एक अजीब लफ्ज़ मिला है मीडिया को और समाज को डर खौफ का नाम है सिमी अक्सर लोगों को मालुम ही नहीं के आखिर क्या है ”सिमी” स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया को ही सिमी कहा जाता है पुलिस का ये कहना है के सिमी आतंकवादी गतिविधियां में शामिल है देश विरोधी माहौल बनाने का काम कर रही है.

बेलगाम शहर के लिए ये नाम २००८ में परिचित हो गया जब शहर के ११ पढे लिखे मुस्लिम नौजवानों को सिमी तंज़ीम से वाबिस्ता होने और हिन्दू अक्सरियत इलाकों में बम धमाका करने की साज़िश का इलज़ाम लगा कर गिरफ्तार किया गया. तरह तरह की अज़ीयतें दी गयी. मुस्लिम मआशरे को वैसे भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता तो बेलगाम में भी कुछ खास रद्दे अमल नज़र नहीं आया. गिरफ्तार नौजवानों के वालिदैन घर के अफ़राद परेशांन थे. यहाँ वहाँ भटक रहे थे के कहीं से मदद फ़राहम हो और बच्चे सही सलामत घर लौटे. कोई रैल्ली, कोई एहतेजाज नहीं हुआ कुछ लोगों ने तो ये भी कहा के शायद इनका इस तंज़ीम से ताल्लुक होगा तभी तो पुलिस ने गिरफ्तार किया है.  लिहाज़ा ज़ुल्म आगे बढ़ते गया. एक मुकद्दमा कई मुकद्दमों की बुनियाद बन गया. यहां तक के भगवा आतंकवादियों का जुर्म भी बेलगाम के बेगुनाहों के सर पर मारा गया. २००८ में ही हुबली कोर्ट धमाका भगवाधारियों की जानिब से किया गया. उसके लिए बेलगाम के तीन मुस्लिम मासूम मुजरिम हाथ लग गए. न्यूज़ ब्रेकिंग बन गयी के हुबली कोर्ट धमाके के असल मुजरिम पकडे गए. खैर अल्लाह का शुक्र ये भी रहा के भगवा आतंकवादी दूसरे मामले में पकडे गए जिसमे उन्होंने कोर्ट धमाके की बात कबुल कर ली. तब तक काफी देर हो चुकी थी .

बेलगाम पुलिस ने मीडिया में सिमी दहशतगर्दी मामला कह कर इतना उछाला के अब पीछे हटना इनके लिए मुमकिन ना था. ज़ाहिर है तरक्की के सितारे और तमगे हासिल करने के लिए उन्होंने बेलगाम के बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को बलि देने का फैसला कर लिया. लश्कर,अल-क़ायदा, ओसामा बिन लादेन की कहानियां अख़बारों में आने लगी. जेल में सख्त काल कोठरी में रखा गया. खाने को खाना नहीं सिर्फ फ्रूट दिया जाता था. ६”x ८ के कमरे में ज़िन्दगी सिमट कर रह गयी. घरों में सिवाय मातम के कुछ नहीं था. मख़सूस जिंदगियां ही परेशांन थी. बाकी सभी तो अपनी ज़िन्दगियों में मसरूफ थे. क्यों के मामला कौम ओ मिल्लत का कहाँ था? ओर तो आतंकवादी थे. मुस्लिम मआशरे की एक और खासियत ये है के अदालत से पहले ही फैसला कर देती है के फलां शख्स मुजरिम है. ख्वामख्वाह तो पुलिस नहीं पकड़ती?

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बेलगाम शहर के दो नौजवान और हुबली के कई अफ़राद भी जेल में बंद आज भी गुजरात जेल में विचाराधीन कैदी बन कर जी रहे है. क्या किसी मुकद्दमे की सुनवाई दस साल तक चलती है. इससे तो बेहतर है के एक ही बार गोली मार दे या फांसी पर चढ़ा दे. आँखों में आंसुओं के साथ शकील माली के वालिद ने इत्तेहाद न्यूज़ को बताया. धारवाड़ का इन्तेहाई गरीब घर से शकील माली इलेक्ट्रिशन का काम करता था. गली मोहोल्ले में किसी से बात भी नहीं करता था. पर पुलिस को शक आ गया. और याद रखना पुलिस को किसी पर भी शक आ सकता है और खास कर मुस्लिम हो तो. आज तक जेल में नासिर-नदीम के साथ शकील भी है. बेलगाम-धारवाड़ से गुजरात जाने में तीन दिन लगते है पर तिस मिनट की भी बात नहीं होती. अंधेर में दो पुलिसवालों के सहारे लाते है चेहरा भी धुन्दला नज़र आता है.

