी नौकरी का ठिकाना नहीं, चले हैं लाख दस लाख की आवाज़ बनने। आप लोग ही मुझ पर हंसेंगे। हंस लीजिएगा मगर इन नौजवानों की व्यथा तो सुन लीजिए हुज़ूर लोग। इतना घमंड ठीक नहीं है।

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