माननीय जनरल बिपीन रावत,

आपने कश्मीरी नागरिको को चितावनी दी है कि अगर वे सेना की कार्यवाई के साथ सहयोग करने में असफल रहे तो आप निहीत सेना के साथ उन पर गोलिया चलाने से संकोच नहीं करेंगे अच्छी व्यवस्था के लिए न केवल जो पत्थर फेंकते है बल्की वो भी जो भारत-विरोधी नारे लगाते या भारत-विरोधी झंडे फहराते हैं उनका भी इलाज “आतंकवादियो” की तरह किया जएगा, उपाय जोड़ते हैl

मुस्लिम परिवार में शादीे करने के इच्छुक है तो अभी फोटो देखकर अपना जीवन साथी चुने (फ्री)- क्लिक करें 

क्यो कश्मीरी युवा और माहिलाएँ पत्थर उठाते है, भारत-विरोधी नारे लगाते है और आतंकवादियो के खिलाफ कार्यवाई में बाधा डालते है? यह सब इसलिए क्युकि वे पाकिस्तानियो द्वारा बहकाये गए हैं? इनका जवाब खोजने के लिए मैने वाकर अहमद मोहारकन को पढ़ा की क्या उन्हे होठो पर आजादी के नारो के साथ पत्थर उठवा देता हैंl

“कि आखिरकार जब वो सब रुके तब उठकर मैने अपनी मोटरसाईकिल खड़ी की और अपने जीवन मे पहली बार मैने पत्थर उठाया और पूरी ताकत के साथ उन पर फेक दिया और अपने आप से कहा ‘हम क्या चाहते, अजादी’ उसके बाद मैने पत्थरबाजो से पत्थराव करने की कला सीखने की कसम ली”

वाकर, जो 24 वर्षिये हैं और पिछले वर्ष हुए विद्रोह से सम्बंधित मामलो में से एक का सामना कर रहे हैं वे कहते हैं “पहले भारत को प्यार करता था लेकिन अब भारत शब्द मुझे पागल बना देता हैं…मैं एक सपनो की दुनिया मे जी रहा था जबतक मेरा उनकी क्रूरता की वस्ताविकता से सामना नहीं हुआ थाl” 2008 में विरोध प्रदर्शन के दौरान लगे कर्फू के ब्रेक मे, अपनी मोटरसाईकिल पर दूध खरीदने के लिए वाकर बाहर चले गए और सीआरपीएफ फौजीओ द्वारा एक पेट्रोल पंप पर रोक लिए गए “मैं उनसे विनम्रता के साथ मिला और मैने उन्हे बताया की कर्फू हटा लीया गया हैं और मैं दूध खारीदने आया था l उनमे से 12 लोग वहाँ पर थे उन्होने मुझे घेर लीया था और बन्दूक के पिछले हिस्से व लाठीओ के साथ मुझे मारने लगे l उनमे से एक ने उसकी बन्दूक की नली मेरे मुह मे इतनी जोरो से घुसेड़ दी कि मैं चिल्ला न सकूँ”

वे कहते है “कि आखिरकार जब वो सब रुके तब उठकर मैने अपनी मोटरसाईकिल खड़ी की और अपने जीवन मे पहली बार मैने पत्थर उठाया और पूरी ताकत के साथ उन पर फेक दिया और अपने आप से कहा ‘हम क्या चाहते, अजादी’ उसके बाद मैने पत्थरबाजो से पत्थराव करने की कला सीखने की कसम ली”

मैने 2010 के जन विद्रोह की जाँच रपट मे 13 वर्षिये साकिब के बारे मे भी पढा l नवंबर 2016 मे कश्मीर के दौरा किया और सांत्वना दल का हर सदस्य और मै अश्वस्थ थे की अन्य कश्मीरी बच्चो की तरह ही साकिब के लिये भी अाजादी का मतलब आत्मनिर्णये से हैं, भारत, पाकिस्तान या आज़ाद कश्मीर के बीच एक विकल्प l एक एतिहासिक प्रतीबद्धाता जो वे जोर देते हैं की भारत का कश्मीर पर अधीपत्य हैंl

