डॉ. शारिक़ अहमद ख़ान

गवर्नर रामनाईक जी ने कहा कि इलाहाबाद का नाम प्रयागराज होना चाहिए। मैं कहता हूँ कि आपको एक नया शहर बसाकर उसका नाम प्रयागराज रखना चाहिए। दूसरों के बसाए शहर का नाम क्यूँ बदलना। अपना शहर बसाइये। इलाहाबाद तो अकबर ने बसाया। जहाँ बसाया वो जंगल था।

प्रयाग तो पुराने उस स्थान का नाम है ही जहाँ आठवीं शताब्दी से शंकराचार्य ने मेला लगाना शुरू किया,देश भर के अखाड़ों को बुलाकर संगम में स्नान करने और धर्म-कर्म करने के लिए इकट्ठा किया। अखाड़ों का इतिहास यही कहता है। इसके पहले भी वहाँ मेला लगता था। ये मेला बौद्धों का था। सम्राट हर्षवर्धन बौद्ध था जो हर पांच साल पर आयोजित बड़े मेले में प्रयाग के तट पर आकर अपना खज़ाना और शरीर के कपड़े तक दान कर देता था। वो संगम पर स्नान करता था और बौद्ध रवायतों का पालन करता था।

हर्ष के बाद शंकराचार्य ने जब बौद्धों के स्थानों को धवस्त किया और लोगों को पुन: हिंदू धर्म में वापस लाए तो वो यहाँ पर माघ मेला लगाने लगे। बारह साल का कुंभ इलाहाबाद में कुछ ही शताब्दियों पूर्व शुरू हुआ है। बारह बरस पर कुंभ तो हरिद्वार में होता था। जिस जगह को प्रयाग कहा जाता है, वो जगह झूंसी नाम के कस्बे में थी। नदी इस पार का इलाका प्रयाग था। उस पार के जंगल में इलाहाबाद के रूप में एक नया शहर अकबर ने बसाया। कार्बन डेटिंग भी यही बताती है।

झूंसी का पुराना नाम प्रतिष्ठानपुर था। इसे अंधेर नगरी भी कहा जाता था। झूंसी बहुत पुराना शहर है और माघ-कुंभ मेला झूंसी में ही होता था। जब एक बार हम ख़ुद माघ मेले में प्रयाग गए तो मेरे एक हिंदू दोस्त ने माघ मेले में कल्पवास किया। कल्पवास का इलाका नदी इस पार झूंसी में था। हम झूंसी खूब घूमे। झूंसी अपनी बसावट और टीलों से ही बहुत पुराना शहर लगता है।  इलाहाबाद तो मुग़लशैली का बसा शहर है। ख़ैर,माघ मेले में कल्पवास कराने वाले पंडों ने बताया कि हर निशान और झंडे के लिए कल्पवास का ये इलाका सदियों से हर पंडे के पूर्वजों के लिए निर्धारित है।

मुसलमानों के शासन से पहले से यहीं कल्पवास होता आया है और असली प्रयाग यही है। ज़ाहिर सी बात है कि जिस जगह पर शताब्दियों से कल्पवास हो रहा है वही प्रयाग है। अगर प्रयाग नदी उस पार का इलाहाबाद है तो कल्पवास झूंसी में कैसे हो रहा है और होता आया है। कल्पवास ही माघ-कुंभ का सबसे बड़ा धार्मिक काज है। इसलिए प्रतिष्ठानपुरी मतलब प्रयाग मतलब आज के झूंसी के इलाके में ही कल्पवास होता है।

झूंसी कस्बे के पास नदी उस पार बड़े शहर के रूप में सिर्फ़ कौशांबी था।  जिसको कुसुम भी कहा जाता था। बीच में तब तक कोई बड़ा शहर नहीं था जबतक अकबर ने इलाहाबाद नहीं बसाया था। झूंसी का नाम तो कई बार बदला है। झूंसी मतलब झुलसा हुआ। एक बार ये शहर जल गया था। झूंसी कई बार बसा और उजड़ा। अब सरकार को अगर नाम बदलने की ही ख़्वाहिश है तो झूंसी का नाम बदलकर प्रयाग कर दे। जैसे नदी उस पार का रामनगर कभी काशी नहीं हो सकता, वैसे ही नदी उस पार का इलाहाबाद कभी प्रयाग नहीं हो सकता।

(ये लेखक के निजी विचार है)

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