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सैय्यद ज़ैगम मुर्तज़ा

इमाम हुसैन ने ऐलान करके लोगों को कर्बला चलने की दावत दी। हज के ज़माने में लोगों को इकट्ठा करके समझाया कि यज़ीद के फितने से निपटना क्यों ज़रूरी है। ये भी बताया कि झूठ और ज़ुल्म से लड़कर मौत को गले लगाना कामयाबी क्यों है और डरकर घरों में छिप जाना या उसकी बैयत कर लेना ग़लत कैसे है।

एक कमेंट में क़ंबर अब्बास साहब लिखते हैं कि लोगों ने अपनी जान और मंसब बचाने के लिए कर्बला का रुख़ नहीं किया। कई लोगों को लगा कि इस झमेले में कौन पड़े। दुनिया भर में मध्यम वर्ग की यही मानसिकता है। लोगों ने हक़ को फ़रामोश कर दिया। लेकिन कर्बला के बाद जो कुछ हुआ उसने इमाम हुसैन की बात को सही साबित कर दिया।

कुछ ही दिन बाद यज़ीद के लश्कर ने मदीने पर हमला किया। इसमें आम लोगों के अलावा 10 हज़ार से ज़्यादा सहाबी- ए- रसूल मारे गए। इसके कुछ महीने बाद मक्का पर हमला किया। ख़ाना ए काबा में आगज़नी के साथ-साथ वो सब हुआ जिसके ख़ौफ में लोग यज़ीद से उलझना नहीं चाहते थे। लोग इस गफ़लत में थे कि कर्बला न जाकर बच जाऐंगे लेकिन हसीन बिन नमीर अल सकुनी के उमवी लश्कर ने उनकी औरतों और बच्चों तक को नहीं छोड़ा। यज़ीद और उसके कमांडरों ने मक्का और मदीना में हर वो काम किया जिसकी इस्लाम में मनाही थी। अब अल्लाह बेहतर जानता है कि मारे गए लोगों में से कितनो को जन्नत नसीब हुई।

जो लोग हमें समझा रहे हैं ज़माना ख़राब है ज़रा संभल कर चलिए वो समझें कि ज़माना ख़राब है या आगे बदतर ज़माना मुंह फैलाए हमें निगलने को बैठा है। इमाम हुसैन ने कहा कि ज़ुल्म के ख़िलाफ जितनी देर से उठोगे उतनी ज़्यादा क़ुर्बानी देनी होगी।

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इधर मौलाना साहब हमें बरसों से बता रहे हैं कि इमाम हुसैन ने दीन बचाने के लिए गर्दन कटा दी। ये कोई नहीं समझा रहा कि दीन कैसे बचा और इमाम हुसैन की करामात क्या थी। इमाम हुसैन को ताज़िए में कैद कर दिया गया और ये कई लोगों की रोज़ी रोटी की फिक्र बनकर रह गया है। हमसे कहा जा रहा सवाल न करो। लेकिन इमाम हुसैन तो कहकर गए हैं हर ग़लत बात और हर ग़लत आदमी से सवाल करो चाहे गर्दन ही क्यों कटानी पड़े। जनाब लोग सवाल कर रहे हैं तो रोकिए मत। ये ज़िंदा क़ौम की निशानी है। अगर आज हम हक़ को फ़रामोश करेंगे तो कल हम सब को भुगतना भी पड़ेगा।

लोगों को ये मत बताईए कि इमाम हुसैन कैसे शहीद हुए। ये समझाइए क्यों शहीद हुए। लोगों को ये भी बताइए कि क्यों हर दौर में इमाम हुसैन की हलमिन की सदा ज़िंदा रहेगी। कर्बला क़त्लगाह नहीं है। कर्बला हमारी यूनिवर्सिटी है। हम कर्बला से पढ़कर आए हैं कि ज़माना कितना ही ख़राब हो और हवाएं कितनी ही मुख़ालिफ हों… हम न झुके हैं, न बिके हैं और न हमने किरदार का सौदा किया है। हम क़यामत तक हक़ के साथ रहेंगे चाहे जो क़ीमत चुकानी पड़े।

लेखक राज्यसभा टीवी से जुड़ें हैं 

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