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ईरान के मशहद से सैय्यद ज़ैग़म मुर्तज़ा का विशेष लेख

मशहद ईरान का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। धार्मिक पर्यटन के नज़रिए से ये दुनिया का व्यस्ततम शहर है।तादाद के लिहाज़ से और औसत में भी यहां मक्का, मदीना और कर्बला से ज़्यादा श्रद्धालु आते हैं। साल के तीन सौ पैंसठ दिन यहां समान भीड़ रहती है। इसकी तीन बड़ी वजहें हैं। सऊदी अरब में किसी रौज़े पर जाना शिर्क है, यहां तक कि मुहम्मद स.अ की क़ब्र की ज़ियारत पर भी तमाम पाबंदियां हैं। दूसरा मध्य पूर्व के देशों में धार्मिक विचारधारा जिसके चलते या तो तमाम रौज़े तोड़ दिए गए या फिर वीज़ा न देने की नीति अपना ली गयी। तीसरा मशहद का प्रशासन और वहां की व्यवस्था।

मशहद में आठवें शिया इमाम अली रज़ा का रौज़ा है। यहां न भिखारी नज़र आते हैं, न बाबा, पंडे, ठेकेदार या ठग। यहां कोई आपसे चढ़ावे को नहीं कहता, न चादरपोशी के रिवाज हैं। मतलब दरगाह पर जाने के हिंदुस्तानी विचार से तमाम चीज़ उलट हैं। ये परिसर दुनिया का सबसे बड़ा मस्जिद परिसर हैं जहां पर किसी भी फिरक़े का आदमी अपने-अपने तरीक़े से नमाज़ पढ़ सकता है। यहां हिंदुस्तान की तरह कोई बोर्ड नहीं लगा है कि मस्जिद या रौज़े में फलां, फलां दाख़िल न हों। न ही कोई हाथ बांधकर नमाज़ पढ़ने पर और रदफैन पर टोकता है। इमार रज़ा श्राइन बोर्ड दरगाह या मस्जिद प्रशासन का बेहतरीन नमूना है। दरगाह को हर साल चंदे, ज़ायरीन के चढ़ावे से लाखों रुपये मिलते हैं। कमाई के लिहाज़ से दुनिया का सबसे अमीर बोर्ड है। लेकिन इस पैसे से कया होता है?

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हिंदुस्तान में गुरुद्वारों का वजूद आने से भी काफी पहले से इमाम रज़ा का दस्तरख़ान चल रहा है। बेहतरीन होटल की तरह यहां कुर्सी मेज़ पर बैठाकर शानदार खाना खिलाया जाता है। एक बार में सत्रह हज़ार लोग यहां अलग अलग फ्लोर पर खाना खा सकते हैं। इसके अलावा तमाम ज़ायरीन को खाने के कैरी अवे पैकेट्स मुहैया कराए जाते हैं। किसी फाइव स्टार होटल की तरह यहां गंदगी का निशान तक नहीं देखा जा सकता। कैंपस के आसपास होटल और बाज़ार हैं जहां आम हिंदुस्तानी पर्यटन शहरों की तरह लूट नहीं है।

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साफ सुथरी चौड़ी सड़के हैं। शहर प्रशासन ने लोगों को नए व्यवस्थित इलाक़ों में बसा कर शहर में घर, दुकान और आबादी का घनत्व कम कर दिया है। इससे भीड़ और ट्रैफिक की समस्या से नहीं जूझना पड़ता। श्राइन बोर्ड की आमदनी और ख़र्च को पारदर्शी रखा गया है इस वजह इसकी आमदनी लगातार बढ़ी है। श्राइन बोर्ड संकट के समय ईरान और प्रांतीय सरकार को ब्याजमुक्त लोन देता है। अपनी आमदनी के पैसे से बोर्ड दुनिया भर में दो हज़ार से ज़्यादा स्कूल और हज़ारों मेडिकल सेंटर चला रहा है। ईरान भूकंप और पाकिस्तान बाढ़ के लाखों पीड़ित बोर्ड से मदद पा रहे हैं। युद्ध में शहीद हुए हज़ारों लोगों के परिवारों का ख़र्च बोर्ड उठाता है। बोर्ड अब औद्योगिक गतिविधियां भी चलाता है और रज़वी ईरान का एक बड़ा ब्रांड है। इसके तहत पानी की बॉटलिंग, कोल्ड ड्रिंक और एफएमसीजी गुड्स के अलावा कई दूसरे सामान के कारख़ाने हैं जिनके ज़रिए हज़ारों लोग रोज़गार पाते हैं। ख़ुद श्राईन बोर्ड के हज़ारों कर्मचारी हैं जो बाक़ायदा तनख़्वाह पाते हैं।

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ये सब इसलिए हो पाया क्योंकि मशहद और ईरानी प्रशासन ने न सिर्फ लोगों की सुविधा पर ध्यान दिया बल्कियहां पंडा, भिखारी और ठग संस्कृति नहीं पनपने दी। इस जगह को फिर्क़परस्ती से दूर रखा गया और अरबों के धार्मिक कट्टरपन को यहां हावी नहीं होने दिया गया। बहरहाल मेरे कई दोस्त कहते हैं कि शिया मदीना और मक्का से ज़्यादा कर्बला, नजफ और मशहद क्यों जाते हैं। इसकी पहली वजह है सऊदी अरब का कोटा सिस्टम और वीज़ा दिक़्क़तें। साथ ही सऊदी अरब के धार्मिक दुराभाव। मुझे अगर ऑप्शन दिया जाए तो मेरे लिए हज़रत फातेमा की क़ब्र की अहमियत कर्बला और मशहद से ज़्यादा है क्योंकि फातेमा मां है। एक मां से ज़्यादा मुहब्बत और सुकून इंसान कहीं नहीं पा सकता। मेरे लिए इमाम हसन अ.स की ज़ियारत उतनी ही पुरसुकून है जितनी इमाम हसन की। मेरे लिए रसूले अकरम स.अ का रौज़ा और भी अहम है। नाना के रौज़े को सलाम करके कर्बला जाना नवासे की सुन्नत है। मगर मुझे वहां खड़े होकर फातेहा पढ़ने तक कि इजाज़त नहीं है। मैं जन्नतुल बक़ी के आसपास भटक भी नहीं सकता। ईरान को अंतरर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों से उबारने में इमाम रज़ा अ.स की बड़ी भूमिका है। तेल के डूबते कारोबार के बीच क्लब और शराबख़ाने खोलने की इजाज़त देने वाले शेख़ साहब ये बात जिस रोज़ समझ जाएंगे, मैं और मुझ जैसे लाखों लोग उस रोज़ कर्बला जाने से पहले मक्का और मदीना जाएंगे।

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