Monday, May 17, 2021

'वो तो सांप से भी ज़्यादा ख़तरनाक हैं'

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दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती में रहने वाली जौहरा बेगम के पास न रहने का स्थायी ठिकाना है, न नियमित काम और न ही बच्चों की पढ़ाई का इंतज़ाम, फिर भी यहां ज़िंदगी उन्हें सुकून भरी लगती है.

सुकून इसलिए क्योंकि यहां उन्हें बर्मा के उन बौद्ध लोगों का डर नहीं है, जिन्हें वो ‘सांप से भी ख़तरनाक’ मानती हैं.

जौहरा बेगम का संबंध बर्मा के उस अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमान समुदाय से है, जिसे संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ‘दुनिया के सबसे प्रताड़ित’ लोगों में गिनते हैं.

बड़ी तादाद में बर्मा छोड़कर भाग रहे ज़्यादातर रोहिंग्या यूं तो मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड और ऑस्ट्रेलिया का रुख करते हैं, लेकिन शरण की तलाश ऐसे आठ हज़ार से ज़्यादा लोग भारत भी आए हैं.

दिल्ली में रोहिंग्या लोगों की बस्ती में जाते ही सबसे पहले मेरी नज़र पानी में छप-छप करते बच्चों पर पड़ी. कूड़ेदान के एक डिब्बे में भरे पानी में ये बच्चे गर्मी से छुटकारा पाने में जुटे थे.

रोहिंग्या लोगों की ज़िंदगी के चारों ओर का घेरा भी शायद उतना ही तंग है, जितना ये कूड़ेदान का डिब्बा इन पांच बच्चों की धमाचौकड़ी करने के लिए तंग है.

रोहिंग्या लोगों का संबंध बर्मा के पश्चिमी प्रांत रखाइन से है जहां इनकी आबादी 10 लाख से ज़्यादा बताई जाती है, लेकिन बर्मा की सरकार ने कभी इन्हें अपना नागरिक नहीं माना.

वहां इन लोगों को ना ज़मीन जायदाद ख़रीदने का हक है, और ना ही पढ़ने लिखने का. उनके आने जाने पर भी कई तरह की पाबंदियां हैं.

यही नहीं, उन पर बहुसंख्यक ‘बौद्ध लोगों के अत्याचारों’ की ख़बरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आती रही हैं.

जौहरा बेगम कहती हैं, “कोई नहीं चाहता कि अपना देश, अपना घर छोड़ कर ऐसे दर दर भटके. लेकिन ऊपर वाले ने हमारी क़िस्मत ऐसी ही लिखी है.”

वो बताती हैं, “वहां बहुत ज़ुल्म होता है. पुलिस किसी को भी पकड़कर ले जाती है, डर से कोई बाहर नहीं निकलता है, मेहनत मजदूरी भी नहीं कर सकते हैं.”

दिल्ली में ही रह रहे रोहिंग्या युवक अब्दुस शकूर बताते हैं, “मुसलमान गांवों में अधिकारी आते हैं और जगह खाली करने के लिए कहते हैं. वहां की सरकार में कोई मुसलमान नहीं है, इसीलिए दिक्कत है.”

टकराव

रखाइन प्रांत में बहुसंख्यक बौद्धों के लिए रोहिंग्या लोगों की मौजूदगी हमेशा से चिंता और रोष का विषय रही है और वो उन्हें बांग्लादेश से भागकर आए मुसलमान मानते हैं, जिन्हें बर्मा से चले जाना चाहिए.

रखाइन प्रांत में वर्ष 2012 में बड़े दंगे हुए जिनमें लगभग 200 लोग मारे गए. ये दंगे एक बौद्ध महिला के बलात्कार और फिर उसकी हत्या के बाद शुरू हुए और इसका इल्ज़ाम तीन रोहिंग्या लोगों पर लगा.

इसके बाद मार्च 2013, अगस्त 2013, जनवरी 2014 और जून 2014 में भी अल्पसंख्यक रोहिंग्या और बहुसंख्यक बौद्धों के बीच हिंसक टकराव हुआ, लेकिन जान गंवाने वालों में ज़्यादातर रोहिंग्या ही बताए जाते हैं.

अब्दुस शकूर कहते हैं, “छोटे-छोटे बच्चों को भी उन्होंने नहीं छोड़ा. मैं और मेरा परिवार जान बचाने के लिए पहले बांग्लादेश गए और फिर वहां से भारत आए. यहां हम आराम से रह सकते हैं.”

जौहरा बेगम कहती हैं कि बर्मा में न पुलिस उनकी सुनती है और न हुकूमत, तो फिर इंसाफ़ की उम्मीद किससे करें.

वो तो यहां तक कहती हैं, “किसी के घर में जवान बेटी उन्हें अच्छी लगती है तो पुलिस वाले उसे अपने साथ ले जाते हैं, उसका बलात्कार करते हैं.”

बौद्ध लोगों के बारे में वो कहती हैं, “वो जानवर से भी बदतर हैं. हम सांप से नहीं डरेंगे, लेकिन उनसे डरेंगे. वो हमारे लिए सांप से भी ज्यादा खतरनाक हैं.”

