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अनिल जैन

लोकसभा की चार और विधानसभा की 11 सीटों के लिए हाल ही में हुए उपचुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना करना पडा है। विपक्ष तो स्वाभाविक रूप से अपनी जीत को मोदी सरकार के प्रति लोगों में पनप रहे असंतोष का परिचायक बता रहा है, लेकिन भाजपा के प्रवक्ताओं और बडबोले केंद्रीय मंत्रियों की प्रतिक्रिया बेहद दिलचस्प है। पंचायत और नगर पालिका तक के चुनाव में अपनी पार्टी की जीत का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की कुशल रणनीति को देने के लिए आतुर रहने वाले ये तमाम प्रवक्ता और मंत्री कह रहे हैं कि इन नतीजों को मोदी सरकार के कामकाज से जोडकर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि उपचुनाव में आमतौर पर मतदाता स्थानीय मुद्दों के आधार पर ही मतदान करते हैं।

इस तरह की प्रतिक्रियाओं को परे रखकर अगर पिछले चार वर्षों के दौरान लोकसभा चुनाव समेत सभी चुनाव-उपचुनाव के नतीजों पर गौर किया जाए तो हम पाएंगे कि सभी नतीजों में प्राय: सत्ता विरोधी रुझान साफ दिखा है। इसी रुझान के चलते भाजपा ने न सिर्फ केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ अपनी सरकार बनाई बल्कि वह उन सभी राज्यों में भी अपनी या अपने सहयोगी दलों की मदद से गठबंधन सरकार बनाने में कामयाब रही है जहां पहले कांग्रेस या अन्य दलों की सरकारें थीं। इसी रुझान के चलते पिछले चार वर्षों के दौरान लोकसभा और विधानसभा के जितने भी उपचुनाव हुए उनमें भी इक्का-दुक्का सीटों को छोडकर सभी के नतीजे भाजपा के खिलाफ गए हैं। यही रुझान हाल ही में दस राज्यों में विधानसभा की 11 और लोकसभा की चार सीटों के लिए हुए उपचुनाव में भी भाजपा की हार के रूप में साफ तौर पर देखने को मिला है। भाजपा अपनी महज एक लोकसभा और एक विधानसभा सीट किसी तरह बचाने में कामयाब रही है।

दरअसल, पिछले चार सालों के दौरान उपचुनावों में भाजपा की हार का यह सिलसिला नया नहीं है, खासकर लोकसभा के उपचुनावों में। केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बाद लोकसभा की 27 सीटों के लिए उपचुनाव हुए हैं जिनमें से भाजपा सिर्फ पांच सीटें ही जीत सकी है। दो सीटों पर उसके सहयोगी दल तथा बाकी 20 सीटों पर विपक्षी दल विजयी रहे हैं। विधानसभा और लोकसभा के ताजा उपचुनाव जिन राज्यों में हुए, उनमें पश्चिम बंगाल, पंजाब और केरल के अलावा बाकी सभी राज्यों में भाजपा या उसके गठबंधन की सरकारें हैं। उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि इन उपचुनावों में सत्ता विरोधी रुझान का सामना सिर्फ भाजपा और उसके सहयोगी दलों को ही करना पडा है, जबकि पश्चिम बंगाल, पंजाब और केरल में सत्तारुढ दल अपनी सीटें बचाने में कामयाब रहे हैं।

