‘न बिस्मिल और न ब्रिगेडियर उस्मान, न सलीम और न हामिद’ उनको तो कलाम ही चाहिए…

11:17 am Published by:-Hindi News

उनको कलाम ही चाहिए…न बिस्मिल, न ब्रिगेडियर उस्मान, न सलीम अली, न हमीद न हामिद… पूछिए क्यों? वो बताते हैं हामिद अंसारी सवाल करते हैं… एमएफ हुसैन उपहास करते हैं, गौहर रज़ा कविता लिख देते हैं। उन्हें न शायरी वाला इक़बाल चाहिए और न तबला बजाता ज़ाकिर हुसैन…

उन्हें बनारस के घाट पर शहनाई बजाते बिस्मिल्लाह से भी ऐतराज़ हो सकता है और चुपचाप कारोबार में जुटे दानवीर अज़ीम प्रेमजी से भी। ऐतराज़ तो किसी भी मासूम से मियां दिखने वाले से हो सकता है… चाहे वो कबीर जैसा लामज़हब ही हो या ज़ोमैटो का ग़रीब, अहिंसक दिहाड़ी मज़दूर…

कलाम ही चाहिए… क्योंकि कलाम में समर्पण है.. और कलाम में सरकारी मुसलमान बनने की सारी योग्यताएं हैं। कलाम वक़्त पड़ने पर ख़ुद को वैज्ञानिक कह सकता है ये जानते हुए कि उसकी डाक्टरेट मानद है। जिस दौर में डिग्री पर सवाल हों उस दौर का इंजीनियर ख़ुद को मिसाइल वैज्ञानिक कहे या परमाणु वैज्ञानिक, बस उन जैसा होना चाहिए। कलाम इसलिए भी स्वीकार्य है क्योंकि कलाम को सबकुछ स्वीकार्य है। वो अबुल पैकर और ज़ैनुल आबेदीन को नटराज की मूर्ति में छिपा सकते हैं… संसद में सावरकर के बुत की एंट्री करा सकते हैं, ये जानते हुए भी कि पिछला राष्ट्रपति दलित होकर इसके ख़िलाफ था।

कलाम 2002 के नरसंहार पर मौन रख सकते हैं। वो सेक्युलरिज़्म की चादर भी नहीं पहनते और सैन्य राष्ट्रवाद पर उनकी आवाज़ झंडे की ऊपर वाली पट्टी के पार निकल जाती है। वो म्लेच्छ होने के नाते अपनी हद समझते हैं इसलिए सिलेक्टीव मुद्दों पर ही ज्ञान देते हैं। उनकी बातों में विज्ञान होता है विज़न होता है लेकिन राजनीतिज्ञ होने के बावजूद न राजनीति होती है और न अपना पिटा हुआ समाज।

हालांकि कलाम योग्य हैं… उनमें साथियों के काम का क्रेडिट बिना विरोध झपट लेने का फन है… वो अच्छे प्रशासक हैं क्योंकि कोई उनके दावों पर सवाल नहीं करता। सबसे बड़ी बात, उनमें वो सब गुण हैं जो देश के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को स्वीकार्य हैं। कलाम बनना कोई मुश्किल नहीं है। बस रीढ़ की हड्डी कमज़ोर करने वाली दवा खाइए, थोड़ा विनम्रता से झुकिए, बहुसंख्यकों की भावनाओं का आदर करते हुए अधिकार, हक़, न्याय डैसे शब्द डस्टबिन में डालिए और भक्तिभाव से समर्पण कर दीजिए। कलाम बनना इस मुल्क में सबसे आसान काम है इसलिए कलाम बन जाइए…इतिश्री वंदेमातरम कथा।।।

पत्रकार ज़ैग़म मुर्तज़ा की कलम से निजी विचार…..

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