डाक्टर फ़र्रुख़ खान एवं दिनकर तिवारी

वर्तमान मे वैश्विक महामारी (covid 19) के इस दौर मे  भारत सरकार द्वारा अब तक चार चरणो का लाँक डाउन यानी जन्ता कर्फ्यू घोषित किया जा चुका है, किन्तु फिर भी हम भारत मे इस महामारी को रोकने मे असफल रहे है और नतिजा यह रहा की आज भारत मे मरिजो की संख्या चीन के मरिजो के बराबर पहुच चुकी है।
 इतने लम्बे लाँकडाउन के बावजूद सरकार संक्रमण के रोकथाम मे असफल रही इसका मुख्य कारण नीतिगत विफलता रही है। घोषणाओं की शौक़ीन सरकार इतने बडे संकट की स्थिती मे भी हमेशा की तरह अपने चीर परिचीत अंदाज का परिचय देते हुए  अचानक जनता कर्फयू की घोषणा करती है, जिससे सबसे ज्यादा परेशान प्रवासी मजदूर वर्ग होता है ।
सरकार इन प्रवासीयो को कथित रूप से सुविधा प्रदान करने हेतू तमाम कार्यकम उद्दघोषित करती है, लेकीन समय के साथ सरकार की सभी घोषणाएं  बेईमानी ही साबित होते है। नतीजा यह होता है की पैसे के अभाव में भूखे एवं मजबूर प्रवासीयो को पैदल ही घर की तरफ रुख करने के अलावा और विकल्प नहीं बचता है। लेकीन घर भी कैसे जाए ना कोई साधन ना कोई सरकारी सहायता, और तो और आराजक प्रशासन की लाठीयो का डर अलग। किन्तु फिर भी वो प्रवासी, इन सभी समस्याओ से भली भांति परिचित होते हुए भी अपने जीवन को दाव पर लगाने का पाप करने पर मजबूर होते है और पैदल ही एक लम्बा जीवन का अंत कर  देने वाला सफर करने को मजबूर होते है और  संक्रमण के डर को मन मे लिए  पैदल ही  बैगर किसी साधन एवं सुविधा के 700-800 किलोमीटर को लंबे सफर के लिए निकल पडते है, बिना यह जाने की वो घर भी पहुच पाएंगे या नही, और करते भी क्या राज्य की सरकारों के सारे दावे सिर्फ दिखावे के लिए थे और तो और जनप्रतिनिधियों के लिए तो इनको खाने का इंतजाम मानवता नहीं बल्कि पब्लिक स्टंट की तरह था।
ऐसे में इन प्रवासियों की हालत पर एक का श्लोक याद आता है  –
” त्यजेत् क्षुधार्ता जननी स्वपुत्रं , खादेत् क्षुधार्ता भुजगी स्वमण्डम् |
बुभुक्षित: किं न करोति पापं , क्षीणा जना निष्करूणा भवन्ति ||”
अर्थात : भूख  से व्याकुल एक मां  (अपने प्राण बचाने के लिये ) अपने पुत्र को भी त्याग देती  है, और एक  भूखी  सांपिन स्वयं अपने ही अण्डो को खा जाती  है |  इसी लिये  कहा गया है कि एक भूखा व्यक्ति  कोई  भी पाप (निषिद्ध कार्य) कर   सकता  है तथा  कमजोर व्यक्ति  भी ऐसी परिस्थिति में  निर्दय हो जाते हैं |
सरकार ने जनता कर्फ्यू यह कह के लगाया की यह देशहित मे है और देश के नागरिको की सुरक्षा के लिए है, तो क्या सरकार इन प्रवासीयो को देश का नागरिक नही मानती, जिनसे देश की अर्थब्यस्था को जमिन मिलती है,जिसकी वजह से सरकार ने इन गरीब, मेहनती, और देश के अर्थब्यवस्था के सबसे बडे खेवनहारो को उन्ही सडको पर भूख प्यासा तडप तडप के मरने  को छोड देती है। जिन सडको का निर्माण भी इसी वर्ग ने किया है और देश के सभी नेतागण एवं पूंजीपती बडे शान से इन्ही सडको पर अपनी तेज रफ्तार सुविधायुक्त गाडीयो मे फर्राटे भरते है।
आज जब यह संक्रमण समुचे देश मे फैल चुका है और हर रोज लगभग 3000 – 4000 संक्रमित मरिज मिल रहे है तब सरकार फिर अपने चीर परिचीत अंदाज मे आचानक यह घोषणा करती है की हमे अब इस महामारी के साथ जीने की आदत डालनी होगी और   आत्मनिर्भर होना होगा। असल में यह घोषणा सरकार के नीतिगत रूप से सम्पूर्ण विफलता को दर्शित करता है ।
इसी क्रम में सरकार द्वारा एक और घोषणा विशेष ट्रैन चला कर सभी फसे हुए प्रवासियों को अपने घर भेजने की व्यस्था करने की जाती है, लेकिन सरकार यहाँ भी बुरी तरह से मुँह की खाती है और प्रवासियों का पैदल घर जाना बदस्तूर जारी रहता है नतीजा यह होता है की रोजाना सडक पर ट्रेन की पटरियों पर या तो हादसे से, या तो भूख से ,या तो अत्यधिक थकान से पडी लाशे मिलती है । कौन है इसका जिम्मेदार? आखिर क्यों, ये लोग आपना घर परिवार छोडकर इतनी बडी संख्या मे इतनी दुर जाकर काम ढूंढते है और जीवन पर्यन्त काम करने के बावजूद बेहतर स्वाथय एवं शिक्षा तो दुर की बात है दो वक्त की रोटी भी ठीक से नही जुटा पाते ? आखिर क्यो इन प्रवासियो की राज्य सरकारे इनको स्वतंत्रता के 70 सालो से अधिक समय बितने के बावजूद भी इनके राज्य में वही काम मुहैया कराने मे असमर्थ है, जिनके लिए इनको इतनी दूर जाना पड़ता है ?