टीम, सदस्यों ने ज़ानने की कोशिश कि साकिब ने कैसी अज़ादी की कल्पना की:” साकिब के लिये सम्भवतः आजादी का क्या मतलब हो सकता हैं ? बातचीत के कुछ समय मे ही एक मेजर मापदंड के रूप मे उभर आता हैं हिस्से मे आजादी का मतलब “मेजर शर्मा” से आजादी एक स्थानीय सेना कामानडर ज़िसने साकिब के स्कूल मे अपने यूनिट के अन्य साथियो के साथ जाना एक नियमित दिनचार्या बना लिया था: सभी घातक आग्नेयास्रों को प्रदर्शित करना-केवल बच्चो को डराने के लिए और उन्हे यह समझाने के लिए की विरोध प्रदर्शनो मे भाग लेना अपनी जान को जोखिंम में डालना हैl “

जनरल रावत, इन लिखित गवाहियो से यह प्रतीत होता हैं कि कश्मीरीयो द्वारा इन पत्थरबाजी का उत्पादन पाकिस्तानियो द्वारा नहीं बल्की घाटी मे उपस्थित भारतीय सशस्त्र बलों की बहुल उपस्तिथी के द्वारा हो रहा हैंl

ऊपर उद्वत रपट से अनुमान होता हैं 90,000 भारतीय सशस्त्र सैनिक कश्मीर (5 लाख की अबादी) मे आतंकवादी-विरोधी कार्यवाहियो मे अकेले तैनात किए गए हैं (उनकी गश्त लगाने, गार्ड ड्यूटी, पाकिस्तानी सीमा पर, तोप खाने और वायु रक्षा इकाइयों में गिनती नहीं हैं) -“पहले से ही यह संख्या ब्रिटिश राज के यूरोपिय व्यवस्थापको और सैन्य अधिकारियो के करीब हैं ज़िनकी जरुरत 300 लाख या और अधिक भारतीयो को नियांत्रित करने के लिए थी l”

वास्तविक संख्या और अधिक हो सकती हैं :” कश्मीर में लोगो को विश्वास हैं कि कम से कम उनमे से हर 12 के लिये एक सशस्त्र सैनिक भारतीय सेना में से हैं” l क्यो भारतीय सेना और अर्धसैनिक कश्मीरी लोगो के बीच ऐसी एकाग्रता में मौजूद हैं, अगर दमन के लिए नहीं तो क्या एक नागरिक आबादी की इच्छा को वश में करने के लिए?

क्या आपके सैनिको द्वारा मारे जाने के डर से कश्मीरी नागरिको ने विरोध प्रदर्शन रोक दिया हैं?कश्मीरी लोगो के लीए शायद से ही यह खबर हो सकती हैं कि नागरिको को स्ट्रीट विरोध प्रदर्शनो के दौरान मार दिया गया हैं l

उदाहरण के लिए, सीआरपीएफ और पुलिस ने कश्मीर घाटी में नागरिको पर विरोध और अंतिम संस्कार करते वक्त गोलीबारी की और 4 महीने में 112 कश्मीरी नागरिको को मार गिराया गया, उनमे 1,178 की आँखो में छल्ले मिले (उनमे से 52 अंधे थे, 300 जिनमे से 150 नाबालिक हैं आंशिक रूप से द्रष्टी को खो दिया हैं )और 4,664 लोगो के शरीर के विभिन्न हिस्सो में बुलेट से चोट लगी l

जब कश्मीरी ज़ानते हैं कि उन्हे सड़को पर प्रदर्शन करने या अंतिम संस्कार में शोक करने के लिए भी मारा जा सकता हैं, तो वह सेना की आतंकवाद के खिलाफ कार्यवाई में बाधा डालने में भी क्यो डरें?

