डॉ. मुहम्मद इमरान 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय कैबिनेट ने एक ही साथ तीन तलाक (इंस्टेंट ट्रिपल तलाक) यानी तलाक-ए- बिद्दत चाहे वोह किसी भी रूप में दी गई हो मोखिक, लिखित, या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से, को अपराध बनाने वाले अध्यादेश को मंजूरी दे दी जिस पर रात में ही राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने हस्ताक्षर कर दिए | यानी अब अगर किसी ने एक साथ तीन तलाक दी तो उसे 3 साल की जेल होगी ओर जुर्माना भी लगाया जायेगा | याद रहे मोदी सरकार ने तीन तलाक को अपराध बनाने संबंधी मुस्लिम महिला ( वैवाहिक अधिकार सुरक्षा) विधेयक 2017 को मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा में पेश करने में असफल रहने के बाद यह कदम उठाया है |

तलाक – ए – बिद्दत को शरीयत ने भी सख्ती से मना फ़रमाया हैं, लेकिन तलाक – ए – हसन, तलाक – ए – अहसन के ज्ञान के अभाव में ( याद रहे तलाक – ए – हसन ओर तलाक – ए – अहसन में तलाक 90 दिन में दी जाती है, एक एक माह में एक तलाक, जिसमें पति पत्नी को सुलह के लिए बहुत वक़्त मिल जाता है) , ओर तलाक के संदर्भ में मशहूर फ़िल्म निकाह जिसमें हीरो अपनी बीवी को एक ही साथ तीन तलाक देता है इतना प्रचलन में आ गया है कि हर कोई जरूरत पड़ने पर तलाक – ए – बिद्दत ही देता है, जबकि हकीकत यह है कि तलाक – ए – बिद्दत बहुत ही दुर्लभ केस में जब पति को लगे कि उसका पत्नी से तुरंत अलग हो जाना बेहतर है अन्यथा पति पत्नी को कत्ल कर देगा या पत्नी पति को कत्ल कर देगी तब ही यह दी जाती है |

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लेकिन अफसोस शादी में लाखों रुपये खर्च करने वाले मुसलमान, नवविवाहित जोड़े को 10 रुपये की कोई दीन की किताब नहीं देता जिसमे पति पर पत्नी के कर्तव्य ओर पत्नी पर पति के कर्तव्य, पति पत्नी के अधिकार, शादीशुदा जिंदगी को खुशहाल कैसे बनाये, शादीशुदा जोड़ों के मतभेदों का निपटारा कैसे किया जाए, तलाक आदि के बारे में बताया गया हो नतीजतन तलाक-ए-हसन, तलाक – ए – अहसन की भरपूर गुंजाइश होने के बावजूद भी अज्ञानतावश फिल्मों से प्रेरित हो तलाक ए बिद्दत दे देते हैं ओर अपनी ज़िंदगी को नरग बना लेते हैं ओर दोष मढ़ देते हैं शरीयत के सर जिसकी परिणति यह होती है कि वोह लोग जो शरीयत को ना तो समझते हैं ओर ना ही समझना चाहते हैं वोह अपने राजनीतिक फायदे के लिए शरीयत को तोड़ मोड़ कर रख देते हैं ओर एक नया फ़ितना पैदा हो जाता है |

शरीयत से छेड़-छाड़, शरीयत को संदेह की निगाहों से देखना, हर ग़लती के लिए शरीयत को दोष देना वर्तमान समय में एक परंपरा बन गयी है |

सबसे अहम सवाल यह कि इस्लाम में तलाक को ना तो फर्ज, ना सुन्नत, ना वाजिब, ना मुस्तहब करार दिया है, केवल एक खास परिस्थिति में नापसंदगी के साथ जायज़ करार दिया है फिर भी क्या मुसलमानों में तलाक की दर अन्य धर्मो के मानने वालों से ज्यादा है जिससे सरकार को इस पर विशेष ध्यान देना पड़ रहा है |

तथ्यों की बात करें तो 2011 में हुई जनगणना के अनुसार तलाक दर मुस्लिमों में 0.56% है जबकि हिन्दू समुदाय में तलाक दर 0.76% है, फिर मुस्लिम विरोधी होने का आरोप झेलनी वाली सरकार मुस्लिमों में तलाक के लिए चिंतित हैं, तो क्या इसमें राजनीतिक उद्देश नहीं झलकता ?

बहरहाल केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है  ” ट्रिपल तलाक पर फ़ोरी जरूरत महसूस होने के कारण यह अध्यादेश लाया गया है, तीन तलाक का किसी धर्म से कोई लेना देना नहीं है, यह सिर्फ लैंगिक समानता व सम्मान के लिए न्याय का मामला है “

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बड़ी दिलचस्प बात है कि देश में महंगाई चरम पर है, नोटबंदी से कमर टूट चुकी अर्थव्यवस्था जी. एस. टी. के कारण मरणासन्न हो गयी है | रुपया अब तक के ऐतिहासिक निम्न स्तर पर है, पेट्रोल के भाव शतक बनाने में केवल 14-16 रुपये ही कम है, किसानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति संक्रामक बीमारी का रूप ले चुकी है, बेरोजगारी शिखर पर है, रही सही कसर करोड़ करोड़ रुपये का घोटाला कर विदेश भाग चुके नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, विजय माल्या ने पूरी कर दी, ओर भारतीय जनता पार्टी की सरकार को फोरी जरूरत महसूस हो रही है ट्रिपल तलाक पर बिल लाने की | हास्यास्पद