तक़रीबन सभी तालिब ए इल्म है. अक्सर तो डॉक्टरी करने वाले थे. समझ में नहीं आता के पढ़े लिखे मुस्लिम बच्चों को ही क्यों फसाया जाता है ? जब एक तरफ मुस्लिम मआशरे को पसमांदा-अनपढ़ कहा जाता है तो फिर पढ़े लिखे लोगों को क्यों दहशतगर्दी के इलज़ाम में फसां कर ज़िन्दगियों को बर्बाद किया जा रहा है. और असल बात तो ये है के आखिर सिमी तंज़ीम की पैदाइश क्या है. ? आखिर हकीकत में इस नाम की तंज़ीम है भी या नहीं. ? दालत ने अपने फैसले में इस बात का भी ज़िक्र किया के जितने भी गिरफ्तार अफ़राद है इनके पास कोई भी सबूत नहीं है के ओ किसी ”सिमी” तंज़ीम से वाबिस्ता थे. तो आखिर क्या बात है के पुलिस बेनामी तंज़ीम सिमी के नाम से मुल्क भर में गिरफ्तारियां करती है. किसी भी नौजवान को पकड़ो और दहशतगर्दी के नाम से पहले सिमी जोड़ो तो ओ अपने आप आतंकवादी-देशद्रोही बन जाता है. ये भी सोचने की बात है के अगर इस नाम की कोई तंज़ीम होती तो इनका दस्तूर, दफ्तर, इनके शनाख्ती कार्ड होंगे. पर बेलगाम में ऐसा कुछ भी नहीं था. फिर किस बुनियाद पर गिरफ्तारियां हुयी. आज नौ साल बाद हाई कोर्ट ने भी मुहर लगा दी.

कर्नाटक हाई कोर्ट बेंच के सिनियर जज आनंद बयरारेड्डी ने अप्पिल पर फैसला सुनाते हुए कहा के कोई दस्तावेज नहीं है के तमाम अफ़राद सिमी तंज़ीम से थे. इन पर लगाए इल्ज़ामात बेबुनियाद थे. इसका मतलब ये हुआ के पुलिस की तहक़ीक़ गलत थी. अगर पुलिस मुहकमा किसी भी बेगुनाह को गिरफ्तार कर ज़िन्दगी बर्बाद होने का सबब बनती है तो उस पुलिस अफसर को जेल क्यों नहीं भेजा जाता ऐसा सवाल भी अब अवाम की जानिब से किया जा रहा है बेगुनाहों को जेल की कोठरी में देशद्रोही की धाराएं लगा कर भेजने वालों को बड़े बड़े तमगे अवार्ड, प्रमोशन मिल जाते है. पर उन बेगुनाह ज़िन्दगियों का क्या जिनके आंसू सैलाब की तरह बहते रहते है. क्या यही इन्साफ है. क्या यही कानून है.  अब तो और इजाफा होता नज़र आ रहा है. मोदी सरकार के आते ही भगवा धारियों के वारे- न्यारे हो चुके है. अब तो मुसलमान होना ही काफी है अगर आप सिमी के इलज़ाम से छूटेंगे तो फिर बाबरी, दादरी, बीफ, लव जिहाद जैसे मसाइल से मुकाबला करना पड़ता है. इलज़ाम तब और भी शक के दायरे में आता है जब पढ़े लिखे मख़सूस तबके के नौजवानों पर ही लगाया जाता है. तक़रीबन मुकद्दमे गलत साबित हुए है. अ

दालत के तक़रीबन फैसलों को देखा जाय तो कही तो पुलिस अफसरान की जानिब से दोहरा मापदंड अपनाया जा रहा है ऐसा कई इंसानी हुकूक तंज़ीमों का कहना है.  बेलगाम के नासिर और नदीम आज भी जेल में बंद है. नदीम सय्यद की माँ का हाल ही में इंतकाल हो गया. अपने बेटे का चेहरा तक नहीं देख पायी इसका मलाल आखिर तक रहा. ईद की खुशियां हर कोई मनाता है पर किसी को परवाह नहीं के कुछ माकन ऐसे भी जिनके घरों में अँधेरे छाये हुए है. हम कहते तो बहोत कुछ पर अमल से ख़ाली है. सेंकडो ज़िंदगियाँ तबाह हुयी. लाखों ज़िंदगियाँ जेल की सलाखों के पीछे सिसक रही है.

इक़बाल अहमद जकाती,संपादक-पैगाम ए इत्तेहाद (हिंदी राष्ट्रिय साप्ताहिक),इत्तेहाद न्यूज़ -(ऑन लाइन)

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