10 Indian women scientists

ये एक सच है. कि महिलाएं देश की आधी आबादी की नुमाइंदगी करती हैं. और दूसरा बदनुमा सच ये है कि इस देश की सत्ता में उनकी नुमाइंदगी आधी भी नहीं है. नारी शक्ति का स्वरूप है. लेकिन दुनिया की सारी ताक़ते, सत्ता की सारी सहूलतें इस नारी के लिए दुश्वार हैं. कहा जाता हैं कि हर आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है. लेकिन हर औरत उस आदमी के पीछे खड़ी है. जिसकी जगह आदमी ने छीनी है.

जब दुनिया बदल रही थी. ज़माने बदल रहे थे. हुक़ूमतों का अंदाज़ बदल रह था. तो हमारा देश भी दुनिया के साथ कदम मिलते हुए बदल रहा था. इसी तरह भारत जम्हूरियत यानी लोकतंत्र को अपनाने वालों में देशो में शामिल हुआ. इस वक्त दुनिया के लिए औरत बस एक औरत थी. इसके विपरीत भारत में यह शक्ति की स्वरूप थी. उस वक्त भी यही हाल था और अब भी यही हैं.

हालांकि एक बड़ा सवाल सामने है. दुनिया की तरह हमने भी परिपाटी निभाई. हमने भी महिलाओं को वोटिंग का अधिकार दिया. लेकिन इसी के साथ में बंदिशें भी थोप दीं. हमने देश की चौपालों तक पहुंचने की राह तो तय की. लेकिन उनके लिए चौखट की बंदिशें भी लगा दीं. संविधान सभा में भारत के नए संविधान को शक्ल देने के लिए पढ़ी-लिखी महिलाओं ने भूमिका अदा की. संसद का ढांचा कैसा हो ये तय करने में वो साथ चलीं. लेकिन जब संसद जाने की बारी आयी. तो उसे पछाड़ा जाने लगा. टांग अड़ाने की पुरुष प्रधान समाज की फ़िसरतें परिपाटी बन गईं. नतीजन औऱत साल दर साल क़ुर्बानी देती गई. जिसे आदमी अपनी तरक्की अपनी उपलब्धि समझता रहा. और उस पर छलावा ये. कि यह मान्यता बढ़ने लगी कि लोकतांत्रिक ढांचे हक़ीक़त में नुमाइंदगी का दावा नहीं कर सकतीं. क्योंकि जिस आबादी की नुमाइंदगी उन्हें करनी चाहिए. उसका अक्स उतारने में वे नाकाम साबित हुर्इ हैं.

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जबकि इस सिस्टम में इंदिरा, बी अम्मा, बेगम हज़रत महल, सरोजिनी, और सुचेता जैसी महिलाओं के क़िरदार के बिना भारतीय लोकतंत्र की विजय गाथा कभी मुक़म्मल हो ही नहीं सकती. पिछले तीन दशकों में लोकतंत्र में महिलाओं की सहभागिता सियासत का मुद्दा बना रहा. जिसका असर बिल्कुल उल्टा ही रहा. महिला के मान सम्मान की परिपाटी भूलते गए. औऱ मान मर्दन करके उसे सियासत में पछाड़ने की हर रीति मिभाई. महिलाओं के संसद में पहुंचने की बातें कीं. चुनावी मुद्दे बनाये. और चुनाव जीते भी. लेकिन हक़ देने की बात आयी. तो आदमी की फ़ितरत सामने आ गई. मर्दे मुजाहिद बनने वाले सियासतदान बेनक़ाब हो गए. महिलाओं के आरक्षण का बिल संसद में अटका पड़ा है. जिसे पास करने की कोई ज़हमत नहीं दिखा रहा. अलबत्ता सरकार महिलाहित का अड़ंगा लगाकर महिलाओं के हक़ को छीनने की ओछी हरकत ज़रूर करती देखी गई है. सियासत का हर वो फ़ॉर्मूला. जिससे छल-कपट की चालें गढ़ी जाती हैं. सियासत के हर वो पैंतरे. जिससे इन चालों को चला जाता है. इन कुछ दशकों में आधी आबादी ने पूरी तरह समझ लिया है. इसका जीता-जागता नमूना मिला महिला सम्मान के ढोंग में देवी देवी का रट लगाने वाले संघ और भाजपा ख़ेमे में.

सुषमा स्वराज और कई महिलाओं की लड़ाई के बाद बीजेपी कोर कमेटी में 33 फ़ीसदी महिलाओं को आरक्षण मिल जाए इसके लिए सर्वसम्मति से कोर कमेटी में ही 33फ़ीसदी का कोटा बढ़ाया गया. लेकिन जब महिलाओं को उनकी सीटे देने की बारी आयी. तो मन का खोंट कपट बनकर आगे आ गया. उस कोटे वाली सीट में से भी एक सीट पुरुष सदस्य को दे दी गई. जिस पर सिवाय एक सुषमा स्वराज के न राजनाथ की आवाज़ निकली. न नरेन्द्र मोदी की ज़ुबान फूटी. और न ही किसी संघ चालक या प्रवक्ता के बोले निकले. एक तरफ़ से सभी दिग्गजों की घिग्घी बंद हो गई. जिस दल में ऐसी व्यवस्था हो. जिसके मन का ख़ोंट जगज़ाहिर हो चुका हो. उस दल की सरकार से महिला आरक्षण को क़ानून बनने की उम्मीद लगाना क्या खुद को धोखा देने जैसा नहीं है.

बेहतर होगा. जनता कुछ अलग सोचे. और. हुक़ूमतें सियासत की कुछ और तरक़ीबें सोचें. और बेहतर तो ये होगा. कि सोच में शालीनता और पाकीजगी शामिल करे. ताकि मुद्दों को महज़ मुद्दा न बनाए रखा जाए. बल्कि उनको अंजाम तक पहुंचाया जा सके. इसी में सियासत की सुचिता भी है. और समाज की भलाई भी है. क्यों कि आधी आबादी जिस दिन हक़ लेने पे आएगी. समाज और सिस्टम की बुलंद इमारतें ज़मीदोज़ हो जाएंगी. क्यों कि इसकी बुनियाद खुद आधी आबादी है.

शाहीद परवेज
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