हमारे देश के कानून के अनुसार यह प्रावधान किया गया है की जब कभी भी जनता, सरकार से पीड़ित होगी तब जनता  न्यायपालिका का रुख कर सकती है और न्यायपालिका न्याय करेगी। किन्तु वर्त्तमान समय में तो न्यायपालिका का भी दोहरा चरित्र देखने को मिल रहा है। सरकार ने तो इन प्रवासियों को सड़क पर मरने के लिए छोड़ ही दिया है लेकिन न्यायपालिका ने भी देश के गरीब, मजबूर, असहाय, लोगों की आवाज ध्यान देना छोड़ दिया है। जहा एक तरफ  न्यायपालिका सक्षम लोगो की सुनवाई करने हेतु आधी रात को न्याय के मंदिर का दरवाजा खुला रखती है वही दूसरी तरफ देश के गरीब, मजबूर, असहाय लोगो के समय अपने हाथ खड़े कर देती है ।
ऐसे में देश के संविधानिक मूल्यों के रक्षक ही जब संविधान का अनुपालन करने से इंकार कर दे तो निरंकुश सरकार की अनियोजित नीतियों का सामना देश को करना पड़ता है और इसका खामियाजा सिर्फ और सिर्फ देश के मध्यम वर्गीय और गरीब परिवार भुगतते है।
आज देश जनता कर्फ्यू की वजह से देश की लगातार  गिरती अर्थव्यस्था के कारण चिंतित है लेकिन सरकार यह भूल गई है की उस अर्थव्यस्था को ज़मीनी हक़ीक़त देने के लिए इन्ही प्रवासियों की मूल आवश्यकता है।  आज जिस गिरती अर्थव्यस्था को ऊपर उठाने के लिए सरकार, जनता कर्फ्यू को कुछ शर्तो की छूट के साथ लागू कर रही है वही सरकार यह भूल गई की इस अर्थव्यस्था को बिना इन प्रवासियो के अमली जमा पहनना बहुत दूर की कौड़ी है।
वर्तमान में सरकार को इन मज़दूरों के तेजी से हो रहे पलायन को रोकने की जरुरत है क्योकि अगर इनका पलायन रोका नहीं गया तो एक तरफ ग्रामीण बेरोज़गारी देश में बढ़ेगी और दूसरी तरफ शहरी अर्थव्यस्था को भी बड़ा झटका लगेगा और सरकार ने जिस तरह से इन मज़दूरों को राहत पैकेज के रूप में तीन माह का वेतन उद्घोषित किया उससे भी सिर्फ पूंजीपति वर्ग को ही फायदा होता दिख रहा है क्योकि सरकार ने सिर्फ इन मजदूरों को तीन  माह का वेतन देने का घोषणा किया है लेकिन ये पैसे मजदूरों तक कैसे पहुंचेंगे सरकार ने इसके लिए कोई स्पस्ट निर्देश नहीं दिए है।
अतः सरकार को मजदूरो के लिए अपनी नीतियों को स्पस्ट एवं प्रभावी रूप से लागू करने की ज़रुरत है।

*डॉक्टर फर्रुख़ ख़ान सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं जबकि दिनकर तिवारी काफी अरसे से लीगल फर्म, दीवान एडवोकेट्स से जुड़े हैं
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