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प्रशांत टंडन

कुछ दिन पहले आरएसएस से जुड़े एक बुद्धिजीवी ने एक मुलाक़ात के दौरान दो चिंतायें ज़ाहिर की. उनकी पहली चिंता थी की कि संघ की नीति पीछे रह कर काम करने की रही है लेकिन पिछले कुछ साल से संघ का ज़रूरत से ज्यादा एक्स्पोज़र हुआ है – उनके मुताबिक ये संघ के लिये ठीक नहीं है. उनकी दूसरी चिंता थी कि राहुल गांधी आरएसएस और बीजेपी को एक ही वाक्य में बोलता है. (ये मुलाक़ात प्रणब को आरएसएस के वार्षिक जलसे में मुख्य अतिथि के न्योते से पहले की है).

उनकी चिंताओं से मैंने दो अर्थ निकाले – पहला आरएसएस के ज्यादा मुखर होने से उसका असली मनुवादी चेहरा सामने आने का खतरा बढ़ जाता है. पीछे रह कर ये समाज का एजेंडा तय करते हैं लेकिन सामने आने पर सामाज के दूसरे एजेंडों पर भी इन्हे जूझना पड़ेगा जिससे इनका असली मकसद प्रभावित होता है. दूसरा आरएसएस की ये चिंता ज़रूर होगी कि अब जब वो बहस के केंद्र में हैं तो वो मुख्यधारा में कैसे आयें. कैसे उसे वैध्यता (legitimacy) मिले. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, जिनका सारा जीवन कांग्रेस में कटा, से बेहतर कौन हो सकता था इस काम के लिये.

प्रणब मुखर्जी को यही बोलना था जो उन्होने बोला और आरएसएस को भी मालूम था कि वो यही बोलेंगे पर उनका नागपुर जाना और मोहन भागवत के साथ मंच साझा करना ही आरएसएस की जरूरत थी सो पूरी हो गई. प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा ने ठीक ही कहा कि भाषण कुछ दिन में लोग भूल जायेंगे पर तस्वीरें रहेंगी.

pranabbhagwat

इस देश के किसान, मजदूर, शिक्षक, छात्र सभी किसी न किसी मुद्दे पर सड़क पर आकार संघर्ष करते हैं – अपनी बात जनता के बीच रखते हैं क्योंकि ये सब राष्ट्र की मुख्यधारा में हैं और भारत के संविधान के तहत अपनी समस्याओं का समाधान तलाशते हैं. आरएसएस कभी जुलूस नहीं निकलती है – किसी धरने पर नहीं बैठती है. जन संवाद की जगह अपनी बात ये सिर्फ संगठन के अंदर ही करते हैं. इनका मकसद भारत के संविधान के फ्रेमवर्क में पूरा हो नहीं सकता है. ज़ाहिर है इन्हे मुख्यधारा का भी मुखौटा चाहिये.

ज़रूरत प्रणब मुखर्जी की भी उतनी है:

समाज एक ऐतिहासिक मंथन के दौर से होकर गुज़र रहा है. ब्राह्मणवाद को ऐसी चुनौती न मुगलकाल में मिली और न ही अंग्रेज़ के शासन के दौरान जैसी अब है. सामाजिक सत्ता में वर्चस्ववादी ताकतों की पकड़ कभी ढीली नहीं पड़ी राजधानी किसी के पास रही हो.

लोकसभा और विधान सभाओं की कुछ आरक्षित सीटों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के बावजूद सवर्ण देश के बड़े हिस्से को हाशिये पर रखने में कामयाब रहा. लेकिन अब हाशिये पर धकेले गए समाज ने आरक्षण की सीमाओं से आगे निकल कर वर्चस्व के केंद्र पर हमला बोला है. शिक्षा और राजनीतिक चेतना दोनों ने इसमे बड़ी भूमिका अदा कर रहे हैं. सिर्फ जन्म के आधार पर शीर्ष पर बैठे समाज के लिये ये संकट का दौर है. इस वक़्त उसे सिर्फ आरएसएस का छाता दिख रहा है जिसके नीचे आकर बचने की कोशिश कर सकता है. प्रणब मुखर्जी इसी छाते की तरफ इशारा करने नागपुर चले गये. प्रणब मुखर्जी बुद्धिजीवी है और बहुत सोच समझ कर उन्होने ये फैसला किया है.

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