जब मैं यह फिल्म देखने अपने दोस्तों के साथ सिनेमा गया तो मेरे दोस्त को शुरू से ही कहानी समझ नही आई हालाँकि फिल्म में इतने फ्लैशबैक है की अगर एक भी सीन मिस कर दिया तो फिल्म की रूह पकड़ना मुश्किल हो जायेगा, लेकिन जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती गयी वैसे वैसे मेरे दिल की धड़कने तेज़ होती चली गयी. कुछ ऐसा लग रहा था की फिल्म शायद मेरे बारे में कुछ कह रही है, शायद फिल्म के डायरेक्टर को मेरी स्टोरी पता है और उसने फिल्म मेरे उपर बना दी.

वैसे तो फिल्म में इतने शेड्स है की व्याख्या करना मुश्किल है लेकिन मैं आपके सामने दो-तीन शेड्स की बात करूँगा. फिल्म शुरू होती है एक उस शख्स के साथ जो अभी अभी जवान हुआ है, जिसे अभी तक यह भी पता नही था की अच्छा और बुरा क्या है, जिसने जैसा कहा वैसा ही करता चला गया लेकिन उसके अन्दर एक चाह थी, एक ऐसी चाह जो कुछ ढूँढ रही थी. एक ऐसी चाह जिसे कहीं आराम नही था, उसे बताया गया की कुछ बड़ा हासिल करना है तो दिल टूटना ज़रूरी है, उसने प्यार किया और खुद दिल तोड़ा, लेकिन यह तो कुछ भी नही हुआ, जब कहा गया था की दिल टूटने के बाद ‘कुछ’ मिल जाता है तो ‘कुछ’मिला क्यों नही … “पता यूँ तो बता देते हो सबको ला-मका अपना, ताज्जुब है मगर रहते हो टूटे हुए दिल में”

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फिर एक सफ़र शुरू होता है ‘कुछ‘ ढूंढने का. कहते है की बुद्ध बनने के लिए गौतम को घर छोड़ना पड़ता है. घर छूटा, परिवार छूटा मगर तू ना मिला, तूने दुनिया बनायीं लेकिन खुद को छुपा गया. अपना घर छोड़कर एक गुरु की पनाह में जाकर बैठ गया .. कुन फाया कुन ..फाया कुन ..फाया कुन .. तू जो मुझ में समाया .. लेकिन कहा है आखिर तू .. कहाँ ढूँडू तुझे .. तभी दरगाह की तरफ से दिल में एक आवाज़ आती है ..वो मीठी सी आवाज़ .. उफ़ वो दिल को सुकून देने वाली आवाज़ जिसके आगे मेर सुर कुछ मालूम नही पड़ते.. लेकिन आखिर क्या था उस रूहानी आवाज़ में जो तुरंत सब कुछ छोड़कर वापस चले जाने को कहा .. क्या यह कहा की  “तू जो ढूंढ रहा है वह यहाँ नही मिलेगा जा वापस जा .. और समा जा अपनी चाह में“.

वापस आया तो मेरा बचपना खिलखिलाते हुए मेरी गोद में आ बैठा, मुझे उसी में असल ख़ुशी मिल रही थी जिसे मैं छोड़कर जा रहा था .. उसके साथ जीने का मन करता है .. तुझे पहली बार मैं मिलता, हर दफा.. उसे निहारते रहने का मन करता है .. क्या अब मैं खो रहा हूँ… क्या अब मैं डूब रहा हूँ .. मेरे तन-मन पर अब मेरा वश क्यों नही चल रहा .. मेरा तन एक चरखा क्यों बन गया .. ” तन मेरा … चर्चा होवे.. होवे उल्फत यार दी” ..

क्या यही सच है .. क्या यही सही है ? .. तो सब इसे गलत क्यों कहते है? .. और सब गलत कहते है तो मुझे गलत क्यों नही लग रहा ?.. क्या गलत और सही के आगे भी कोई दुनिया है .. कैसी दुनिया है वो .. मुझे वहां जाना है .. मुझे जाना है उस मैदान में जो सही और गलत के बाद है ..क्या वो बहुत बड़ा मैदान है ? .. मुझे तुमने सच का सबक सिखाया है लेकिन मेरा सच तू है.. तो दुनिया उसे सुन क्यों नही पा रही ..