मानवीय त्रासदी

इसी बस्ती में छोटी सी परचून की दुकान पर बैठी लगभग 10 साल की साजिदा के लिए भारत ही उसका घर है.

वजह पूछने वो कहती हैं, “वहां बहुत जुल्म होता है, मैंने तो बर्मा देखा नहीं, लेकिन मेरी मां बताती है कि उधर बहुत ज़ुल्म होता है. बड़ा हो या छोटा सबको काट देते हैं.”

ऐसे हालात में, हज़ारों की तादाद में रोहिंग्या लोग बर्मा छोड़ कर भाग रहे हैं. वो नौकाओं पर सवार होकर समंदर में तो निकल जाते हैं, लेकिन कोई भी देश उन्हें लेने को तैयार नहीं है.

ऐसे में हज़ारों लोग समंदर में फंसे रहते हैं. कइयों की नौकाएं डूब जाती हैं, कुछ बीमारियों की भेंट चढ़ जाते हैं जबकि कई लोग मानव तस्करों के हाथों में पड़ जाते हैं.

बहुत से रोहिंग्या ये सोचकर मलेशिया और इंडोनेशिया का रुख़ करते हैं कि मुस्लिम-बहुल देश होने के नाते वहां उन्हें शरण मिलेगी, लेकिन ये इतना आसान नहीं होता. ये दोनों ही देश रोहिंग्या लोगों से हमदर्दी तो रखते हैं लेकिन उन्हें अपने यहां शरण नहीं देना चाहते.

उन्हें डर है कि शरण दी तो और हजारों लोगों को भी आने का प्रोत्साहन मिलेगा, जिसका असर उनकी अर्थव्यवस्था के साथ साथ सामाजिक ताने बाने पर भी पड़ेगा. यहीं चिंता थाईलैंड और ऑस्ट्रेलिया की भी है.

 

ग़रीबी सबसे बड़ी समस्या

संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय प्रवासी संगठन के आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन साल में लगभग एक लाख बीस हज़ार रोहिंग्या लोगों ने नौकाओं पर सवार होकर बर्मा छोड़ने की कोशिश की है.

कई हज़ार रोहिंग्या लोगों ने भारत का रुख़ भी किया है. दिल्ली में यूएनएचसीआर की प्रवक्ता शुचिता मेहता कहती हैं, “हमारे पास अप्रैल 2015 के आंकड़े हैं जिनके मुताबिक 8,330 रोहिंग्या शरणार्थी भारत में हैं और इनमें से 2360 लोगों ने भारत में शरण के लिए आवेदन किया है.”

ये लोग दिल्ली के अलावा, जम्मू, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और आंध्र प्रदेश में अलग-अलग जगहों पर रह रहे हैं.

शुचिता मेहता बताती हैं कि भारत में रह रहे रोहिंग्या लोगों की सबसे बड़ी समस्या ग़रीबी है क्योंकि सीमित शिक्षा के साथ ये लोग खुद को एक विदेशी शहरी वातावरण में पाते हैं.

यूएनएचसीआर की प्रवक्ता के मुताबिक यहां रहने वाले ज़्यादातर रोहिंग्या लोग दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं और कभी-कभी उनका शोषण भी होता है, मसलन पूरा मेहनताना नहीं दिए जाने की भी शिकायतें मिलती हैं.

इसके अलावा बच्चों का स्कूल में दाखिला न होना और रहने की स्थायी जगह न होने जैसी समस्याओं का सामना भी ये लोग कर रहे हैं, फिर भी वो अपनी ज़िंदगी सुकून में बताते हैं.

‘अभी बर्मा गए तो..’

वापस बर्मा जाने की बात पर अब्दुस शकूर कहते हैं, “अभी गए तो हमें भी मार देंगे. बर्मा तब जाएंगे जब वहां भी भारत की तरह प्रधानमंत्री चुना जाएगा, सबकी बात सुनी जाएगी.”

लेकिन अभी इसकी संभावना नहीं दिखती. सुधारों पर जोर देने वाले बर्मा के राष्ट्रपति थेन सेन को इसी साल बौद्धों के व्यापक विरोध के बाद रोहिंग्या लोगों को मतदान का अस्थायी अधिकार देने वाले क़ानून को वापस लेना पड़ा. बर्मा में इसी साल आम चुनाव होने हैं.

फिलहाल अब्दुस शकूर का सपना है कि भारत में ही मोबाइल रिपेरिंग का काम सीख कर वो अपनी दुकान खोलें.

वहीं जौहरा बेगम चाहती है कि जैसे-तैसे उनके बच्चे पढ़ लिख जाएं जबकि नन्हीं साजिदा की तमन्ना है कि पहले ख़ुद पढ़ें और फिर टीचर बन कर दूसरे लोगों को पढ़ाएं.

हालांकि जिस स्कूल में ये सब बच्चे पढ़ने जाते हैं, वो कुछ समय से बंद है क्योंकि टीचर की तन्ख्वाह का इंतजाम नहीं हो पाया.

ख़बर सौजन्य – बीबीसी हिंदी 

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