Tuesday, September 28, 2021

 

 

 

सबसे बड़ा पॉलिटिकल मूवमेंट था इस्लाम और मुसलमान पॉलिटिकल सोसाईटी तक नहीं बन पाए

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बदलाव का सिर्फ़ एक मात्र रास्ता राजनीति है, बाक़ी कुछ नहीं। जो क़ौम राजनीति में हिस्सेदारी नहीं लेगी वो हमेशा मारी जाएगी, उसको बचाने वाला कोई नहीं है।

मुस्लिम समाज की सबसे बड़ी दिक्कत है कि इसमें लोग नेतागीरी नहीं करते हैं। कुछ तो डेमोक्रेसी को लेकर आजतक कनफ़्यूज रहते हैं तो बहुत से ऐसे हैं जो अपने नेता में ख़लीफ़ा ढूँढने लगते हैं। बहुत ऐसे हैं जो सोचते हैं कि मुसलमानों को राजनीति से दूरी बना लेनी चाहिए। अब यार वो नेता है आपके मुद्दों को लेकर उसका क्या पक्ष है, इसमें इंट्रेस्ट लो। बाक़ी वो निजी जीवन में क्या करता है उसकी मर्ज़ी। अब समाज भी तो मक्कार है तो नेता के अंदर थोड़ी बहुत मक्कारी क्यों न होगी?

मज़ेदार बात ये है कि इनसे सामाजिक कार्य करवा लो बस। कम्बल,चद्दर,खटिया,तकिया,बाल्टी बाँटते रहते हैं और समझते हैं कि मेरा काम पूरा हो गया। और जो कोई नेतागीरी करना चाहता है उसको गाली देते हैं और दलाल कहकर उसे ख़ारिज कर देते हैं।

muslim people praying
source: Youtube

एक्टिविस्टों की एक लम्बी लिस्ट आ गई है इस क़ौम में। माना कि कुछ लोग इसमें बहुत अच्छा कर रहे हैं पर हर कोई दिन रात झंडा डंडा लेकर एक्टिविस्ट बना घूमता है ये भी तो ग़लत है। कुछ अच्छे लोग हैं जिन्हें राजनीति करनी चाहिए पर वो एक्टिविस्ट बने घूम रहे हैं जोकि बेहद अफ़सोस की बात है।

अपने मुद्दों को लेकर भाजपा को दिन रात पानी पी पीकर गाली देते हैं, पर कभी उनसे सवाल नहीं करते जिन्हें ये वोट देते आए हैं। अब भैया वोट सपा, बसपा और कांग्रेस को देते हो तो भाजपा से सवाल-जवाब काहे करते हो। जबकि जानते हो कि भाजपा की पूरी दुकान मुस्लिम विरोध पे टिकी है।

हाँ ये हर कोई कहता फिरता है कि सपा, बसपा, कांग्रेस में संघी भरे हुए हैं, ये बात सही भी है। पर ख़ुद भी इसी में घुस जाओ। और इतनी संख्या में भर जाओ कि संघियों को ग़ायब कर दो। अब कम्बल और चद्दर बाँट रहे हो इसलिए तो सभी धर्मनिरपेक्ष दलों में संघी भर गए हैं।

एक और नया ट्रेंड आया है शिक्षा के क्षेत्र में काम करने का। बहुत से ऐसे लोग हैं जो समझते हैं कि राजनीति नहीं सिर्फ़ शिक्षा के ज़रिए ही इस क़ौम में बदलाव आ सकता है। अब भैया जब तुम राजनीति में नहीं थे तभी तो शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र से ग़ायब कर दिए गए हो। बाक़ी दलितों से सीखो कुछ। दलित संगठन कभी शिक्षा के क्षेत्र में काम करने का नाटक नहीं करते। क्योंकि उन्हें ये पता है कि अगर हमारी लीडरशिप मज़बूत होगी तो हम स्टेट से ये सब ले लेंगे। भाइयों किसी भी समाज की शैक्षिक सुधार की ज़िम्मेदारी स्टेट की है, निशुल्क शिक्षा देना और कालेज/विश्वविद्यालय खोलना सब स्टेट की ज़िम्मेदारी है। अब हम या आप खोल लेंगे, तो न वो गुणवत्ता दे पाएँगे और न ही फ़्री में शिक्षा दे पाएँगे। हमें ये सब स्टेट से लेना है।

एक और होते हैं बहुत इंटेलेक्चुल लोग, कूल डूड टाइप। जो कहते फिरते हैं कि ब्यूरोक्रेसी में भर जाओ तभी सारे मसले हल हो जाएँगे, चलो ठीक है ब्यूरोक्रेसी में होना। पर ये क्यों भूल जाते हो कि जिस क़ौम की राजनीतिक जड़ें मज़बूत नहीं होती हैं उस क़ौम के आईएएस/आईपीएस अधिकारियों को गन्ना विभाग और चावल/लहसुन/धनिया विभाग में ही तैनाती मिल पाती है। वे आईएएस बनकर भी क्लर्क से अधिक नहीं बन पाते हैं और न ही समाज का कुछ भला कर पाते हैं।

अफ़सोस की बात ये है कि जो इस्लाम ख़ुद दुनिया का सबसे बड़ा पॉलिटिकल मूवमेंट था पर उसी इस्लाम को मानने वाले अभी तक पॉलिटिकल सोसाईटी नहीं बन पाए हैं। ये ख़ुद को जीतने के लिए बल्कि दूसरों को हराने की राजनीति करते आए हैं। पिछले इकहत्तर सालों से सिर्फ़ निगेटिव वोटिंग करते आए हैं। शुद्ध रूप से कहो तो भाजपा को हराने का ठेका ले लिए हैं बाक़ी ख़ुद सबकुछ हार जाएँ ये मंज़ूर है इन्हें।

– माजिद मजाज़  (अल्पसंख्यक मामलों के विशेष जानकार)

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