बहरहाल मुझे तुम्हारी यह दुनिया नही चाहिए, मैं थूकता हूँ ऐसी दुनिया पर मैं जा रहा हूँ अपनी ख़ुशी के पास, वो जिसके पास जाने को बेताब रहता हूँ लेकिन यह क्या .. अब वो भी मुझसे बिछड़ रहा है ..वो जा रहा है .. लेकिन यह सब क्या हो रहा है मुझे .. मैं खुद को उसके पास जाने से रोक क्यों नही पा रहा हूँ, .. नही नही .. मुझे सिर्फ वही चाहिए.. नही चाहिए मुझे यह शोहरत, दौलत ..

“मुझे मत रोको, मुझे यार के घर जाने दो..मैं हूँ परवाना, मुझे शमा में मिल जाने दो”

आज वो मुझसे बिछड़ गया, अब मुझे अहसास हुआ की मैं आखिर क्या ढूढ़ रहा था .. “मैं क्या ढूंढ रहा था यह तो पता चल गया, लेकिन अब उसे कैसे हासिल करूं, क्या कुछ गलत करू, या सही करू, ? सही और गलत क्या है ? जो मेरे दिल को लगे वो सही है या जो नही करना चाहिए वो सही है .. लेकिन मुझे यह खींच कौन रहा है .. कैसी डोर है जिसमे ना डर है .. ना दूरीयाँ.. ना कोई अंतर .. मेरी रूह मुझे कहाँ ले जा रही है ..?

 

वो विशाल मैदान मुझे बार बार बुला रहा है .. मैं नादान परिंदे की तरफ क्यों उसकी तरफ उड़ता चला जा रहा हूँ, कितने ज़ख्म बर्दाश्त बर्दाश्त किये लेकिन तू नही मिल रहा .. मेरी बेबसी इतनी बढ़ चुकी है की मेरा बस नही चलता ..आखिर क्या करूँ, तुझे छोड़ दूं, या छीन लूं.. कोई बता दें .. आखिर क्या करू .. इस लम्हे मुझे कोई बता दे.. की क्या करू?..एक आंधी सी चल रही है ..सांसों की .. मैं उड़ रहा हूँ लेकिन पहुँच नही पा रहा हूँ…रोके से रुक नही पा रहा हूँ,.. मेरे हालात इस कदर बेबस है की समझ में नही आ रहा की किससे लडूं, खुद से लड़ाई करूँ.. या दुनिया से .. आखिर क्या कर जाऊ इस लम्हे ..जो मुझे चैन मिले,,, आराम मिले …सांस का शोर .. उफ़ यह आग… उफ़ मेरी बेबसी…मैं हसरत की उलझी डोर हूँ आ.. काश कोई मुझे सुलझा दे…मैं दस्तक हूँ .. जो बार बार तेरे दर तक आता हूँ.. लेकिन हर बार तेरे दर बंद मिलते है .. खुल जा ..मैं अब खुद को रोक नही पा रहा .. मिल जा …ले मैंने खुद को नौछावर कर दिया .. सौंप दिया खुद को तुझ में .. ले मेरी खुदी अब तेरे हवाले ..ले अब मैं तुझ में हूँ.. मेरा अस्तित्व अब तेरी पहचान है .. मैं बूँद सा तुझ समंदर में समा गया ..

यह कैसा सुकून है .. यह कैसा आराम है … दिल एकदम से शांत हो गया .. यह दुनिया कहाँ गयी? .. कहाँ गये सब लोग… कुछ नज़र नही आ रहा … कुछ दिख क्यों नही रहा …यह सामने से कौन आ रहा है .. कौन है यह? … यह मैं हूँ..? … हाँ, हाँ यह मैं हूँ .. या …………..तुम हो

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