दुखद सच यह हैं कि आपने भारतीय राज्य को अनुमाती दे दी ज़िसको वो पहले से ही चलाता आ रहा था-और ये आपने अच्छा नहीं किया l भारतीय राज्य की आधिकारिक लाइन हो की वे “आतंकवादियो” से भीड़ते समय साधारण कश्मीरी नागरिको के “दिल और दिमाग” ज़ितने की हो l एक टिकाकार ने मजबूती से आपके बचाव में लिखते हुए थियोदर रूजवेल्ट के सिधांत को याद दिला दिया “जब आप उन्हे ब…ल से पा लेंगे तो उनके दिल और दिमाग आपका पालन करेगें” (if you’ve got them by b…s, their hearts and minds will follow) खैर, अधिकांश कश्मीरी बता देंगे की उन्हे ब…ल द्वारा कई दशको से रखा गया हैं और अभी भी उनके दिल और दिमाग जीतने में नकाम रहे हैं l

बहुत से भारतीयों को लगता हैं कि भारतीय सेना की कश्मीर में मौजूदगी और भारत-विरोधी कश्मीरी पर बल का उपयोग सही हैं और उन पर सवाल करना, मारे जा रहे देशभक्त सैनिको का असहनीय अपमान करना हैंl

क्या हम रुक कर खुद से पूछ सकते हैं – कि हम एक देश के रूप में, सबसे गरीब भारतीयो के बीच से तैयार सैनिको का वास्तव में कितना ध्यान रखते हैं – वे मर जाते हैं और उनकी मौत के मुल्य हमे आत्मनिर्भर और आक्रामक देशभक्ती करने की इजाजत दे देती हैं, अगर उनमे से भी कोई भी- बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव की तरह – अगर अपने साथ हुए अपमान की शिकायत, ज़िनके वो अधीन हैं करने की हिम्मत करता हैं तो उन्हे केवल क्रूर व्यवहार से निपटाया ज़ाता है जैसा अन्य असहमत नागरिको के साथ किया ज़ाता है l

किसी भी देश की सशस्त्र सेना का उपयोग दुश्मनो के खिलाफ युद्ध लड़ने के लिए होता है नागरिको का राज्य के खिलाफ असंतोष और आत्मनिर्णय होना और उस राज्य से अजादी, की माँग कोे राजनीतिक रूप से पहचानने की ज़रूरत है न की सैन्य मुद्दे की तरहl जब हमारे राजनीतिक आका इसे मान्यता देने से मना कर देते है – और कश्मीर के राजनीतिक सवाल को अकेले ही हल करने चलते है और हमारे सैनिको की जान को जोखिंम में डालते हुए, कश्मीरी लोगो की इच्छाओं और अकाक्षाओ को दबाने की माँग करते है l क्या यही सिर्फ है ?

मुझे यकीन है कि अाप भारतीय सैनिको के बीच खतरनाक आत्महत्या व खुद को नुकसान पहुचाने की दर से अवगत होगे l जब इनके कारणो की चर्चा हुई शायद ही इस संभावना को माना गया है – यह तथ्य है कि एक कारण है कि मारने व अत्याचार करने वाले को अपने दिल में पता है की यह अन्यायपूर्ण है, जो मानव मन और आत्मा पर अविश्वासनीय तनाव डालता है l

कश्मीरी नागरिको की खातिर – उन सशस्त्र बलों में लागू किए गए भारतीयो के भी खातिर – निश्चित रूप से यह समय है कि हम कश्मीर के विवाद को पहचाने: एक राजनीतिक हल की माँग करे : और विवाद के समाधान पहले आवश्यक कदम के स्वरूप में जम्मू और कश्मीर के नागरिक क्षेत्रो में तैनात भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों की वापसी की माँग करे ?

Kavita Krishnan जी के जनरल बिपीन रावत को लिखे खुले खत का हिन्दी अनुवाद l

नोट – यह लेख कविता कृष्णन की फेसबुक वाल से लिया गया है

Loading...