सरसरी तौर पर देखा जाए तो इन उपचुनावों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को मिली पराजय उनके विरोधी दलों की तात्कालिक एकता का परिणाम है। भाजपा के प्रवक्ता भी अपनी हार का विश्लेषण यही कहते हुए कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता से भयभीत होकर विपक्ष एकजूट हो रहा है। यानी वे यह मानते हैं कि मोदी की लोकप्रियता अभी भी जस की तस है। भाजपा प्रवक्ता अपना और अपने पार्टी कॉडर का दिल बहलाने के लिए जो भी कहे, लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा और उसके गठबंधन के लिए आगे की राह अब आसान नहीं है। यह सच है कि उपचुनावों में विपक्ष को जो जीत हासिल हुई वह उसके पीछे एक बडी वजह भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव रुकना भी रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली कामयाबी पीछे भी अन्यान्य वजहों के अलावा एक बडी वजह यही थी कि गैर भाजपा दल अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे थे। ऐसी स्थिति में भाजपा विरोधी वोट बंट गया था और भाजपा महज 31 फीसदी वोटों के सहारे 282 सीटें पाने में कामयाब हो गई थीं।ताजा उपचुनावों के नतीजे बेशक विपक्षी दलों की एकजूटता का दम दिखाते हैं, लेकिन साथ ही ये मोदी सरकार के कामकाज को लेकर लोगों में पैदा हो रहे असंतोष की ओर भी इशारा करते हैं। मोदी सरकार अपने पांच साला कार्यकाल के चार साल पूरे कर पांचवें अंतिम साल में दाखिल चुकी है लेकिन इन चार सालों के दौरान उसने अपने चुनावी घोषणा पत्र में किए गए तमाम वायदों में से एक भी पूरा नहीं किया है। भाजपा के घोषणापत्र का सूत्र वाक्य था- भाजपा की नीतियों और उसके क्रियान्वयन का पहला लक्ष्य होगा- ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ और रास्ता होगा- ‘सबका साथ-सबका विकास।’ इसी सूत्र वाक्य पर आधारित तमाम वायदों के जरिए देश की जनता में ‘अच्छे दिन’ आने की उम्मीद जगाई गई थी।

भाजपा के घोषणा पत्र में जो वायदे किए गए थे उनमें हर साल दो करोड युवाओं को रोजगार, किसानों को उनकी उपज का समर्थन मूल्य लागत से दोगुना, कर नीति में जनता को राहत देने वाले सुधार, विदेशों में जमा कालेधन की सौ दिनों के भीतर वापसी, भ्रष्टाचार के आरोपी सांसदों-विधायकों के मुकदमों का विशेष अदालतों के जरिए एक साल में निबटारा, महंगाई पर प्रभावी नियंत्रण, गंगा तथा अन्य नदियों की सफाई, देश के प्रमुख शहरों के बीच बुलेट ट्रेन का परिचालन, जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 37० का खात्मा, कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी, आतंकवाद के खिलाफ जीरो टालरेंस की नीति, सुरक्षा बलों को आतंकवादी और माओवादी हिंसा से निबटने के लिए पूरी तरह छूट, सेना की कार्य स्थितियों में सुधार, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, समान नागरिक संहिता, गुलाबी क्रांति यानी गोकशी और गोमांस के निर्यात पर प्रतिबंध, देश में सौ शहरों को स्मार्ट सिटी के रूप में तैयार करना आदि प्रमुख वायदे थे, जो पिछले चार साल के दौरान सिर्फ छलावा ही साबित हुए हैं। इनमें से कई वायदे तो ऐसे हैं जिनका जिक्र तक सरकार की ओर से पिछले चार सालों के दौरान नहीं किया गया है। इसके अलावा खुद नरेंद्र मोदी ने भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर अपनी चुनावी रैलियों में हर भारतीय के खाते में 15-15 लाख रुपए जैसे तरह-तरह के लोक-लुभावन वायदे देश से किए थे। लेकिन चूंकि चुनावी रैलियों में किए गए वायदों को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ही चुनावी जुमलेबाजी करार दे चुके हैं, लिहाजा उनकी चर्चा करना बेमतलब है।

हकीकत यह है कि इन चार वर्षों के दौरान मोदी सरकार ने जो भी काम किए वे या तो अपने घोषणा पत्र से परे हैं या फिर ठीक उसके उलट। उसने कई ऐसे कामों को भी जोर-शोर से आगे बढाया है जो यूपीए सरकार ने शुरू किए थे और विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने उनका तीव्र विरोध किया था। मनरेगा के बजट में बढोतरी, आधार कार्ड की हर जगह अनिवार्यता, जीएसटी के रूप में नई कर व्यवस्था पर अमल, विभिन्न क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी आदि ऐसे ही कामों में शुमार हैं।

कुल मिलाकर मोदी सरकार का चार साल का कार्यकाल अपने घोषणा पत्र से विमुख होकर काम करने का यानी वादाखिलाफी का रहा है, जिसके चलते हर मोर्चे पर उसके खाते में नाकामी दर्ज हुई है तो आम आदमी के हिस्से में दुख, निराशा और दुश्वारियां आई हैं, जिसका सांकेतिक प्रतिफलन उपचुनाव के नतीजों में साफ दिखाई देता है।

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