यह बात भी समझ के परे है कि ट्रिपल तलाक का धर्म से कोई लेना देना नहीं है ?? क्या कोई बता सकता है ट्रिपल तलाक इस्लाम के अलावा अन्य किसी मजहब में भी पाई जाती हो  ? जस्टिस सचचर के अनुसार पति पत्नी में निभाह ना होने की सूरत में, दोनों की ज़िन्दगी को ज़हननूम बनने से रोकने के लिए तलाक की व्यवस्था सबसे पहले इस्लाम में ही थी अन्य धर्मो के विवाह अधिनियम में तलाक का कोनसेप्ट इस्लाम से ही लिया गया है, जब तलाक का ही कोनसेप्ट इस्लाम से लिया गया है तो ट्रिपल तलाक की धारणा तो इस्लाम में हे यह तो बहुत आम है, तो केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद जो कि पेशे से वकील है कि यह बात सफेद झूठ है कि ट्रिपल तलाक का धर्म से लेना देना नहीं है | अपितु ट्रिपल तलाक का इस्लाम से सम्बंध है जिसके विरोधी होने के आरोप बीजेपी पर लगते रहे हैं |

केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का यह कहना कि ट्रिपल तलाक बिल लैंगिक समानता ओर सम्मान के लिए न्याय का मामला है यह बात सुनने में बहुत कर्ण प्रिय लगती है लेकिन क्या वाकई ऐसा है ?

जरा सोचिए जिस भारतीय जनता पार्टी के नेता ओर मन्त्री कठुआ में नाबालिग बच्ची आसिफ़ा के बलात्कार कर हत्या करने वालों के पक्ष में तिरंगा यात्रा निकालते हो, जिस भारतीय जनता पार्टी के नेता ओर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के संघठन हिन्दू युवा वाहिनी के कार्यक्रम में मृत मुस्लिम महिलाओं को कब्र से निकाल बलात्कार करने के लिए कहा जाता हो, जिस भारतीय जनता पार्टी के नेता गोमांस के शक में पीट पीट कर मारने वालों को माला पहनाकर स्वागत करते हैं ओर मिठाई खिलाते हो वोह वाकई तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के इतने बड़े हितैषी है ?? हरगिज नहीं, यह असंभव है कि जो दल बलात्कार पीड़िता के मुस्लिम होने ओर बलात्कारी के हिन्दू होने पर, बलात्कारी के समर्थन में तिरंगा यात्रा निकाले, जो दल मृत मुस्लिम महिलाओं को कब्र से निकाल बलात्कार करने के लिए उकसाये वह मुस्लिम महिलाओं का हितैषी हो |

भारतीय जनता पार्टी पर विपक्षी दलों द्वारा हमेशा ध्रुवीकरण की राजनीति करने, हिन्दू मुस्लिम करने के आरोप लगते रहे हैं, जिसकी पुष्टि भाजपा कभी राम मंदिर, कभी लव ज़िहाद, आदि धार्मिक मामले उठाकर करती आयी है |

कानूनविदों के अनुसार तीन तलाक बिल को अध्यादेश के माध्यम से दंडनीय बनाकर केंद्र ने थोड़ी जल्द बाजी का परिचय दिया है | संविधान यही कहता है कि किसी मामले में अध्यादेश तभी लाना चाहिए जब मामला जल्दी का हो | इसीलिए उस अध्यादेश को भी छह महीने में संसद से पास करवाना जरूरी है | यह प्रक्रिया तब अपनाई जाती है जब संसद सत्र में ना हो | यह संसदीय प्रक्रिया की कमी को भरने का तरीका भी है ओर उसे बाईपास करने का भी |

यहाँ लग रहा है कि सरकार ने दूसरा तरीका अपनाया है वरना जिस मामले पर इतने लंबे से बहस चल रही है उसे थोड़े दिन ओर इंतज़ार करके संसद से पारित करवाना चाहिये था | यही वजह है कि सरकार के इस कदम का विरोध हो रहा है ओर इसे न्याय और समाज सुधार के कदम से ज्यादा राजनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है | माना जा रहा है कि इसका लक्ष्य आगामी राज्यों के विधानसभा चुनावों ओर उसके बाद लोकसभा चुनाव को प्रभावित करना है |

एक ओर सवाल दिमाग में कोंधता है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इंस्टेंट ट्रिपल तलाक को असन्वेधानिक देने के बाद भी क्या ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कुछ नहीं किया जिससे सरकार को इस पर तुरत फूरत अध्यादेश लाना पड़ा ? लेकिन ऐसा नहीं है ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड 9 फरवरी 2018 को हैदराबाद में आयोजित बैठक में  इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़ को रोकने के लिए अपने मॉडल निकाह नामा मे एक नया प्रावधान जोड़ना तय कर चुका है जिसके तहत निकाह के वक़्त ही पुरुष को वादा करना होगा कि वह एक साथ तीन तलाक नहीं देगा |

जब पुरुष निकाह के वक़्त ही यह वादा करले की वोह एक साथ तीन तलाक नहीं देगा, तो तीन तलाक की समस्या का इससे बेहतर समाधान ओर क्या होगा ??  सरकार का उद्देश्य यदि समस्या का समाधान ही है तो अध्यादेश ना लाकर उसे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के इस निकाहनामा को स्वीकार कर इसे प्रचारित करना चाहिये था | लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया तो क्या इससे यह इंगित नहीं होता कि सरकार ट्रिपल तलाक़ बिल के जरिए चुनावों को प्रभावित करना चाहती है ??

(ये लेखक के निजी विचार है। उपरोक्त विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं।)

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